आज हम कबीर परमात्मा की लीलाओं के बारे में जानेंगे, जो आज तक आप से छुपाई गयी.
मृत गाय को जीवित कर काजी-मुल्ला को उपदेश देना
पारख के अंग की वाणी नं. 569.572
सुन काजी राजी नहीं, आपै अलह खुदाय। गरीबदास किस हुकम सैं, पकरि पछारी गाय।।569।।गऊ हमारी मात है, पीवत जिसका दूध। गरीबदास काजी कुटिल, कतल किया औजूद।।570।।गऊ आपनी अमां है, ता पर छुरी न बाहि। गरीबदास घृत दूध कूं, सबही आत्म खांहि।।571।।ऐसा खाना खाईये, माता कै नहीं पीर। गरीबदास दरगह सरैं, गल में पडै़ जंजीर।।572।।
पारख के अंग की वाणी नं. 607,610
हमहीं अलख अल्लाह हैं, कुतब गोस अरू पीर। गरीबदास खालिक धनी, हमरा नाम कबीर।।607।।मैं कबीर सरबंग हूँ, सकल हमारी जाति। गरीबदास पिंड प्राण में, जुगन जुगन संग साथ।।608।।गऊ पकरि बिसमिल करी, दरगह खंड अजूद। गरीबदास उस गऊ का, पीवै जुलहा दूध।।609।।चुटकी तारी थाप दे, गऊ जिवाई बेगि। गरीबदास दूझन लगी, दूध भरी है देग।।610।।
राग बिलावल का शब्द नं. 12
पारख के अंग की वाणी नं. 613,619 का सरलार्थ
पारख के अंग की वाणी नं. 636,648 का सरलार्थ
सब पंथों के हिन्दुओं को भक्ति-शक्ति में कबीर जी द्वारा पराजित करना
संत रविदास जी द्वारा सात सौ पंडितों को शरण में लेना
तुम पण्डित किस भांतिके, बोलत है रैदास। गरीबदास हरि हेतसैं, कीन्हा यज्ञ उपास।।703।।यज्ञ दई रैदासकूं, षटदर्शन बैठाय। गरीबदास बिंजन बहुत, नाना भांति कराय।।704।।चमरा पंडित जीमहीं, एक पत्तल कै मांहि। गरीबदास दीखै नहीं, कूदि कूदि पछतांहि।।705।।रैदास भये है सात सै, मूढ पंडित गलखोडि़। गरीबदास उस यज्ञ में, बौहरि रही नहीं लोडि़।।706।।परे जनेऊ सात सै, काटी गल की फांस। गरीबदास जहां सोने का, दिखलाया रैदास।।707।।सूत सवामण टूटिया, काशी नगर मंझार। गरीबदास रैदासकै, कनक जनेऊ सार।।708।।पंडित शिष्य भये सात सै, उस काशी कै मांहि। गरीबदास चमार कै, भेष लगे सब पाय।।709।।
बिन गुरू भजन दान बिरथ हैं, ज्यूं लूटा चोर। न मुक्ति न लाभ संसारी, कह समझाऊँ तोर।।
पुरी के जगन्नाथ मंदिर में राम सहाय पाण्डेय के पैर को गर्म प्रसाद से जलने से काशी में बैठे कबीर जी ने बचाया‘‘
मनसा वाचा कर्मणा, षटदर्शन खटकंत। गरीबदास समझे नहीं, भरमे भेष फिरंत।।710।।सहज मते सतगुरु गये, शाह सिकंदर पास। गरीबदास आसन दिया, संग तहां रैदास।।711।।पग ऊपरि जल डारि करि, हो गये खडे कबीर। गरीबदास पंडा जर्या, तहां पर्या योह नीर।।712।।जगन्नाथ जगदीश का, जरत बुझाया पंड। गरीबदास हर हर करत, मिट्या कलप सब दंड।।713।।शाह सिकंदरकूं कह्या, कहा किया येह ख्याल। गरीबदास गति को लखै, पंड बचाया ततकाल।।714।।तुरतही पती लिखाय करि, भेज्या सूत्र सवार। गरीबदास पौंहचे तबै, पंथ लगे दशबार।।715।।जगन्नाथके दर्श करि, दूत पूछि हैं पंड। गरीबदास कैसैं जर्या, कहौ बिथा पग हंड।।716।।पंडा कहै सु दूतसैं, या बिधि दाझ्या पांय। गरीबदास अटका फुट्या, बेगही दिया सिराय।।717।।किन बुझाया मुझि कहौ, सुनि पंडा योह पांव। गरीबदास साची कहौ, ना कछु और मिलाव।।718।।पंड कहै सोई साच मानि, सुनौं हो दूत मम बीर। गरीबदास यहां खडे़ थे, डार्या नीर कबीर।।719।।कहौ कबीर कहां बसत है, कौंन जिन्हौंकी जाति। गरीबदास पंडा कहै, ज्यूंकी त्यूंही बात।।720।।वै कबीर काशी बसैं, जाति जुलहदी तास। गरीबदास दर्शन करैं, जगन्नाथकै दास।।721।।नितही आवत जात है, जगन्नाथ दरबार। गरीबदास उस जुलहदीकूं, पंडा लिया उबार।।722।।पंडेकूं पतीया लिखी, जो कछु हुई निदान। गरीबदास बीती कही, लिखि भेज्या फुरमान।।723।।आये काशी नगर में, दूत कही सत गल। गरीबदास इस जुलहदीकी, बड़ी मजल जाजुल।।724।। शाह सिकंदर सुनि थके, याह अचरज अधिकार। गरीबदास उस जुलहदीका, नित करि हैं दीदार।।725।।
‘‘ परमेश्वर कबीर जी द्वारा वैश्या काे शरण में लेना व हजारों शिष्यों की परीक्षा लेना’’
अर्जुन सर्जुन की कथा!
गरीब, सुरजन कूं सतगुरू मले, मक्के मदीने मांहि। चौसठ लाख का मेल था, दो बिन सबही जाहिं।।112।।गरीब, चिंडालीके चौक में, सतगुरू बैठे जाय। चौंसठ लाख गारत गये, दो रहे सतगुरू पाय।।113।।गरीब, सुरजन अरजन ठाहरे, सतगुरू की प्रतीत। सतगुरू इहां न बैठिये, यौह द्वारा है नीच।।114।।गरीब, ऊंच नीच में हम रहैं, हाड चाम की देह। सुरजन अरजन समझियो, रखियो शब्द सनेह।।115।।
मृत लड़के कमाल को जीवित करना
“बोलो कबीर परमेश्वर की जय”
“शेखतकी की मृत लड़की कमाली को जीवित करना”
कबीर, राज तजना सहज है, सहज त्रिया का नेह। मान बड़ाई ईर्ष्या, दुर्लभ तजना ये।।
कबीर आदेश से इस शव में प्रवेश करो और बाहर आओ।
“सिकंदर लोधी बादशाह का असाध्य जलन का रोग ठीक करना”
स्वामी रामानंद जी को जीवित करना
कबीर-अलख इलाही एक है, नाम धराया दोय। कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।1।।कबीर-राम रहीमा एक है, नाम धराया दोय। कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।2।।कबीर-कृष्ण करीमा एक है, नाम धराया दोय। कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।3।।कबीर-काशी काबा एक है, एकै राम रहीम। मैदा एक पकवान बहु, बैठि कबीरा जीम।।4।।कबीर-एक वस्तु के नाम बहु, लीजै वस्तु पहिचान। नाम पक्ष नहीं कीजिये, सार तत्व ले जान।।5।।कबीर-सब काहूका लीजिये, सांचा शब्द निहार। पक्षपात ना कीजिये, कहै कबीर विचार।।6।।कबीर-राम कबीरा एक है, दूजा कबहू ना होय। अंतर टाटी कपट की, तातै दीखे दोय।।7।।कबीर-राम कबीर एक है, कहन सुनन को दोय। दो करि सोई जानई, सतगुरु मिला न होय।।8।।
जगन्नाथ मंदिर की पुरी (उड़ीसा) में स्थापना
जीवा तथा दत्ता (तत्वा) का प्रकरण
गरीब, जिन मिलते सुख उपजे, मिटे कोटि अपाध।भवन चतुर्दश ढूंढियो, परम स्नेही साध।।
गुरु को तजे भजे जो आना, ता पशुआ को फ़ोकट ज्ञाना।
आये का आदर करे, चलते निवावे शीश।तुलसी ऐसे मीत को, मिलियो बीसवे बीस।।
संतों का आदर करें, लेकिन गुरु से अधिक नहीं।
ज्यों पतिव्रता पति से राति, आन पुरुष नहीं भावै।बसे पीहर में, ध्यान प्रीतम में, ऐसे सूरत लगावै।।
ऋषि मुनीन्द्र और नल-नील की कथा
ऋषि मुनीन्द्र [Munindra Rishi] जी द्वारा नल व नील का भयंकर रोग सही करना।
ऋषि मुनीन्द्र [Munindra Rishi] जी द्वारा लंका के रावण को तत्वज्ञान समझाना
सतयुग में सतसुकृत कह टेरा –त्रेता नाम मुनीन्द्र मेराद्वापर में करुनामय कहायाकलियुग नाम कबीर धराया।
पाण्डवों की यज्ञ में सुपच सुदर्शन द्वारा शंख बजाना
व्यंजन छतीसों परोसिया जहाँ द्रौपदी रानी।बिन आदर सतकार के, कही श्ंाख ना बानी।।पंच गिरासी बालमीक, पंचै बर बोले।आगे शंख पंचायन, कपाट न खोले।।बोले कष्ण महाबली, त्रिभुवन के साजा।बाल्मिक प्रसाद से, शंख अखण्ड क्यों न बाजा।।द्रोपदी सेती कष्ण देव, जब ऐसे भाखा।बाल्मिक के चरणों की, तेरे ना अभिलाषा।।प्रेम पंचायन भूख है, अन्न जग का खाजा।ऊँच नीच द्रोपदी कहा, शंख अखण्ड यूँ नहीं बाजा।।बाल्मिक के चरणों की, लई द्रोपदी धारा।अखण्ड शंख पंचायन बाजीया, कण-कण झनकारा।।
गरीब, सुपच रूप धरि आईया, सतगुरु पुरुष कबीर।तीन लोक की मेदनी, सुर नर मुनिजन भीर।।97।।गरीब, सुपच रूप धरि आईया, सब देवन का देव।कष्णचन्द्र पग धोईया, करी तास की सेव।। 98।।गरीब, पांचैं पंडौं संग हैं, छठ्ठे कष्ण मुरारि।चलिये हमरी यज्ञ में, समर्थ सिरजनहार।।99।।गरीब, सहंस अठासी ऋषि जहां, देवा तेतीस कोटि।शंख न बाज्या तास तैं, रहे चरण में लोटि।।100।।गरीब, पंडित द्वादश कोटि हैं, और चैरासी सिद्ध।शंख न बाज्या तास तैं, पिये मान का मध।।101।।गरीब, पंडौं यज्ञ अश्वमेघ में, सतगुरु किया पियान।पांचैं पंडौं संग चलैं, और छठा भगवान।।102।।गरीब, सुपच रूप को देखि करि, द्रौपदी मानी शंक।जानि गये जगदीश गुरु, बाजत नाहीं शंख।।103।।गरीब, छप्पन भोग संजोग करि, कीनें पांच गिरास।द्रौपदी के दिल दुई हैं, नाहीं दढ़ विश्वास।। 104।।गरीब, पांचैं पंडौं यज्ञ करी, कल्पवक्ष की छांहिं।द्रौपदी दिल बंक हैं, शंख अखण्ड बाज्या नांहि।।105।।गरीब, छप्पन भोग न भोगिया, कीन्हें पंच गिरास।खड़ी द्रौपदी उनमुनी, हरदम घालत श्वास।।107।।गरीब, बोलै कष्ण महाबली, क्यूं बाज्या नहीं शंख।जानराय जगदीश गुरु, काढत है मन बंक।।108।।गरीब, द्रौपदी दिल कूं साफ करि, चरण कमल ल्यौ लाय।बालमीक के बाल सम, त्रिलोकी नहीं पाय।।109।।गरीब, चरण कमल कूं धोय करि, ले द्रौपदी प्रसाद।अंतर सीना साफ होय, जरैं सकल अपराध।।110।।गरीब, बाज्या शंख सुभान गति, कण कण भई अवाज।स्वर्ग लोक बानी सुनी, त्रिलोकी में गाज।।111।।गरीब, पंडौं यज्ञ अश्वमेघ में, आये नजर निहाल।जम राजा की बंधि में, खल हल पर्या कमाल।।113।।
गरीब, सुपच शंक सब करत हैं, नीच जाति बिश चूक।पौहमी बिगसी स्वर्ग सब, खिले जो पर्वत रूंख।गरीब, करि द्रौपदी दिलमंजना, सुपच चरण जी धोय।बाजे शंख सर्व कला, रहे अवाजं गोय।।गरीब, द्रौपदी चरणामृत लिये, सुपच शंक नहीं कीन।बाज्या शंख असंख धुनि, गण गंधर्व ल्यौलीन।।गरीब, फिर पंडौं की यज्ञ में, संख पचायन टेर।द्वादश कोटि पंडित जहां, पडी सभन की मेर।।गरीब, करी कृष्ण भगवान कूं, चरणामृत स्यौं प्रीत।शंख पंचायन जब बज्या, लिया द्रोपदी सीत।।गरीब, द्वादश कोेटि पंडित जहां, और ब्रह्मा विष्णु महेश।चरण लिये जगदीश कूं, जिस कूं रटता शेष।।गरीब, बालमीक के बाल समि, नाहीं तीनौं लोक।सुर नर मुनि जन कृष्ण सुधि, पंडौं पाई पोष।।गरीब, बाल्मीक बैंकुठ परि, स्वर्ग लगाई लात।संख पचायन घुरत हैं, गण गंर्धव ऋषि मात।।गरीब, स्वर्ग लोक के देवता, किन्हैं न पूर्या नाद।सुपच सिंहासन बैठतैं, बाज्या अगम अगाध।।गरीब, पंडित द्वादश कोटि थे, सहिदे से सुर बीन।संहस अठासी देव में, कोई न पद में लीन।गरीब, बाज्या संख स्वर्ग सुन्या, चैदह भवन उचार।तेतीसौं तत्त न लह्या, किन्हैं न पाया पार।।
सतनाम व सारनाम बिना सर्व साधना व्यर्थ।।
यज्ञ संवाद में स्वयं कृृष्ण भगवान कहते हैं कि युधिष्ठिर ये सर्व भेष धारी व सर्व ऋषि, सिद्ध, देवता, ब्राह्मण आदि सब पाखण्डी लोग हैं। इनके अन्दर भाव भक्ति नहीं है। सिर्फ दिखावा करके दुनियां के भोले-भाले भक्तों को अपनी महिमा जनाए बैठे हैं। कृृप्या पाठक विचार करें कि वह समय द्वापर युग का था उस समय के संत बहुत ही अच्छे साधु थे क्योंकि आज से साढे पांच हजार वर्ष पूर्व आम व्यक्ति के विचार भी नेक होते थे। आज से 30,40 वर्ष पहले आम व्यक्ति के विचार आज की तुलना में बहुत अच्छे होते थे। इसकी तुलना को साढे पांच हजार वर्ष पूर्व का विचार करें तो आज के संतों-साधुओं से उस समय के सन्यासी साधु बहुत ही उच्च थे। फिर भी स्वयं भगवान ने कहा ये सब पशु हैं, शास्त्रविधि अनुसार उपासना करने वाले उपासक नहीं हैं। यही कड़वी सच्चाई गरीबदास जी महाराज ने षटदर्शन घमोड़ बहदा तथा बहदे के अंग में, तक्र वेदी में, सुख सागर बोध में तथा आदि पुराण के अंग में कही है कि जो साधना यह साधक कर रहे हैं वह सत्यनाम व सारनाम बिना बहदा (अनावश्यक) है।
मृत लड़के सेऊ को जीवित करना
तुम कहा करते थे कि हमारे गुरु जी भगवान हैं। आपके गुरु जी भगवान हैं तो तुम्हें माँगने की आवश्यकता क्यों पड़ी? ये ही भर देगें तुम्हारे घर को आदि-2 कह कर मजाक करने लगे। सम्मन ने कहा लाओ आपका चीर गिरवी रख कर तीन सेर आटा ले आता हूँ। नेकी ने कहा यह चीर फटा हुआ है। इसे कोई गिरवी नहीं रखता। सम्मन सोच में पड़ जाता है और अपने दुर्भाग्य को कोसते हुए कहता है कि मैं कितना अभागा हूँ। आज घर भगवान आए और मैं उनको भोजन भी नहीं करवा सकता। हे परमात्मा! ऐसे पापी प्राणी को पृथ्वी पर क्यों भेजा। मैं इतना नीच रहा हूँगा कि पिछले जन्म में कोई पुण्य नहीं किया। अब सतगुरु को क्या मुंह दिखाऊँ? यह कह कर अन्दर कोठे में जा कर फूट-2 कर रोने लगा। तब उसकी पत्नी नेकी कहने लगी कि हिम्मत करो। रोवो मत। परमात्मा आए हैं। इन्हें ठेस पहुँचेगी। सोचंेगे हमारे आने से तंग आ कर रो रहा है। सम्मन चुप हुआ। फिर नेकी ने कहा आज रात्राी में दोनों पिता पुत्रा जा कर तीन सेर (पुराना बाट किलो ग्राम के लगभग) आटा लाना। केवल संतों व भक्तों के लिए। तब लड़का सेऊ बोला माँ - गुरु जी कहते हैं चोरी करना पाप है। फिर आप भी मुझे शिक्षा दिया करती कि बेटा कभी चोरी नहीं करनी चाहिए। जो चोरी करते हैं उनका सर्वनाश होता है।
साहेब कबीर द्वारा भैंसे से वेद मन्त्र बुलवाना
कुष्टि होवे साध बन्दगी कीजिए।वैश्या के विश्वास चरण चित्त दीजिए।।
"कबीर, कहते हैं करते नहीं, मुख के बड़े लबार।दोजख धक्के खाएगें, धर्मराय दरबार।।""कबीर, करनी तज कथनी कथें, अज्ञानी दिन रात।कुकर ज्यों भौंकत फिरै, सुनी सुनाई बात।।""गरीब, कहन सुनन की करते बातां ।कोई न देख्या अमृत खाता।।""कबीर सत्यनाम सुमरण बिन, मिटे न मन का दाग।विकार मरे मत जानियो, ज्यों भूभल में आग।
परमेश्वर कबीर (कविर्देव) द्वारा महर्षि सर्वानन्द को शरण में लेना
कौन ब्रह्मा का पिता है, कौन विष्णु की माँ।शंकर का दादा कौन है, सर्वानन्द दे बताए।।
अमृतवाणी पूज्य कबीर परमेश्वर (कविर्देव) की:-
धर्मदास यह जग बौराना। कोइ न जाने पद निरवाना।।अब मैं तुमसे कहों चिताई। त्रियदेवन की उत्पति भाई।।ज्ञानी सुने सो हिरदै लगाई। मूर्ख सुने सो गम्य ना पाई।।माँ अष्टंगी पिता निरंजन। वे जम दारुण वंशन अंजन।।पहिले कीन्ह निरंजन राई। पीछेसे माया उपजाई।।धर्मराय किन्हाँ भोग विलासा। मायाको रही तब आसा।।तीन पुत्र अष्टंगी जाये। ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये।।तीन देव विस्त्तार चलाये। इनमें यह जग धोखा खाये।।तीन लोक अपने सुत दीन्हा। सुन्न निरंजन बासा लीन्हा।।अलख निरंजन सुन्न ठिकाना। ब्रह्मा विष्णु शिव भेद न जाना।।अलख निरंजन बड़ा बटपारा। तीन लोक जिव कीन्ह अहारा।।ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये। सकल खाय पुन धूर उड़ाये।।तिनके सुत हैं तीनों देवा। आंधर जीव करत हैं सेवा।।तीनों देव और औतारा। ताको भजे सकल संसारा।।तीनों गुणका यह विस्त्तारा। धर्मदास मैं कहों पुकारा।।गुण तीनों की भक्ति में, भूल परो संसार।कहै कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरें पार।।
उपरोक्त अमृतवाणी में परमेश्वर कबीर साहेब जी अपने निजी सेवक श्री धर्मदास साहेब जी को कह रहे हैं कि धर्मदास यह सर्व संसार तत्वज्ञान के अभाव से विचलित है। किसी को पूर्ण मोक्ष मार्ग तथा पूर्ण सृष्टी रचना का ज्ञान नहीं है। इसलिए मैं आपको मेरे द्वारा रची सृष्टी की कथा सुनाता हूँ। बुद्धिमान व्यक्ति तो तुरंत समझ जायेंगे। परन्तु जो सर्व प्रमाणों को देखकर भी नहीं मानंेगे तो वे नादान प्राणी काल प्रभाव से प्रभावित हैं, वे भक्ति योग्य नहीं। अब मैं बताता हूँ तीनों भगवानों (ब्रह्मा जी, विष्णु जी तथा शिव जी) की उत्पत्ति कैसे हुई? इनकी माता जी तो अष्टंगी (दुर्गा) है तथा पिता ज्योति निरंजन (ब्रह्म, काल)है। पहले ब्रह्म की उत्पत्ति अण्डे से हुई। फिर दुर्गा की उत्पत्ति हुई।
दुर्गा के रूप पर आसक्त होकर काल (ब्रह्म) ने गलती (छेड़-छाड़) की, तब दुर्गा (प्रकृति) ने इसके पेट में शरण ली। मैं वहाँ गया जहाँ ज्योति निरंजन काल था। तब भवानी को ब्रह्म के उदर से निकाल कर इक्कीस ब्रह्मण्ड समेत 16 संख कोस की दूरी पर भेज दिया। ज्योति निरंजन ने प्रकृति देवी (दुर्गा)के साथ भोग-विलास किया। इन दोनों के संयोग से तीनों गुणों (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) की उत्पत्ति हुई। इन्हीं तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी) की ही साधना करके सर्व प्राणी काल जाल में फंसे हैं। जब तक वास्तविक मंत्र नहीं मिलेगा, पूर्ण मोक्ष कैसे होगा?
साहेब कबीर व गोरख नाथ की गोष्ठी
योगी गोरखनाथ प्रतापी, तासो तेज पृथ्वी कांपी।काशी नगर में सो पग परहीं, रामानन्द से चर्चा करहीं।चर्चा में गोरख जय पावै, कंठी तोरै तिलक छुड़ावै।सत्य कबीर शिष्य जो भयऊ, यह वृतांत सो सुनि लयऊ।गोरखनाथ के डर के मारे, वैरागी नहीं भेष सवारे।तब कबीर आज्ञा अनुसारा, वैष्णव सकल स्वरूप संवारा।सो सुधि गोरखनाथ जो पायौ, काशी नगर शीघ्र चल आयौ।रामानन्द को खबर पठाई, चर्चा करो मेरे संग आई।रामानन्द की पहली पौरी, सत्य कबीर बैठे तीस ठौरी।कह कबीर सुन गोरखनाथा, चर्चा करो हमारे साथा।प्रथम चर्चा करो संग मेरे, पीछे मेरे गुरु को टेरे।बालक रूप कबीर निहारी, तब गोरख ताहि वचन उचारी।
नाथ जी जब से भए वैरागी मेरी, आदि अंत सुधि लागी।।धूंधूकार आदि को मेला, नहीं गुरु नहीं था चेला।जब का तो हम योग उपासा, तब का फिरूं अकेला।।धरती नहीं जद की टोपी दीना, ब्रह्मा नहीं जद का टीका।शिव शंकर से योगी, न थे जदका झोली शिका।।द्वापर को हम करी फावड़ी, त्रोता को हम दंडा।सतयुग मेरी फिरी दुहाई, कलियुग फिरौ नो खण्डा।।गुरु के वचन साधु की संगत, अजर अमर घर पाया।कहैं कबीर सुनांे हो गोरख, मैं सब को तत्व लखाया।।
जो बूझे सोई बावरा, क्या है उम्र हमारी।असंख युग प्रलय गई, तब का ब्रह्मचारी।।टेक।।कोटि निरंजन हो गए, परलोक सिधारी।हम तो सदा महबूब हैं, स्वयं ब्रह्मचारी।।अरबों तो ब्रह्मा गए, उनन्चास कोटि कन्हैया।सात कोटि शम्भू गए, मोर एक नहीं पलैया।।कोटिन नारद हो गए, मुहम्मद से चारी।देवतन की गिनती नहीं है, क्या सृष्टि विचारी।।नहीं बुढ़ा नहीं बालक, नाहीं कोई भाट भिखारी।कहैं कबीर सुन हो गोरख, यह है उम्र हमारी।।
- एक ब्रह्मा की आयु 100 (सौ) वर्ष की है

- ब्रह्मा जी की आयु -
- विष्णु से सात गुणा शिव जी की आयु -
(कबीर सागर - अगम निगम बोध - पृष्ठ 41)
अवधु अविगत से चल आया, कोई मेरा भेद मर्म नहीं पाया।।टेक।।ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा, बालक ह्नै दिखलाया।काशी नगर जल कमल पर डेरा, तहाँ जुलाहे ने पाया।।माता-पिता मेरे कछु नहीं, ना मेरे घर दासी।जुलहा को सुत आन कहाया, जगत करे मेरी हांसी।।पांच तत्व का धड़ नहीं मेरा, जानूं ज्ञान अपारा।सत्य स्वरूपी नाम साहिब का, सो है नाम हमारा।।अधर दीप (सतलोक) गगन गुफा में, तहां निज वस्तु सारा।ज्योति स्वरूपी अलख निरंजन (ब्रह्म) भी, धरता ध्यान हमारा।।हाड चाम लोहू नहीं मोरे, जाने सत्यनाम उपासी।तारन तरन अभै पद दाता, मैं हूं कबीर अविनासी।।
शेख फरीद (बाबा फरीद) की कथा
जो जन हमरी शरण है, ताका हूँ मैं दास।गेल-गेल लाग्या रहूँ, जब तक धरती आकाश।।
परमेश्वर कबीर जी द्वारा काशी शहर में भोजन-भण्डारा यानि लंगर (धर्म यज्ञ) की व्यवस्था करना
गरीब, कोई कह जग जौनार करी है, कोई कहे महौछा।बड़े बड़ाई किया करें, गाली काढे़ औछा।।
कबीर साहेब द्वारा मीरा बाई को शरण में लेना
कबीर, कुल करनी के कारणे, हंसा गया बिगोय।तब कुल क्या कर लेगा, जब चार पाओं का होय।।
सतसंग में जाना ऐ मीरां छोड़ दे, आए म्हारी लोग करैं तकरार।सतसंग में जाना मेरा ना छूटै री, चाहे जलकै मरो संसार।।टेक।।थारे सतसंग के राहे मैं ऐ, आहे वहाँ पै रहते हैं काले नाग,कोए-कोए नाग तनै डस लेवै। जब गुरु म्हारे मेहर करै री,आरी वै तो सर्प गंडेवे बन जावैं।।1।।थारे सतसंग के राहे में ऐ, आहे वहाँ पै रहते हैं बबरी शेर,कोए-कोए शेर तनै खा लेवै। जब गुरुआं की मेहर फिरै री,आरी व तो शेरां के गीदड़ बन जावैं।।2।।थारे सतसंग के बीच में ऐ, आहे वहां पै रहते हैं साधु संत,कोए-कोए संत तनै ले रमै ए। तेरे री मन मैं माता पाप है री,संत मेरे मां बाप हैं री, आ री ये तो कर देगें बेड़ा पार।।3।।वो तो जात चमार है ए, इसमैं म्हारी हार है ए।तेरे री लेखै माता चमार है री, मेरा सिरजनहार है री।आरी वै तो मीरां के गुरु रविदास।।4।।
ज्यों बच्छा गऊ की नजर में, यूं सांई कूं संत।भक्तों के पीछे फिरे, भक्त वच्छल भगवन्त।।
कबीर, सतगुरू शरण में आने से, आई टलै बला।जै भाग्य में सूली लिखी हो, कांटे में टल जाय।।
बिठल रूप में प्रकट होकर नामदेव जी की रोटी खाना
पुनः वहाँ नहीं आए। नामदेव जी की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर स्थानीय संत-ब्राह्मण उनका विरोध करने लगे।
द्रोपदी का चीर बढ़ाना
कबीर कमाई आपनी, कबहु ना निष्फल जाय। सात समुद्र आडे पड़ो, मिले अगाऊ आय।।
गरीब, बारद ढारी कबीर जी, भगत हेत कै काज।सेऊ कूं तो सिर दिया, बेचि बंदगी नाज।।30।।
गरीब, बारद ढुरि कबीर कै, भक्ति हेत के काज।
तेरह गाड़ी कागजों की लिखना
‘‘वंश प्रकार‘‘
प्रथम वंश उत्तम (यह चुड़ामणि जी के विषय में कहा है।)दूसरे वंश अहंकारी (यह यागौ यानि जागु दास जी का है।)तीसरे वंश प्रचंड (यह सूरत गोपाल जी का है।)चैथे वंश बीरहे (यह मूल निरंजन पंथ है।)पाँचवें वंश निन्द्रा (यह टकसारी पंथ है।)छटे वंश उदास (यह भगवान दास जी का पंथ है।)सातवें वंश ज्ञान चतुराई (यह सतनामी पंथ है।)आठवें वंश द्वादश पंथ विरोध (यह कमाल जी का कमालीय पंथ है।)नौवें वंश पंथ पूजा (यह राम कबीर पंथ है।)दसवें वंश प्रकाश (यह परम धाम की वाणी पंथ है।)ग्यारहवें वंश प्रकट पसारा (यह जीवा पंथ है।)
तेरहवें वंश मिटे सकल अंधियारा {यह यथार्थ कबीर पंथ है जो सन् 1994 से प्रारम्भ हुआ है जो मुझ दास (रामपाल दास) द्वारा संचालित है।}
दामोदर सेठ का जहाज बचाना
धन धन सतगुरु सत् कबीर, भक्त की पीड़ मिटाने वाले।।रहे नल नील जतन कर हार, तब सतगुरु से करी पुकार।जा सत रेखा लिखी अपार, सिन्धु पर शिला तिराने वाले।धन धन सतगुरु सत् कबीर, भक्त की पीड़ मिटाने वाले।।डसी सर्प ने जब जाय पुकारी, इन्द्रमती अकुलाय।आपने तुरंत करी सहाय, बहरोली मंत्र सुनाने वाले।धन धन सतगुरु सत् कबीर, भक्त की पीड़ मिटाने वाले।।दामोदर के होवें थे अकाज,अर्ज़ करी डूबता देख जहाज।लाज मेरी रखियों गरीब निवाज, समुद्र से पार लंघाने वाले।धन धन सतगुरु सत् कबीर, भक्त की पीड़ मिटाने वाले।।कहैं कर जोड़ दीन धर्मदास, दर्श दे पूर्ण करियो आस।मेटियो जन्म-मरण की तिरास,सत्यपद प्राप्त कराने वाले।धन धन सतगुरु सत् कबीर, भक्त की पीड़ मिटाने वाले।।
गरीब, नौ लख नानक नाद में, दस लख गोरख तीर।लाख दत्त संगी सदा, चरणौं चरचि कबीर।।गरीब, नौलख नानक नाद में, दस लख गोरख पास।अनंत संत पद में मिले, कोटि तिरे रैदास।।
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