कबीर साहेब जी की लीलाएं | Spiritual Leader Saint Rampal Ji Maharaj

आज हम कबीर परमात्मा की लीलाओं के बारे में जानेंगे, जो आज तक आप से छुपाई गयी.

मृत गाय को जीवित कर काजी-मुल्ला को उपदेश देना

पारख के अंग की वाणी नं. 568,619 का सरलार्थ :- विश्व के सब प्राणी परमात्मा कबीर जी की आत्मा हैं। जिनको मानव (स्त्री -पुरूष) का जन्म मिला हुआ है, वे भक्ति के अधिकारी हैं। काल ब्रह्म यानि ज्योति निरंजन ने सब मानव को काल जाल में रहने वाले कर्मों पर दृढ़ कर रखा है। गलत व अधूरा अध्यात्म ज्ञान अपने दूतों (काल ज्ञान संदेशवाहकों) द्वारा जनता में प्रचार करवा रखा है। पाप कर्म बढ़ें, धर्म के नाम पर ऐसे कर्म प्रारंभ करवा रखे हैं।

मृत गाय को जीवित कर काजी-मुल्ला को उपदेश देना


जैसे हिन्दू श्रद्धालु भैरव, भूत, माता आदि की पूजा के नाम पर बकरे-मुर्गे, झोटे (भैंसे) आदि-आदि की बलि देते हैं जो पाप के अतिरिक्त कुछ नहीं है। इसी प्रकार मुसलमान अल्लाह के नाम पर बकरे, गाय, मुर्गे आदि-आदि की कुर्बानी देते हैं जो कोरा पाप है। हिन्दू तथा मुसलमान, सिख तथा इसाई व अन्य धर्म व पंथों के व्यक्ति कबीर परमात्मा (सत पुरूष) के बच्चे हैं जो काल द्वारा भ्रमित होकर पाप इकट्ठे कर रहे हैं। इन वाणियों में कबीर जी ने विशेषकर अपने मुसलमान बच्चों को काल का जाल समझाया है तथा यह पाप न करने की राय दी है। परंतु काल ब्रह्म द्वारा झूठे ज्ञान में रंगे होने के कारण मुसलमान अपने खालिक कबीर जी के शत्रा बन गए।

काल ब्रह्म प्रेरित करके झगड़ा करवाता है। कबीर परमात्मा मुसलमान धर्म के मुख्य कार्यकर्ता काजियों तथा मुल्लाओं को पाप से बचाने के लिए समझाया करते थे। कहा करते थे कि काजी व मुल्ला! आप गाय को मारकर पाप के भागी बन रहे हो। आप बकरा, मुर्गा मारते हो, यह भी महापाप है। गाय के मारने से (अल्लाह) परमात्मा खुश नहीं होता, उल्टा नाराज होता है। आपने किसके आदेश से गाय को मारा है?

पारख के अंग की वाणी नं. 569.572


सुन काजी राजी नहीं, आपै अलह खुदाय। गरीबदास किस हुकम सैं, पकरि पछारी गाय।।569।।
गऊ हमारी मात है, पीवत जिसका दूध। गरीबदास काजी कुटिल, कतल किया औजूद।।570।।
गऊ आपनी अमां है, ता पर छुरी न बाहि। गरीबदास घृत दूध कूं, सबही आत्म खांहि।।571।।
ऐसा खाना खाईये, माता कै नहीं पीर। गरीबदास दरगह सरैं, गल में पडै़ जंजीर।।572।।

सरलार्थ :- परमेश्वर कबीर जी ने काजियों व मुल्लाओं से कहा कि गऊ हमारी माता है जिसका सब दूध पीते हैं। हे (कुटिल) दुष्ट काजी! तूने गाय को काट डाला। गाय आपकी तथा अन्य सबकी (अमां) माता है क्योंकि जिसका दूध पीया, वह माता के समान आदरणीय है। इसको मत मार। इसके घी तथा दूध को सब धर्मों के व्यक्ति खाते-पीते हैं।
ऐसे खाना खाइए जिससे माता को (गाय को) दर्द न हो। ऐसा पाप करने वाले को परमात्मा के (दरगह) दरबार में जंजीरों से बाँधकर यातनाएँ दी जाएँगी।

परमात्मा कबीर जी के हितकारी वचन सुनकर काजी तथा मुल्ला कहते हैं कि हाय! हाय! कैसा अपराधी है? माँस खाने वालों को पापी बताता है। सिर पीटकर यानि नाराज होकर चले गए। फिर वाद-विवाद करने के लिए आए तो परमात्मा कबीर जी ने कहा कि हे काजी तथा मुल्ला! सुनो, आप मुर्गे को मारते हो तो पाप है। आगे किसी जन्म में मुर्गा तो काजी बनेगा, काजी मुर्गा बनेगा, तब वह मुर्गे वाली आत्मा मारेगी। स्वर्ग नहीं मिलेगा, नरक में जाओगे।

काजी कलमा पढ़त है यानि पशु-पक्षी को मारता है। फिर पवित्रा पुस्तक कुरान को पढ़ता है। संत गरीबदास जी बता रहे हैं कि कबीर परमात्मा ने कहा कि इस (जुल्म) अपराध से दोनों जिहांन बूडे़ंगे यानि पृथ्वी लोक पर भी कर्म का कष्ट आएगा। ऊपर नरक में डाले जाओगे।(576)

कबीर परमात्मा ने कहा कि दोनों (हिन्दू तथा मुसलमान) धर्म, दया भाव रखो। मेरा वचन मानो कि सूअर तथा गाय में एक ही बोलनहार है यानि एक ही जीव है। न गाय खाओ, न सूअर खाओ। आज कोई पंडित के घर जन्मा है तो अगले जन्म में मुल्ला के घर जन्म ले सकता है। इसलिए आपस में प्रेम से रहो। हिन्दू झटके से जीव हिंसा करते हैं। मुसलमान धीरे-धीरे जीव मारते हैं। उसे हलाल किया कहते हैं। यह पाप है। दोनों का बुरा हाल होगा। बकरी, मुर्गी (कुकड़ी), गाय, गधा, सूअर को खाते हैं। भक्ति की (रीस) नकल भी करते हैं। ऐसे पाप करने वालों से परमात्मा (अल्लाह) दूर है यानि कभी परमात्मा नहीं मिलेगा। नरक के भागी हो जाओगे। पाप ना करो। घोडे़, ऊँट, तीतर, खरगोश तक खा जाते हैं और भक्ति बंदगी भी करते हैं। ऐसे (कुकर्मी) पापी से (अल्लाह) परमात्मा सौ कोस (एक कोस तीन किलोमीटर का होता है) दूर है।

(भिस्त-भिस्त) स्वर्ग-स्वर्ग क्या कह रहे हो? (दोजख) नरक की आग में जलोगे। माँस खाते हो, जीव हिंसा करते हो, फिर भक्ति भी करते हो। यह गलत कर रहे हो। परमात्मा के दरबार में गले में फंद पड़ेगा यानि दण्डित किए जाओगे (586.595)

अच्छा शाकाहार करो। बासमती चावल पकाओ। उसमें घी तथा खांड (मीठा) डालकर खाओ और भक्ति करो। (कूड़े काम) बुरे (पाप) कर्म त्याग दो। (फुलके) पतली-पतली छोटी-छोटी रोटियों को फुल्के कहते हैं। ऐसे फुल्के बनाओ। धोई हुई दाल पकाओ। हलवा, रोटी आदि-आदि अच्छा निर्दोष भोजन खाओ। हे काजी! सुनो, माँस ना खाओ। परमात्मा की साधना करने के उद्देश्य से (रोजे) व्रत रखते हो, (तसबी) माला से जाप भी करते हो। फिर खून करते हो यानि गाय, मुर्गी-मुर्गा, बकरा-बकरी मारते हो। यह परमात्मा के साथ धोखा कर रहे हो। परमात्मा कबीर जी ने सद् उपदेश दिया।

परंतु काजी तथा मुल्लाओं ने उसका दुःख माना। {कहते हैं कि कहैं भली माने बुरी, यही परिक्षा नीच। जितना धोवे कच्ची भींत को उतनी मांचे कीच। अर्थात् दुष्ट इंसान को अच्छी शिक्षा देने से भी वह उसे बुरी मानता है। जैसे कच्ची ईंटों से बनी दिवार को जितना धोया जाए, उसमें कीचड़ ही बनता जाता है।}(596.598)

उस दिन दिल्ली का सम्राट सिकंदर लोधी (बहलोल लोधी का पुत्र) काशी नगर में आया हुआ था। पाँच-दस हजार मुसलमान मिलकर सिकंदर लोधी के पास विश्रामगृह में गए। काजियों ने कहा कि हे जहांपनाह (जगत के आश्रय)! हमारे धर्म की तो बेइज्जती कर दी। हम तो कहीं के नहीं छोड़े। एक कबीर नाम का जुलाहा काफिर हमारे धर्म के धार्मिक कर्मों को नीच कर्म बताता है। अपने को (अलख अल्लाह) सातवें आसमान वाला अदृश्य परमात्मा कहता है। परमात्मा कबीर जी के साथ खैंचातान (परेशानी) शुरू हुई।

सिकंदर राजा के आदेश से दस सिपाही परमात्मा कबीर जी को बाँधकर हथकड़ी लगाकर लाए। काजी-मुल्ला की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। गर्व से पगड़ी ऊँची कर ली। बोले कि हे राजन! यह जुलाहा पूर्ण रूप से काफिर (दुष्ट) है। यह माँस भी नहीं खाता। इसके हृदय में दया नाम की कोई वस्तु नहीं है। इसकी माता को तथा इसके पिता को भी पकड़कर लाया जाए।(604)

मोमिन (मुसलमान) नीरू को भी पकड़ लिया। माता नीमा को भी पकड़ लिया। उन दोनों को भी वहीं राजा के पास ले आए। एक गाय को काट दिया।(605) राजा सिकंदर बोला कि हे काफिर! तू अपने को (अल्लाह) परमात्मा कहता है। यदि परमात्मा है तो इस दो टुकड़े हुई गाय को जीवित कर दे। हमारे नबी मुहम्मद ने मृत गाय को जीवित किया था। जीवित कर, नहीं तो तेरे टुकड़े कर दिए जाएँगे। अब चुपचाप क्यों बैठा है? दिखा अपनी शक्ति।(606)

पारख के अंग की वाणी नं. 607,610

हमहीं अलख अल्लाह हैं, कुतब गोस अरू पीर। गरीबदास खालिक धनी, हमरा नाम कबीर।।607।।
मैं कबीर सरबंग हूँ, सकल हमारी जाति। गरीबदास पिंड प्राण में, जुगन जुगन संग साथ।।608।।
गऊ पकरि बिसमिल करी, दरगह खंड अजूद। गरीबदास उस गऊ का, पीवै जुलहा दूध।।609।।
चुटकी तारी थाप दे, गऊ जिवाई बेगि। गरीबदास दूझन लगी, दूध भरी है देग।।610।।

सरलार्थ :- कबीर परमात्मा बोले कि मैं अदृश परमात्मा हूँ। मैं ही संत तथा सतगुरू हूँ। मेरा नाम कबीर (अल्लाह अकबर) है। मैं (खालिक) संसार का मालिक (धनी) हूँ। मैं कबीर सर्वव्यापक हूँ। जो गाय मार रखी थी, उसके गर्भ का बच्चा व गाय के दो-दो टुकड़े हुए पड़े थे। परमात्मा कबीर जी ने हाथ से थपकी मारकर दोनों माँ-बच्चे को जीवित कर दिया। दूध की बाल्टी भर दी। कबीर जी ने वह दूध पीया तथा कहा :-

राग बिलावल का शब्द नं. 12

दरदबंद दरबेश है,बे दरद कसाई। संत समागम किजिये तज लोक बड़ाई।।टेक।। डिंभी डिंभ न छाड़हीं, मरहट के भूता। घर घर द्वारै फिरत हैं, कलियुग के कूता।।1।। डिंभ करैं डूंगर चढैं, तप होम अंगीठी। पंच अग्नि पाखंड है, याह मुक्ति बसीठी।।2।। पाती तोरे क्या हुवा, बहु पान झरोरे। तुलसी बकरा खा गया, ठाकुर क्या बौरे।।3।। पीतल ही का थाल है, पीतल का लोटा। जड़ मूरत कूं पूजते, आवैगा टोटा।।4।। पीतल चमचा पूजिये, जो खान परोसै। जड़ मूरत किस काम की, मत रहा भरोसै।।5। काशी गया प्रयाग रे, हरि पैडी न्हाये। द्वारामती दर्शन किये, बौह दाग दगाये।।6।।इन्द्र दौंन अस्नान रे, कर पुष्कर परसे। द्वादस तिलक बनाय कर, बहु चंदन चरचे।।7।। अठसठ तीरथ सब किये, बिंद्राबन फेरी। नाम बिना खुल्हे नहीं, दिव्य दृष्टि अंधेरी।।8।। सतगुरु भेद लखाइया, निज नूर निशानी। कहता दास गरीब है, छूटै सो प्रानी।।9।।12।।

सिकंदर राजा को यह प्रथम (परिचय) चमत्कार दिखाया था यानि अपनी शक्ति का परिचय दिया था। काजी तथा मुल्ला उदास हो गए। उनकी नानी-सी मर गई। हजारों दर्शक शहर निवासी यह खड़े देख रहे थे। माता तथा पिता को धन्य-धन्य कहने लगे कि धन्य है तुम्हारा पुत्र कबीर।

पारख के अंग की वाणी नं. 613,619 का सरलार्थ


कबीर परमात्मा जुलाहे का कार्य करता था। परंतु उस दिन जनता को पता चला कि यह बहुत सिद्धि वाला है। परमात्मा कबीर जी विशेष मुद्रा बनाए खड़े थे। उनका चेहरा सिंह (शेर) की तरह दिखाई दे रहा था। यह देखकर राजा सिकंदर बहुत आधीन हो गया। कबीर परमात्मा के चरणों में गिर गया। कबीर परमात्मा बोले कि लाओ कहाँ है गाय का माँस? परमात्मा कबीर खम्बे की तरह अडिग खड़े रहे। सिकंदर बादशाह चरणों में लेट गया।

कबीर परमात्मा जी ने कहा कि हे राजन! अगर-मगर त्यागकर सीधे मार्ग चलो। अपना कल्याण करवाओ। पाप न करो। जब राजा सिकंदर ने परमात्मा कबीर जी के चरणों में लेटकर प्रणाम किया तो काजी-मुल्ला भाग गए। अहंकार में सड़ रहे थे। परमात्मा सामने था। उससे द्वेष कर रहे थे। राजा सिकंदर ने परमात्मा कबीर जी तथा उसके मुँहबोले माता-पिता (नीरू-नीमा) को पालकियों में बैठाकर सम्मान के साथ उनके घर भेजा। काजी-मुल्ला (एँठ) अकड़कर यानि नाराज होकर चले गए। फिर मौके की तलाश करने लगे कि किसी तरह सिकंदर राजा के समक्ष कबीर को नीचा दिखाया जाए।

पारख के अंग की वाणी नं. 620,635 का सरलार्थ :- इस घटना से अपनी अधिक बेइज्जती मानकर काजी-पंडित राजा से रूष्ट होकर शहर त्यागने की धमकी देकर चलने लगे और कहा कि यह जंत्र-मंत्र जानता है। अगले दिन जब राजा सिकंदर के गुरू शेखतकी को पता चला तो अपनी करामात दिखाने के लिए कबीर जी को आते देखकर शेखतकी ने जंत्र-मंत्र करके मूठ छोड़ी। (मूठ एक आध्यात्मिक शक्ति होती है जो तांत्रिक लोग प्रयोग करते हैं जो जान तक ले लेती है।) उस मूठ (जंत्र-मंत्र) ने कबीर जी पर तो कार्य किया नहीं क्योंकि वे तो परमात्मा हैं, सामने एक कुत्ते पर लगी। वह कुत्ता मर गया।
परमेश्वर कबीर जी ने उस कुत्ते का कान पकड़ा और कहा कि चल उठ।

कुत्ता उठकर दौड़ गया और उस मूठ से कहा कि तू जिसने छोड़ी थी, उसके पास जा। परमेश्वर कबीर जी के कहते ही वह शक्ति उल्टी शेखतकी को लगी। शेखतकी की मृत्यु हो गई। काजियों ने जाकर राजा सिकंदर लोधी को बताया कि आपके पीर शेखतकी को कबीर जी ने मार दिया है। उसका अंतिम संस्कार कराओ। यह बात सुनकर सिकंदर क्रोधित होकर बोला, ‘‘लाओ कबीर को पकड़कर।‘‘ कबीर जी को लाया गया। आँखें लाल करके सिकंदर लोधी ने राजा ने कहा कि तूने शेखतकी को मारा है। उपस्थित काजी व मुसलमान जनता ने कहा कि कबीर जुलाहे की तलवार से गर्दन काट दो। परमेश्वर कबीर जी उठकर चल पड़े तो काजी तथा मुल्ला ने परमेश्वर की बांह (बाजुओं) को पकड़ लिया। परमेश्वर कबीर जी ने काजी को पाँच गर्दनी (सिर से टक्कर) मारी। पाँच टक्कर लगने से काजी गिर गया तथा उसकी गुदा बाहर को निकल गई।

(काँच्य निकल गयी) मुल्ला ने कबीर जी को तुक्का (लात से ठोकर = पैर से ठोकर) मारा तो वह स्वयं ही दो बीक (कदम = दस फुट) दूर जा गिरा। सिकंदर राजा को परमेश्वर कबीर जी के मस्तिक में दोनों सेलियों के बीच (भृकुटी) में सूर्य तथा चन्द्रमा चमकते दिखाई दिए। राजा ने उठकर परमात्मा कबीर जी के कदम छूए तथा कहा कि आप परमात्मा का स्वरूप (अल्लाह की जात) हो। कबीर जी ने मृत शेखतकी के चुतड़ों पर तुक्का (लात) मारा। उसी समय शेखतकी पीर जीवित हो गया। परमेश्वर कबीर जी ने उपस्थित मुसलमान तथा हिन्दू जनता को पुनः सत्य उपदेश दिया।
बहुतों ने कबीर जी से दीक्षा ली, परंतु जो गुरू पद पर थे तथा जो अपनी रोजी-रोटी (निर्वाह) जनता को भ्रमित करके चला रहे थे, वे नहीं माने। कबीर जी की मुँह बोली माता श्रीमति नीमा ने कहा, हे बेटा कबीर! तूने गाय तो जीवित कर दी थी, परंतु दूध निकालने की क्या आवश्यकता थी। उसी समय उठकर क्यों नहीं चल पड़ा? माता समझा रही थी कि ऐसे राक्षस स्वभाव के व्यक्ति के पास अधिक समय नहीं लगाना चाहिए।

पारख के अंग की वाणी नं. 636,648 का सरलार्थ


परमेश्वर कबीर जी का उद्देश्य था कि हिन्दू तथा मुसलमान सब मेरे बच्चे हैं। इनको काल ब्रह्म (ज्योति निरंजन) भ्रमित कर रहा है। मेरी ही आत्माओं को मेरे से भिड़ा रहा है। मेरा उद्देश्य इनको पाप से बचाना है। इसलिए बार-बार यही कहा है कि हे काजी! गलत साधना त्याग दो। रोजा ना रखो। परमात्मा की सच्ची साधना करो। मानव जन्म का समय हाथ से छूट जाएगा। फिर नरक में डाला जाएगा।

हे काजी! आपने परमात्मा की (रूह) आत्मा (गाय या अन्य जीव) मार दी। वह आपसे (राजी) प्रसन्न कैसे होगा? परमात्मा के दरबार में लेखा होगा। वहाँ आपका पाप सामने आएगा। पाप ना कर। परमात्मा के दरबार में जब पाप करने वाले का हिसाब होगा, उस समय चाहे करोड़, अरब-खरब अर्ज क्षमा करने के लिए करना, क्षमा नहीं होगे। काजी तथा मुल्ला व जो अन्य पाप करते हैं, जीव हिंसा करते हैं, नरक में डाले जाएँगे। सब (खोट) कसूर सामने रखे जाएँगे। काजी, मुल्ला तथा पंडित जो दोनों धर्मों के प्रचारक हैं, ये तीनों महादोषी ठहराए जाएँगे। काजी-मुल्ला ने गर्भ वाली गाय मार दी।

उसमें गर्भ मरा, वह गाय मरी। गाय बच्चा उत्पन्न करती है, उसे ब्यांत कहते हैं। एक ब्यांत में आठ-नौ महीने दूध देती है। एक बच्चा देती है। घी-दूध खाते। माँस खाकर पाप के भागी बन गए। कुछ तो विचार करो। पवित्र पुस्तक कुरान को पढ़ते हो। पाप साथ-साथ करते हो। यह भक्ति नहीं है। धोखा हो रहा है। (बहीसत) स्वर्ग-स्वर्ग क्या करते हो? नरक में जाओगे। स्वर्ग में खूनी को जगह नहीं है। ब्राह्मण तो हिन्दुओं का (देव) देवता है, मुल्ला मुसलमानों का (पीर) मार्गदर्शक है। परमात्मा के दरबार में दोनों का दोष साबित होगा।

ब्राह्मण शास्त्रविधि त्यागकर मनमाना आचरण करते व करवाते हैं जो गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में मना किया है। इसलिए दोषी हैं। देवी को बलि के लिए बकरा, झोटा काटकर चढ़ाते हैं। इसलिए भी ब्राह्मण यानि गुरू दोषी है। एक काजी ने तथा एक पंडित (गुरू) ने दोनों धर्मों को डुबो दिया। हिन्दू सूअर का माँस खाते हैं, मुसलमान गाय का। दोनों से राम कहो चाहे रहीम, बहुत दूर है यानि परमात्मा तो ऐसे व्यक्तियों से सौ कोस (तीन सौ किलोमीटर) दूर है।

सब पंथों के हिन्दुओं को भक्ति-शक्ति में कबीर जी द्वारा पराजित करना


पारख के अंग की वाणी नं. 649,702 का सरलार्थ :- काजी तथा पंडितों ने विचार-विमर्श किया कि राजा सिकंदर को तो सिद्धि दिखाकर प्रभावित कर लिया। यह कुछ करने वाला नहीं है। तब उन्होंने कबीर परमेश्वर जी को शास्त्रार्थ की चुनौती दी।

शास्त्रार्थ में भी काजी-पंडितों की किरकिरी हो गई तो सिकंदर राजा के पास फिर गए और कहा कि आप अपने सामने हमारी तथा कबीर जी की सिद्धि-शक्ति का परीक्षण करो। हमारा मुकाबला कराओ। उस समय भिन्न-भिन्न प्रकार के साधक, कोई कनफटा नाथ परंपरा से, दण्डी स्वामी, सन्यासी, षटदर्शनी वाले बाबा सब इकट्ठे हुए थे जो संत कबीर जी से ईर्ष्या करते थे। हाथों में पत्थर लेकर कबीर जी से कहने लगे कि तू हमारे देवताओं का अपमान करता है। हे जुलाहे! तुझे पत्थर मारेंगे। सिकंदर लोधी के पास जाकर पंडितों तथा मुल्ला-काजियों ने कहा कि कबीर जुलाहा पापी है। उसके दिल में दया नहीं है। वह सबके धर्मों में दोष देखता है। हिन्दुओं से राम-राम नहीं करता तथा मुसलमानों से सलाम भी नहीं करता। कुछ और ही बोलता है। सत साहेब।



संत गरीबदास जी ने तर्क दिया है कि उस काशी नगरी के सब ही नागरिकों की बुद्धि का नाश हो चुका था जो परमात्मा को तो नीच कह रहे थे तथा अपनी गलत साधना को उत्तम बता रहे थे और दयावान कबीर परमेश्वर जी को निर्दयी बता रहे थे। स्वयं जो सर्व व्यसन करते थे, लोगों को ठगते थे, अपने को श्रेष्ठ कह रहे थे।

राजा सिकंदर ने कहा कि आप तथा कबीर एक स्थान पर इकट्ठे होकर अपना एक ही बार फैसला कर लो। बार-बार के झगड़े अच्छे नहीं होते। पंडित तथा अन्य हिन्दू संत एक ओर तथा कबीर जी तथा रविदास जी एक ओर। एक निश्चित स्थान पर आमने-सामने बैठ गए। मध्य में 20 फुट की दूरी रखी गई जहाँ पर पत्थर की सुंदर टुकडि़यों पर देवताओं की मूर्तियाँ रखी थी तथा शर्त रखी गई कि पत्थर की एक शिला (सुंदर चकोर टुकड़ी) पर चारों वेद रखे जाएंगे तथा अन्य शिलाओं पर चाँदी, सोने तथा पत्थर के सालिग्राम (विष्णु तथा लक्ष्मी व गणेश आदि देवताओं की मूर्तियाँ) रखी जाएंगी। जिनकी सत्य भक्ति होगी, उनकी ओर शिला ही चलकर जाएगी।

ऐसा ही किया गया। जब पत्थर की शिला पर देवताओं की मूर्ति रखी और पंडितजन वेद वाणी पढ़ने लगे। उसी समय कुत्ता आया और उन पत्थर के देवताओं के मुख में टाँग उठाकर मूतकर भाग गया। धो-मांजकर साफ करके फिर सजाए। फिर कुत्ता आया, मूत की धार मारकर दौड़ गया। परमेश्वर कबीर जी तथा संत रविदास जी बहुत हँसे। ऐसा तीन बार किया। फिर विशेष सुरक्षा में मूर्ति रखकर पहले पंडितों ने अपनी भक्ति प्रारम्भ की।

हवन किए, वेदों के मंत्रों का उच्चारण किया, परंतु जिस चौकी (सुसज्जित पत्थर की शिला जिस पर देव मूर्तियाँ रखी थी) टस से मस नहीं हुई। राजा सिकंदर ने कहा कि हे कबीर जी! आप अपनी भक्ति-शक्ति से इन देवताओं को अपनी ओर बुलाओ। कबीर जी ने कहा कि राजन! जब उच्च जाति के स्वच्छ वस्त्र धारण किए हुए स्नान किए हुए पंडितों से देवता अपनी ओर नहीं बुलाए गए तो मुझ शुद्र के पास इनके देवता कैसे आएँगे? सिकंदर लोधी बादशाह ने कहा कि हे कबीर जी! आपकी सच्ची भक्ति है। आप इन देवताओं को बुलाओ।

कबीर जी ने सत्यनाम का श्वांस से जाप किया तथा रविदास के साथ अपनी महिमा के शब्द गाने लगे। उसी समय पत्थर की शिला तथा उन पर रखे पत्थर, पीतल के देवता अपने आप सरक कर (धीरे-धीरे चलकर) सब कबीर जी की गोद में बैठ गए। यह देखकर पंडित जी उन अठारह बोध वाली पुस्तकों (चारों वेद, पुरण, छः शास्त्र, उपनिषद आदि कुल अठारह बोध यानि ज्ञान की पुस्तकें मानी गई हैं, को) वहीं पटककर चले पड़े क्योंकि उनको कुत्ते के मूत की बूँदें (छींटें) लग गई थी। सब उपस्थित नकली विद्वान विचार करने लगे कि कबीर जुलाहे यानि शुद्र जाति वाले के पास भक्ति कैसे गई? परंतु वे अभिमानी-बेईमान अज्ञानी पंडित तथा काजी-मुल्ला व अन्य संत फिर भी परमात्मा के चरणों में नहीं गिरे।

संत रविदास जी द्वारा सात सौ पंडितों को शरण में लेना

पारख के अंग की वाणी नं. 703,709

तुम पण्डित किस भांतिके, बोलत है रैदास। गरीबदास हरि हेतसैं, कीन्हा यज्ञ उपास।।703।।
यज्ञ दई रैदासकूं, षटदर्शन बैठाय। गरीबदास बिंजन बहुत, नाना भांति कराय।।704।।
चमरा पंडित जीमहीं, एक पत्तल कै मांहि। गरीबदास दीखै नहीं, कूदि कूदि पछतांहि।।705।।
रैदास भये है सात सै, मूढ पंडित गलखोडि़। गरीबदास उस यज्ञ में, बौहरि रही नहीं लोडि़।।706।।
परे जनेऊ सात सै, काटी गल की फांस। गरीबदास जहां सोने का, दिखलाया रैदास।।707।।
सूत सवामण टूटिया, काशी नगर मंझार। गरीबदास रैदासकै, कनक जनेऊ सार।।708।।
पंडित शिष्य भये सात सै, उस काशी कै मांहि। गरीबदास चमार कै, भेष लगे सब पाय।।709।।
सरलार्थ :- संत रविदास जी का जन्म चमार समुदाय में काशी नगर में हुआ। ये परमेश्वर कबीर जी के समकालीन हुए थे। परम भक्त रविदास जी अपना चर्मकार का कार्य किया करते थे। भक्ति भी करते थे। परमेश्वर कबीर जी ने काशी के प्रसिद्ध आचार्य स्वामी रामानन्द जी को यथार्थ भक्ति मार्ग समझाया था। अपना सतलोक स्थान दिखाकर वापिस छोड़ा था। उससे पहले स्वामी रामानन्द जी केवल ब्राह्मण जाति के व्यक्तियों को ही शिष्य बनाते थे। उसके पश्चात् स्वामी रामानंद जी ने अन्य जाति वालों को शिष्य बनाना प्रारम्भ किया था। संत रविदास जी ने भी आचार्य रामानन्द जी से दीक्षा ले रखी थी। भक्ति जो परमेश्वर कबीर जी ने स्वामी रामानन्द जी को प्रथम मंत्र बताया था, उसी को दीक्षा में स्वामी जी देते थे।

संत रविदास जी उसी प्रथम मंत्र का जाप किया करते थे। एक दिन संत रविदास को एक ब्राह्मण रास्ते में मिला और बोला, भक्त जी! आप गंगा स्नान के लिए चलोगे, मैं जा रहा हूँ। संत रविदास जी ने कहा कि ‘मन चंगा तो कटोती में गंगा’, मैं नहीं जा रहा हूँ। पंडित जी बोले कि आप नास्तिक से हो गए लगते हो। आप उस कबीर जी के साथ क्या रहने लगे हो, धर्म-कर्म ही त्याग दिया है। कुछ दान करना हो तो मुझे दे दो। मैं गंगा मईया को दे आऊँगा। रविदास जी ने जेब से एक कौड़ी निकालकर ब्राह्मण जी को दी तथा कहा कि हे विप्र! गंगा जी से मेरी यह कौड़ी देना।

एक बात सुन ले, यदि गंगा जी हाथ में कौड़ी ले तो देना अन्यथा वापिस ले आना। यह कहना कि हे गंगा! यह कौड़ी काशी शहर से भक्त रविदास ने भेजी है, इसे ग्रहण करें। पंडित जी ने गंगा दरिया पर खड़ा होकर ये शब्द कहे तो गंगा ने किनारे के पास हाथ निकालकर कौड़ी ली और दूसरे हाथ से पंडित जी को एक स्वर्ण का कंगन दिया जो अति सुंदर व बहुमूल्य था। गंगा ने कहा कि ये कंगन परम भक्त रविदास जी को देना। कहना कि आपने मुझ गंगा को कृतार्थ कर दिया अपने हाथ से प्रसाद देकर। मैं संत को क्या भेंट दे सकती हूँ? यह तुच्छ भेंट स्वीकार करना।

संत रविदास जी द्वारा सात सौ पंडितों को शरण में लेना
पंडित जी उस कंगन को लेकर चल पड़ा। पंडित जी के मन में लालच हुआ कि यह कंगन राजा को दूँगा। राजा इसके बदले में मुझे बहुत धन देगा। वह कंगन पंडित जी ने राजा को दिया जो अद्भुत कंगन था। पंडित जी को बहुत-सा धन देकर विदा किया और उसका नाम, पता नोट किया। राजा ने वह कंगन रानी को दिया। रानी ने कंगन देखा तो अच्छा लगा। ऐसा कंगन कभी देखा ही नहीं था। रानी ने कहा कि एक कंगन ऐसा ही ओर चाहिए। जोड़ा होना चाहिए। राजा ने उसी पंडित को बुलाया और कहा कि जैसा कंगन पहले लाया था, वैसा ही एक और लाकर दे। जो धन कहेगा, वही दूँगा। यदि नहीं लाया तो सपरिवार मौत के घाट उतारा जाएगा। उस धोखेबाज (420) के सामने पहाड़ जैसी समस्या खड़ी हो गई। सब सुनारों (श्राफों) के पास फिरकर अंत में परम भक्त रविदास जी के पास आया। अपनी गलती स्वीकार की। सर्व घटना गंगा को कौड़ी देना, बदले में कंगन लेना।

उस कंगन को भक्त रविदास जी को न देकर मुसीबत मोल लेना। पंडित जी ने गिड़गिड़ाकर रविदास जी से अपने परिवार के जीवन की भिक्षा माँगी। रविदास जी ने कहा कि पंडित जी! आप क्षमा के योग्य नहीं हैं, परंतु परिवार पर आपत्ति आई है। इसलिए आपकी सहायता करता हूँ। आप इस पानी कठोती (मिट्टी का बड़ा टब जिसमें चमड़ा भिगोया जाता था) में हाथ डाल और गंगा से यह कह कि भक्त रविदास जी की प्रार्थना है कि आप कठोती में आएँ और एक कंगन वैसा ही दें। ऐसा कहकर पंडित जी ने जो रविदास के चमार होने के कारण पाँच फुट दूर से बातें करता था, अब उस चाम भिगोने वाले कुंड (टब) में हाथ देकर देखा तो हाथ में चार कंगन वैसे ही आए। भक्त रविदास जी ने कहा कि पंडित जी! एक ले जाना, शेष गंगा जी को लौटा दे, नहीं तो भयंकर आपत्ति ओर आ जाएगी। ब्राह्मण ने तुरंत तीन कंगन वापिस कुण्ड में डाल दिए और एक कंगन लेकर राजा को दिया। रानी ने पूछा कि यह कंगन कहाँ से लाए हो, मुझे बता। ब्राह्मण ने संत रविदास जी का पता बताया।

रानी ने सोचा कि कोई स्वर्णकार होगा और ढ़ेर सारे कंगन लाऊँगी। रानी को एक असाध्य रोग था। पित्तर का साया भी था। बहुत परेशान रहती थी। सब जगह उपचार करा लिया था। साधु-संतों का आशीर्वाद भी ले चुकी थी। परंतु कोई राहत नहीं मिल रही थी। रानी उस पते पर गई। साथ में नौकरानी तथा अंगरक्षक भी थे। रानी ने संत रविदास जी के दर्शन किए। दर्शन करने से ही रानी के शरीर का कष्ट समाप्त हो गया। रानी को ऐसा अहसास हुआ जैसे सिर से भारी भार उतर गया हो। रानी ने संत जी के तुरंत चरण छूए। रविदास जी ने कहा कि मुझ निर्धन के पास मालकिन का कैसे आना हुआ? रानी ने कहा कि मैं तो सुनार की दुकान समझकर आई थी गुरूजी। मेरा तो जीवन धन्य हो गया।

मेरा जीवन नरक बना था रोग के कारण। आपके दर्शन से वह स्वस्थ हो गया। मैंने इसके उपचार के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी। परंतु कोई लाभ नही हो रहा था। संत रविदास जी ने कहा कि बहन जी! आपके पास भौतिक धन तो पर्याप्त है। यह आपके पूर्व जन्म के पुण्यों का फल है। भविष्य में भी सुख प्राप्ति के लिए आपको वर्तमान में पुण्य करने पड़ेंगे।
आध्यात्म धन संग्रह करो। रानी ने कहा कि संत जी! मैं बहुत दान-धर्म करती हूँ। महीने में पूर्णमासी को भण्डारा करती हूँ।

आसपास के ब्राह्मणों तथा संतों को भोजन कराती हूँ। संत रविदास जी ने कहा :-

बिन गुरू भजन दान बिरथ हैं, ज्यूं लूटा चोर। न मुक्ति न लाभ संसारी, कह समझाऊँ तोर।।

कबीर, गुरू बिन माला फेरते, गुरू बिन देते दान। गुरू बिन दोनों निष्फल हैं, चाहे पूछो बेद पुरान।।
रानी ने कहा कि हे संत जी! मैंने एक ब्राह्मण गुरू बनाया है। रविदास जी ने कहा कि नकली गुरू से भी कुछ लाभ नहीं होने का। आप जी ने गुरू भी बना रखा था और कष्ट यथावत थे। क्या लाभ ऐसे गुरू से? रानी ने कहा कि आप सत्य कहते हैं। आप मुझे शिष्या बना लो। रविदास जी ने रानी को प्रथम मंत्र दिया। रानी ने कहा कि गुरूजी! अबकी पूर्णमासी को आपके नाम से भोजन-भण्डारा (लंगर) करूंगी। आप जी मेरे घर पर आना।

निश्चित तिथि को रविदास जी राजा के घर पहुँचे। पूर्व में आमंत्रित सात सौ ब्राह्मण भी भोजन-भण्डारे में पहुँचे। भण्डारा शुरू हुआ। रानी ने अपने गुरू रविदास जी को अच्छे आसन पर बैठा रखा था। उसके साथ सात सौ ब्राह्मणों को भोजन के लिए पंक्ति में बैठने के लिए निवेदन किया। ब्राह्मण कई पंक्तियों में बैठे थे। भोजन सामने रख दिया गया था। उसी समय ब्राह्मणों ने देखा कि रविदास जी अछूत जाति वाले साथ में बैठे हैं। सब अपने-अपने स्थान पर खड़े हो गए और कहने लगे कि हम भोजन नहीं करेंगे। यह अछूत रविदास जो बैठा है, इसे दूर करो। रानी ने कहा कि यह मेरे गुरू जी हैं, ये दूर नहीं होंगे। संत रविदास जी ने रानी से कहा कि बेटी! आप मेरी बात मानो। मैं दूर बैठता हूँ। रविदास जी उठकर ब्राह्मणों ने जहाँ जूती निकाल रखी थी, उनके पीछे बैठ गए।

पंडितजन भोजन करने बैठ गए। उसी समय रविदास जी के सात सौ रूप बने और प्रत्येक ब्राह्मण के साथ थाली में खाना खाते दिखाई दिए। एक ब्राह्मण दूसरे को कहता है कि आपके साथ एक शुद्र रविदास भोजन कर रहा है, छोड़ दे इस भोजन को। सामने वाला कहता है कि आपके साथ भी भोजन खा रहा है। इस प्रकार प्रत्येक के साथ रविदास जी भोजन खाते दिखाई दिए। रविदास जी दूर बैठे कहने लगे कि हे ब्राह्मणगण! मुझे क्यों बदनाम करते हो, देखो! मैं तो यहाँ बैठा हूँ।
इस लीला को राजा, रानी, मंत्र सब उपस्थित गणमान्य व्यक्ति भी देख रहे थे। तब रविदास जी ने कहा कि ब्राह्मण कर्म से होता है, जाति से नहीं। अपने शरीर के अंदर (खाल के भीतर) स्वर्ण का जनेऊ दिखाया। कहा कि मैं वास्तव में ब्राह्मण हूँ। मैं जन्म से ब्राह्मण हूँ। कुछ देर सत्संग सुनाया। उस समय सात सौ ब्राह्मणों ने अपने नकली जनेऊ (कच्चे धागे की डोर जो गले में तथा कॉख के नीचे से दूसरे कंधे पर बाँधी होती है) तोड़कर संत रविदास जी के शिष्य हुए। सत्य साधना करके अपना कल्याण कराया। सात सौ ब्राह्मणों के जनेऊओं के सूत का सवा मन (50 कि.ग्राम) भार तोला गया था।

पुरी के जगन्नाथ मंदिर में राम सहाय पाण्डेय के पैर को गर्म प्रसाद से जलने से काशी में बैठे कबीर जी ने बचाया‘‘


पारख के अंग की वाणी नं. 710,725

मनसा वाचा कर्मणा, षटदर्शन खटकंत। गरीबदास समझे नहीं, भरमे भेष फिरंत।।710।।
सहज मते सतगुरु गये, शाह सिकंदर पास। गरीबदास आसन दिया, संग तहां रैदास।।711।।
पग ऊपरि जल डारि करि, हो गये खडे कबीर। गरीबदास पंडा जर्या, तहां पर्या योह नीर।।712।।
जगन्नाथ जगदीश का, जरत बुझाया पंड। गरीबदास हर हर करत, मिट्या कलप सब दंड।।713।।
शाह सिकंदरकूं कह्या, कहा किया येह ख्याल। गरीबदास गति को लखै, पंड बचाया ततकाल।।714।।
तुरतही पती लिखाय करि, भेज्या सूत्र सवार। गरीबदास पौंहचे तबै, पंथ लगे दशबार।।715।।
जगन्नाथके दर्श करि, दूत पूछि हैं पंड। गरीबदास कैसैं जर्या, कहौ बिथा पग हंड।।716।।
पंडा कहै सु दूतसैं, या बिधि दाझ्या पांय। गरीबदास अटका फुट्या, बेगही दिया सिराय।।717।।
किन बुझाया मुझि कहौ, सुनि पंडा योह पांव। गरीबदास साची कहौ, ना कछु और मिलाव।।718।।
पंड कहै सोई साच मानि, सुनौं हो दूत मम बीर। गरीबदास यहां खडे़ थे, डार्या नीर कबीर।।719।।
कहौ कबीर कहां बसत है, कौंन जिन्हौंकी जाति। गरीबदास पंडा कहै, ज्यूंकी त्यूंही बात।।720।।
वै कबीर काशी बसैं, जाति जुलहदी तास। गरीबदास दर्शन करैं, जगन्नाथकै दास।।721।।
नितही आवत जात है, जगन्नाथ दरबार। गरीबदास उस जुलहदीकूं, पंडा लिया उबार।।722।।
पंडेकूं पतीया लिखी, जो कछु हुई निदान। गरीबदास बीती कही, लिखि भेज्या फुरमान।।723।।
आये काशी नगर में, दूत कही सत गल। गरीबदास इस जुलहदीकी, बड़ी मजल जाजुल।।724।। शाह सिकंदर सुनि थके, याह अचरज अधिकार। गरीबदास उस जुलहदीका, नित करि हैं दीदार।।725।।

सरलार्थ :- एक दिन शाम के समय परमेश्वर कबीर जी अपने साथ संत रविदास जी को लेकर राजा बीरदेव सिंह बघेल के दरबार में गए। उस दिन दिल्ली के सम्राट सिकंदर लोधी भी वहाँ आए हुए थे। सिकंदर लोधी पूरे भारत का शासक था, वह महाराजा था। काशी नरेश बीरदेव सिंह बघेल छोटे राजा थे जो दिल्ली के बादशाह के आधीन होते थे। दोनों संतों को बैठने के लिए आसन दिया गया। कुछ देर दोनों राजाओं के साथ परमात्मा की चर्चा की।

पुरी के जगन्नाथ मंदिर में राम सहाय पाण्डेय के पैर को गर्म प्रसाद से जलने से काशी में बैठे कबीर जी ने बचाया

फिर अचानक शीघ्रता से कबीर परमेश्वर जी ने खड़ा होकर अपने लोटे का जल अपने पैर के ऊपर डालना प्रारम्भ कर दिया। सिकंदर ने पूछा प्रभु! यह क्या किया अपने पैर के ऊपर पानी डाला, इसका कारण बताईये। कबीर जी ने कहा कि पुरी में जगन्नाथ के मन्दिर में एक रामसहाय नाम का पाण्डा पुजारी है। वह भगवान का खिचड़ी प्रसाद बना रहा था।
उसको उतारने लगा तो अति गर्म खिचड़ी उसके पैर के ऊपर गिर गई। वह चिल्लाकर अचेत हो गया था। यह बर्फ जैसा जल उसके जले हुए पैर पर डाला है, उसके जीवन की रक्षा की है अन्यथा वह मर जाता।

जगन्नाथ जी का मंदिर उड़ीसा प्रान्त में पुरी शहर में है जो बनारस से लगभग एक हजार किलोमीटर दूर है। यह बात राजा सिकंदर तथा बीरदेव सिंह बघेल के गले नहीं उतरी। कबीर जी को बताए बिना उसकी जाँच करने के आदेश दे दिए। दो सैनिक ऊँटों पर सवार होकर पुरी में गए। 10 दिन जाने में लगे। पुरी में जाकर पूछा कि रामसहाय पाण्डा कौन है? उसको बुलाया गया। सिपाहियों ने पूछा कि क्या आपका पैर खिचड़ी से जला था? उत्तर मिला-हाँ। प्रश्न किया कि किसने ठीक किया?

उत्तर मिला कि कबीर जी यहाँ पास ही खड़े थे, उन्होंने करमण्डल से हिमजल डाला था। उससे मेरी जलन बंद हो गई। यदि वे जल नहीं डालते तो मेरी छुट्टी हो गई थी, मैं अचेत हो गया था। प्रश्न-क्या समय था? शाम के समय सूर्य अस्त से लगभग एक घण्टा पहले। अन्य उपस्थित व्यक्तियों ने भी साक्ष्य दिया। सिपाहियों ने कहा सब लिखकर दस्तखत-अंगूठे लगाओ। रामसहाय पाण्डे ने तथा वहाँ के अन्य पुजारियों ने बताया कि कबीर जी तो नित्य-प्रतिदिन मन्दिर में आते हैं। सर्व प्रमाण लेकर-सुनकर दोनों सिपाही वापिस आए और सच्चाई बताई। दोनों राजा कबीर जी की कुटिया पर गए। दण्डवत प्रणाम किया तथा अपने अविश्वास रूपी अपराध की क्षमा माँगी।

बताया कि आप सत्य कह रहे थे। आप जी ने ही जगन्नाथ मंदिर के रामसहाय पाण्डे के पैर को जलने से बचाया था। हमने अपनी तसल्ली के लिए दो सैनिक भेजकर पता कराया है। आप स्वयं वह खुदा हो जो सातवें आसमान पर बैठा है। आप नर रूप धारण करके पृथ्वी पर लीला करने आए हो। परमेश्वर कबीर जी ने कहा महाराज! आपको यहाँ भी गलती लगी है। मैं तो अल्लाहु अकबर हूँ। मैं करोड़ों आसमानों के पार सत्यलोक (सतलोक) में तख्त पर विराजमान हूँ। यहाँ मैं आपके सामने खड़ा हूँ। मैं पैगम्बर मुहम्मद को भी मिला था। उन्होंने भी मुझे पहचानने में भूल की थी।

‘‘ परमेश्वर कबीर जी द्वारा वैश्या काे शरण में लेना व हजारों शिष्यों की परीक्षा लेना’’

बन्दी छोड़ कबीर परमेश्वर जी द्वारा अनेकों अनहोनी लीलाएँ करने से प्रभावित होकर चौंसठ लाख शिष्य बने थे। परमेश्वर तो भूत-भविष्य तथा वर्तमान की जानते हैं। उनको पता था कि ये सब चमत्कार देखकर तथा इनको मेरे आशीर्वाद से हुए भौतिक लाभों के कारण मेरी जय-जयकार कर रहे हैं। इनको मुझ पर विश्वास नहीं है कि मैं परमात्मा हूँ। परंतु देखा-देखी कहते अवश्य हैं कि कबीर जी हमारे सद्गुरू जी तो स्वयं परमात्मा आए हैं।

अपने लाभ भी बताते थे। एक दिन परमेश्वर कबीर जी ने शिष्यों की परीक्षा लेनी चाही कि देखूं तो कितने ज्ञान को समझे हैं। यदि इनको विश्वास ही नहीं है तो ये मोक्ष के अधिकारी नहीं हैं। ये तो मेरे सिर पर व्यर्थ का भार हैं। यह विचार करके एक योजना बनाई। अपने परम शिष्य रविदास से कहा कि एक हाथी किराए पर लाओ।

काशी नगर में एक सुंदर वैश्या थी। उसके मकान से थोड़ी दूरी पर किसी कबीर जी के भक्त का मकान था। कबीर जी उसके आँगन में रात्रि के समय सत्संग कर रहे थे। उस दिन उस वैश्या के पास भी ग्राहक नहीं थे। सत्संग के वचन सुनने के लिए वह अपने मकान की छत पर कुर्सी लेकर बैठ गई। पूर्ण रात्रि सत्संग सुना और उठकर सत्संग स्थल पर गई तथा परमात्मा कबीर जी को अपना परिचय दिया तथा कहा कि गुरू जी! क्या मेरे जैसी पापिनी का भी उद्धार हो सकता है। मैंने अपने जीवन में प्रथम बार आत्म कल्याण की बातें सुनी हैं। अब मेरे पास दो ही विकल्प हैं कि या तो मेरा कल्याण हो, या मैं आत्महत्या करके पापों का प्रायश्चित करूँ। परमात्मा कबीर जी ने कहा, बेटी! आत्महत्या करना महापाप है। भक्ति करने से सर्व पाप परमात्मा नष्ट कर देता है।

‘‘ परमेश्वर कबीर जी द्वारा वैश्या काे शरण में लेना व हजारों शिष्यों की परीक्षा लेना’’

आप मेरे से उपदेश लेकर साधना करो और भविष्य में पापों से बचकर रहना। उस बहन ने प्रतिज्ञा की और परमात्मा कबीर जी से दीक्षा लेकर भक्ति करने लगी तथा जहाँ भी प्रभु कबीर जी सत्संग करते, वहीं सत्संग सुनने जाने लगी। जिस कारण से कबीर जी के भक्तों को उसका सत्संग में आना अच्छा नहीं लगता था। वे उस लड़की को कहते थे कि तेरे कारण गुरू जी की बदनामी होती है।

तू सत्संग में मत आया कर। तू सबसे आगे गुरू जी के पास बैठती है, वहाँ ना बैठा कर। लड़की ने ये बातें गुरू कबीर जी को बताई और फूट-फूटकर रोने लगी। परमेश्वर जी ने कहा कि बेटी! आप सत्संग में आया करो। कबीर जी ने सत्संग वचनों द्वारा स्पष्ट किया कि मैला कपड़ा साबुन और पानी से दूर रहकर निर्मल कैसे हो सकता है? इसी प्रकार पापी व्यक्ति सत्संग से तथा गुरू से दूर रहकर आत्म कल्याण कैसे करा सकता है? भक्त वैश्या तथा रोगी से नफरत नहीं करते, सम्मान करते हैं। उसको ज्ञान चर्चा द्वारा मोक्ष प्राप्ति की प्रेरणा करते हैं। परमात्मा कबीर जी के बार-बार समझाने पर भी भक्तजन उस लड़की को सत्संग से मना करते रहे तथा बहाना करते थे कि तेरे कारण गुरू जी काशी में बदनाम हो गए हैं। काशी के व्यक्ति हमें बार-बार कहते हैं कि तुम्हारे गुरू जी के पास वैश्या भी जाती है। वह काहे का गुरू है।

एक दिन कबीर परमेश्वर जी ने उस लड़की से कहा कि बेटी! आप मेरे साथ हाथी पर बैठकर चलोगी। लड़की ने कहा, जो आज्ञा गुरूदेव! अगले दिन सुबह लगभग 10:00 बजे हाथी के ऊपर तीनों सवार होकर काशी नगर के मुख्य बाजार में से गुजरने लगे। संत रविदास जी हाथी को चला रहे थे। लड़की रविदास जी के पीछे कबीर जी के आगे यानि दोनों के बीच में बैठी थी। कबीर जी ने एक बोतल में गंगा का पानी भर लिया। उस बोतल को मुख से लगाकर घूंट-घूंटकर पी रहे थे। लोगों को लगा कि कबीर जी शराब पी रहे हैं।

शराब के नशे में वैश्या को सरेआम बाजार में लिये घूम रहे हैं। काशी के व्यक्ति एक-दूसरे को बता रहे हैं कि देखो! बड़े-बड़े उपदेश दिया करता कबीर जुलाहा, आज इसकी पोल-पट्टी खुल गई है। ये लोग सत्संग के बहाने ऐसे कर्म करते हैं। काशी के व्यक्ति कबीर जी के शिष्यों को पकड़-पकड़ लाकर दिखा रहे थे कि देख तुम्हारे परमात्मा की करतूत।
शराब पी रहे हैं, वैश्या को लिए सरेआम घूम रहा है। यह लीला देखकर वे चौंसठ लाख नकली शिष्य कबीर जी को त्यागकर चले गए। पहले वाली साधना करने लगे। लोक-लाज में फँसकर गुरू विमुख हो गए।

परमात्मा कबीर जी विशेषकर ऐसी लीला उस समय किया करते जिस समय दिल्ली का सम्राट सिकंदर लोधी काशी नगरी में आया हो। उस समय सिकंदर लोधी राजा काशी में उपस्थित था। काजी-पंडितों ने राजा को शिकायत कर दी कि कबीर जुलाहे ने जुल्म कर दिया। शर्म-लाज समाप्त करके सरेआम वैश्या के साथ हाथी के ऊपर गलत कार्य कर रहा था। शराब पी रहा है। राजा ने तुरंत पकड़कर गंगा में डुबोकर मारने का आदेश दिया। अपने हाथों से राजा सिकंदर ने कबीर परमेश्वर जी के हाथों में हथकड़ी तथा पैरों में बेड़ी तथा गले में तोक लगाई। नौका में बैठाकर गंगा दरिया के मध्य में ले जाकर दरिया में सिपाहियों ने पटक दिया। हथकड़ी, बेड़ी तथा तोक अपने आप टूटकर जल में गिर गई। परमात्मा जल पर पद्म आसन लगाकर बैठ गए। नीचे से गंगा जल चक्कर काटता हुआ बह रहा था।

परमात्मा जल के ऊपर आराम से बैठे थे। कुछ समय उपरांत परमात्मा कबीर जी गंगा के किनारे आ गए। सिपाहियों ने शेखतकी के आदेश से कबीर जी को पकड़कर नौका में बैठाकर कबीर परमात्मा के पैरों तथा कमर पर भारी पत्थर बाँधकर हाथ पीछे को रस्सी से बाँधकर गंगा दरिया के मध्य में फैंक दिया। रस्से टूट गए। पत्थर जल में डूब गए।

परमेश्वर कबीर जी जल के ऊपर बैठे रह गए। जब देखा कि कबीर गंगा दरिया में डूबा नहीं तो क्रोधित होकर शेखतकी के कहने से राजा ने तोब के गोले मारने का आदेश दे दिया। पहले कबीर जी को पत्थर मारे, गोली मारी, तीर मारे। अंत में तोब के गोले चार पहर यानि बारह घण्टे तक कबीर जी के ऊपर मारे। कोई तो वहीं किनारे पर गिर जाता, कोई दूसरे किनारे पर जाकर गिरता, कोई दूर तालाब में जाकर गिरता। एक भी गोला, पत्थर, बंदूक की गोली या तीर परमेश्वर कबीर जी के आसपास भी नहीं गया। इतना कुछ देखकर भी काशी के व्यक्ति परमेश्वर को नहीं पहचान पाए। तब परमेश्वर कबीर जी ने देखा कि ये तो अक्ल के अँधे हैं। उसी समय गंगा के जल में समा गए और अपने भक्त रविदास जी के घर प्रकट हो गए। दर्शकों को विश्वास हो गया कि कबीर जुलाहा गंगा जल में डूबकर मर गया है।

उसके ऊपर रेत व रेग (गारा) जम गई होगी। सब खुशी मनाते हुए नाचते-कूदते हुए नगर को चल पड़े। शेखतकी अपनी मण्डली के साथ संत रविदास जी के घर यह बताने के लिए गया कि जिस कबीर जी को तुम परमात्मा कहते थे, वह डूब गया है, मर गया है। संत रविदास जी के घर पर जाकर देखा तो कबीर जी इकतारा (वाद्य यंत्र) बजा-बजाकर शब्द गा रहे थे। शेखतकी की तो माँ सी मर गई। राजा सिकंदर के पास जाकर बताया कि वह आँखें बचाकर भाग गया है। रविदास के घर बैठा है। यह सुनकर बादशाह सिंकदर लोधी संत रविदास जी की कुटी पर गया। परमात्मा कबीर जी वहाँ से अंतर्ध्यान होकर गंगा दरिया के मध्य में जल के ऊपर समाधि लगाकर जैसे जमीन पर बैठते हैं, ऐसे बैठ गए। रविदास से पूछा कि कबीर जी कहाँ पर हैं? संत रविदास जी ने कहा कि हे बादशाह जी! वे पूर्ण परमात्मा हैं, वे ही अलख अल्लाह हैं। आप इन्हें पहचानो। वे तो मर्जी के मालिक हैं। जहाँ चाहें चले जाएँ।

मुझे कुछ नहीं पता, कहाँ चले गए? वे तो सबके साथ रहते हैं। उसी समय किसी ने बताया कि कबीर जी तो गंगा के बीच में बैठे भक्ति कर रहे हैं। सब व्यक्ति तथा राजा व सिपाही गंगा दरिया के किनारे फिर से गए। राजा ने नौका भेजकर मल्लाहों के द्वारा संदेश भेजा कि बाहर आएँ। मल्लाहों ने नौका कबीर जी के पास ले जाकर राजा का आदेश सुनाया कि आपको सिकंदर बादशाह याद कर रहे हैं। आप चलिए। परमेश्वर कबीर जी उस जहाज (बड़ी नौका) में बैठकर किनारे आए।

राजा सिकंदर ने फिर गिरफ्तार करवाकर हाथ-पैर बाँधकर खूनी हाथी से मरवाने की आज्ञा कर दी। चारों और जनता खड़ी थी। सिकंदर ऊँचे स्थान पर बैठे थे। परमात्मा को बाँध-जूड़कर पृथ्वी पर डाल रखा था। महावत (हाथी के ड्राइवर) ने हाथी को शराब पिलाई और कबीर जी को कुचलकर मरवाने के लिए कबीर जी की ओर बढ़ाया। कबीर जी ने अपने पास एक बब्बर सिंह खड़ा दिखा दिया। वह केवल हाथी को दिखा। हाथी चिंघाड़कर डर के मारे वापिस भाग गया। महावत को नौकरी का भय सताने लगा। हाथी को भाले मार-मारकर कबीर जी की ओर ले जाने लगा, परंतु हाथी उल्टा भागे। तब पीलवान (महावत) को भी शेर खड़ा दिखाई दिया तो डर के मारे उसके हाथ से अंकुश गिर गया।

हाथी भाग गया। परमेश्वर कबीर जी के बंधन टूट गए। कबीर जी खड़े हुए तथा अंगड़ाई ली तो लंबे बढ़ गए। सिर आसमान को छूआ दिखाई देने लगा। प्रकाशमान शरीर दिखाई देने लगा। सिकंदर राजा भय से काँपता हुआ परमेश्वर कबीर जी के चरणों में गिर गया। क्षमा याचना की तथा कहा कि आप परमेश्वर हैं। मेरी जान बख्शो। मेरे से भारी भूल हुई है। मैं अब आपको पहचान गया हूँ। आप स्वयं अल्लाह पृथ्वी पर आए हो। परमात्मा कबीर जी सीधे उसी गणिका के घर गए। आंगन में चारपाई पर बैठ गए।

लड़की परमात्मा के चरण दबाने लगी। सतगुरू का पैर अपनी सांथल (टांग) पर रखा था। उसी समय अर्जुन तथा सर्जुन नाम के दो शिष्य कबीर जी के आए। उनको अन्य मूर्ख शिष्यों ने बताया कि सतगुरू कबीर जी ने तो बेशर्म काम कर दिया। शराब पीने लगे हैं। वैश्या को लेकर सरेआम हाथी पर बैठाकर नगर में उत्पात मचाया है। हम तो मुँह दिखाने योग्य नहीं छोड़े हैं। अर्जुन तथा सर्जुन के गले उनकी यह बकवाद नहीं उतर रही थी। परंतु अनेकों गुरू भाई-बहनों द्वारा सुनकर उनके मन में भी दोष आ गया।

अर्जुन सर्जुन की कथा!

संत गरीबदास जी के सद्ग्रन्थ के ‘‘सरबंगी साक्षी’’ के अंग में अर्जुन-सर्जुन के विषय में वाणी लिखी हैं जो इस प्रकार हैं :- सरबंगी साक्षी के अंग की वाणी नं. 112-115 :-

गरीब, सुरजन कूं सतगुरू मले, मक्के मदीने मांहि। चौसठ लाख का मेल था, दो बिन सबही जाहिं।।112।।
गरीब, चिंडालीके चौक में, सतगुरू बैठे जाय। चौंसठ लाख गारत गये, दो रहे सतगुरू पाय।।113।।
गरीब, सुरजन अरजन ठाहरे, सतगुरू की प्रतीत। सतगुरू इहां न बैठिये, यौह द्वारा है नीच।।114।।
गरीब, ऊंच नीच में हम रहैं, हाड चाम की देह। सुरजन अरजन समझियो, रखियो शब्द सनेह।।115।।

सरलार्थ :- अर्जुन तथा सर्जुन दो मुसलमान धर्म के मानने वाले थे। अपने धर्म की परंपरा का निर्वाह करने मक्का-मदीना की मस्जिद में गए हुए थे। वहाँ परमात्मा कबीर जी उनको जिंदा बाबा के वेश में मिले थे। ज्ञान चर्चा करके सत्य मार्ग बताया था। वे कबीर परमात्मा के शिष्य बन गए थे। सतगुरू के आदेशानुसार वे फिर भी मक्का-मदीना या अन्य मुसलमान धर्म के धार्मिक कार्यक्रमों में जाकर भूलों को राह बताकर कबीर परमेश्वर से दीक्षा दिलाया करते थे। उस दिन वे बाहर से आए थे। जब सतगुरू कबीर जी को बदनाम वैश्या के घर देखा तथा लड़की की साथलों पर पैर रखे आँखों देखा तथा गलती कर गए। बोले कि हे सतगुरू! आप यहाँ न बैठो, यह तो नीच बदनाम औरत का घर है। कबीर परमात्मा ने कहा कि हे अर्जुन तथा सर्जुन! मैं ऊँच-नीच में सब स्थानों पर रहता हूँ।

अर्जुन सर्जुन की कथा

यह तो हाड-चाम का शरीर इस लड़की का है। मेरे लिए तो मिट्टी है। हे अर्जुन तथा सर्जुन! समझो। आपको जो दीक्षा नाम जाप की दे रखी है, उसका जाप करो। पहले तो तुम परमात्मा कहते थे। आज मुझे शिक्षा दे रहे हो। तुम तो मेरे गुरू बन गए। मोक्ष तो शिष्य बने रहने से होता है। अब आपके मन में कबीर के प्रति दोष आ गया है। कल्याण असंभव है। दोनों परमात्मा के लिए घर त्यागकर बचपन से लगे थे। उनको अहसास हुआ कि बड़ी गलती बन गई। तुरंत चरणों में गिर गए। इस जन्म में मोक्ष की याचना की। परमात्मा ने कहा कि अब आपका कल्याण मेरे इस रूप से नहीं होगा। आपके मन में दोष आया है। उन्होंने चरण नहीं छोड़े। रो-रोकर याचना करते रहे। तब आशीर्वाद दिया कि तुम्हारा सतगुरू दिल्ली से 30 मील पश्चिम में एक छोटे-से गाँव में मेरा भक्त जन्मेगा।

तब तक तुम इसी शरीर में जीवित रहोगे। मैं तुम्हें स्वपन में सब मार्गदर्शन करता रहूँगा। उस मेरे भक्त को मैं मिलूँगा। उसे दीक्षा अधिकार दूँगा। तुम उससे दीक्षा लेकर भक्ति करना। संत गरीबदास जी जब दस वर्ष के हुए, तब कबीर जी उनको मिले थे। सतलोक दिखाया, वापिस छोड़ा। तब स्वपन में अर्जुन-सर्जुन को बताया। गाँव व नाम, पिता का नाम सब बताया। उस समय अर्जुन-सर्जुन हरियाणा प्रान्त के गाँव-हमायुंपुर में एक किसान के घर रहते थे। आयु लगभग 225 वर्ष की थी। दोनों को एक जैसा स्वपन आया। सुबह एक-दूसरे को बताया। किसान सेवक से पूछा कि यहाँ कोई छुड़ानी गाँव है। किसान ने बताया कि है। उन्होंने कहा कि आपने इतनी सेवा की है, आपका अहसान कभी नहीं भूल पाएँगे। कृपया करके हमें छुड़ानी गाँव तक पहुँचा दो। किसान ने रेहड़ू (छोटी बैलगाड़ी) में बैठाए तथा छुड़ानी ले गया।

संत गरीबदास दास जी ने कहा कि आओ अर्जुन-सर्जुन! मेरे को परमात्मा कबीर जी ने सब बता दिया है। दीक्षा लो। यहीं रहो। भक्ति करो। उन दोनों ने दीक्षा ली और भक्ति की। वहाँ शरीर छोड़ दिया। दोनों के शरीर जमीन में दबाकर मंढ़ी बनाई गई जो सन् 1940 में भूरी वाले संत ने फुड़वा दी। कहा कि यहाँ पर केवल एक यादगार सतगुरू गरीबदास की ही रहेगी। यदि ये दोनों भी रहेंगी तो भक्त इनकी भी पूजा प्रारम्भ कर देंगे जो गलत हो जाएगा। शिष्य की पूजा नहीं की जाती।

मृत लड़के कमाल को जीवित करना

शेखतकी महाराजा सिकंदर से मुख चढ़ाए फिर रहा था। सिकंदर ने पूछा कि क्या बात है पीर जी? शेखतकी ने कहा कि क्या तुझे बात नहीं मालूम? सिकंदर ने पूछा कि क्या बात है? शेखतकी ने कहा कि इस कबीर काफिर को साथ किसलिए रखा है? सिकंदर ने कहा कि ये तो भगवान (अल्लाह) है। शेखतकी ने कहा कि अच्छा अल्लाह अब आकार में आने लग गया। अल्लाह कैसे है? सिकंदर ने कहा कि पहले तो अल्लाह ऐसे कि मेरा रोग ऐसा था कि किसी से भी ठीक नहीं हो पा रहा था। इस कबीर प्रभु ने हाथ ही लगाया था मैं स्वस्थ हो गया। शेखतकी ने कहा कि ये जादूगर होते हैं।

सिकंदर ने फिर कहा दूसरा भगवान ऐसे है कि मैंने उनके गुरुदेव का सिर काट दिया था और उन्होंने उसे मेरी आँखों के सामने तुरंत जीवित कर दिया। शेखतकी ने कहा कि अगर यह कबीर अल्लाह है तो मैं इसकी परीक्षा लूँगा। यदि कबीर जी मेरे सामने कोई मुर्दा जीवित करे तो इसे अल्लाह मान लूँगा। नही तो दिल्ली जाकर मैं पूरे मुसलमान समाज को कह दूँगा कि यह राजा हिन्दू हो गया है।

मृत लड़के कमाल को जीवित करना

सिकंदर लोधी डर गया कि कहीं ऐसा न हो कि यह जाते ही राज पलट दे। (राज को देने वाला पास बैठा है और उस मूर्ख से डर लगता है।) राजा ने शेखतकी से कहा कि आप कैसे प्रसन्न होंगे। शेखतकी ने कहा कि मैं तब प्रसन्न होऊँगा जब मेरे सामने यह कबीर कोई मुर्दा जीवित कर दे। साहेब से प्रार्थना हुई तो कबीर साहेब ने कहा कि ठीक है। (कबीर साहेब ने सोचा कि यह अनाड़ी आत्मा शेखतकी है।

अगर यह मेरी बात मान गया तो आधे से ज्यादा मुसलमान इसकी बात स्वीकार करते हैं। क्योंकि यह दिल्ली के बादशाह का पीर है और अगर यह सही ढंग से मुसलमानों को बता देगा तो बेचारी भोली आत्माएँ इन गुरूओं पर आधारित होती हैं।) इसलिए कहा कि ठीक है शेखतकी ढूँढ़ ले कोई मुर्दा। सुबह एक 10-12 वर्ष की आयु के लड़के का शव पानी में तैरता हुआ आ रहा था। शेखतकी ने कहा कि वह आ रहा है मुर्दा, इसे जिन्दा कर दो। कबीर साहेब ने कहा पहले आप प्रयत्न करो, कहीं फिर पीछे नम्बर बनाओ। उपस्थित मन्त्रियों तथा सैनिकों ने कहा कि पीर जी आप कोशिश करके देख लो।

शेखतकी जन्त्र-मन्त्र करता रहा। इतने में वह मुर्दा तीन फर्लांग आगे चला गया। शेखतकी ने कहा कि यह कबीर चाहता था कि यह बला सिर से टल जाए। कहीं मुर्दे जीवित होते हैं? मुर्दे तो कयामत के समय ही जीवित होते हैं। कबीर साहेब बोले महात्मा जी आप बैठ जाओ, शान्ति करो। कबीर साहेब ने उस मुर्दे को हाथ से वापिस आने का संकेत किया। बारह वर्षीय बच्चे का मृत शरीर दरिया के पानी के बहाव के विपरित चलकर कबीर जी के सामने आकर रूक गया। पानी की लहर नीचे-नीचे जा रही और शव ऊपर रूका था। कबीर साहेब ने कहा कि हे जीवात्मा जहाँ भी है कबीर हुक्म से मुर्दे में प्रवेश कर और बाहर आ। कबीर साहेब ने इतना कहा ही था कि शव में कम्पन हुई तथा जीवित होकर बाहर आ गया। कबीर साहेब के चरणों में दण्डवत् प्रणाम किया।

“बोलो कबीर परमेश्वर की जय”

सर्व उपस्थित जनों ने कहा कि कबीर साहेब ने तो कमाल कर दिया। उस लड़के का नाम कमाल रख दिया। लड़के को अपने साथ रखा। अपने बच्चे की तरह पालन-पोषण किया और नाम दिया। उसके बाद दिल्ली में आ गए। सभी को पता चला कि यह लड़का जो इनके साथ है यह परमेश्वर कबीर साहेब ने जीवित किया है। दूर तक बात फैल गई। शेखतकी की तो माँ सी मर गई सोचा यह कबीर अच्छा दुश्मन हुआ। इसकी तो और ज्यादा महिमा हो गई। शेखतकी की इर्ष्या बढ़ती ही चली गई। उसकी तेरह वर्षीय लड़की को मृत्यु पश्चात् कब्र में जमीन में दबा रखा था। शेखतकी ने कहा यदि कबीर मेरी लड़की को जो कब्र में दफना रखी है। अगर उसको जीवित करेगा तो मैं इसे अल्लाह मान लूँगा।

“शेखतकी की मृत लड़की कमाली को जीवित करना”

शेखतकी ने देखा कि यह कबीर तो किसी प्रकार भी काबू नहीं आ रहा है। तब शेखतकी ने जनता से कहा कि यह कबीर तो जादूगर है। ऐसे ही जन्त्र-मन्त्र दिखाकर इसने बादशाह सिकंदर की बुद्धि भ्रष्ट कर रखी है। सारे मुसलमानों से कहा कि तुम मेरा साथ दो,

वरना बात बिगड़ जाएगी। भोले मुसलमानों ने कहा पीर जी हम तेरे साथ हैं, जैसे तू कहेगा ऐसे ही करेंगे। शेखतकी ने कहा इस कबीर को तब प्रभु मानेंगे जब मेरी लड़की को जीवित कर देगा जो कब्र में दबी हुई है। पूज्य कबीर साहेब से प्रार्थना हुई। कबीर साहेब ने सोचा यह नादान आत्मा ऐसे ही मान जाए। {क्योंकि ये सभी जीवात्माएँ कबीर साहेब के बच्चे हैं। यह तो काल ने (मजहब) धर्म का हमारे ऊपर कवर चढ़ा रखा है। एक-दूसरे के दुश्मन बना रखे हैं।} शेखतकी की लड़की का शव कब्र में दबा रखा था। शेखतकी ने कहा कि यदि मेरी लड़की को जीवित कर दे तो हम इस कबीर को अल्लाह स्वीकार कर लेंगे और सभी जगह ढिंढ़ोरा पिटवा दूँगा कि यह कबीर जी भगवान है। कबीर साहेब ने कहा कि ठीक है। वह दिन निश्चित हुआ।

कबीर साहेब ने कहा कि सभी जगह सूचना दे दो, कहीं फिर किसी को शंका न रह जाए। हजारों की संख्या में वहाँ पर भक्त आत्मा दर्शनार्थ एकत्रित हुई। कबीर साहेब ने कब्र खुदवाई। उसमें एक बारह-तेरह वर्ष की लड़की का शव रखा हुआ था। कबीर साहेब ने शेखतकी से कहा कि पहले आप जीवित कर लो। सभी उपस्थित जनों ने कहा है कि महाराज जी यदि इसके पास कोई ऐसी शक्ति होती तो अपने बच्चे को कौन मरने देता है? अपने बच्चे की जान के लिए व्यक्ति अपना तन मन धन लगा देता है। हे दीन दयाल आप कृपा करो। पूज्य कबीर परमेश्वर ने कहा कि हे शेखतकी की लड़की जीवित हो जा।

तीन बार कहा लेकिन लड़की जीवित नहीं हुई। शेखतकी ने तो भंगड़ा पा दिया। नाचे-कूदे कि देखा न पाखण्डी का पाखंड पकड़ा गया। कबीर साहेब उसको नचाना चाहते थे कि इसको नाचने दे।

कबीर, राज तजना सहज है, सहज त्रिया का नेह। मान बड़ाई ईर्ष्या, दुर्लभ तजना ये।।

मान-बड़ाई, ईर्ष्या का रोग बहुत भयानक है। अपनी लड़की के जीवित न होने का दुःख नहीं, कबीर साहेब की पराजय की खुशी मना रहा था। कबीर साहेब ने कहा कि बैठ जाओ महात्मा जी, शान्ति रखो। कबीर साहेब ने आदेश दिया कि हे जीवात्मा जहाँ भी है

कबीर आदेश से इस शव में प्रवेश करो और बाहर आओ।

कबीर साहेब का कहना ही था कि इतने में शव में कम्पन हुआ और वह लड़की जीवित होकर बाहर आई, कबीर साहेब के चरणों में दण्डवत् प्रणाम किया।(बोलो सतगुरु देव की जय।) उस लड़की ने डेढ घण्टे तक कबीर साहेब की कृपा से प्रवचन किए। कहा हे भोली जनता ये भगवान आए हुए हैं। पूर्ण ब्रह्म अन्नत कोटि ब्रह्माण्ड के परमेश्वर हैं। क्या तुम इसको एक मामूली जुलाहा(धाणक) मान रहे हो। हे भूले-भटके प्राणियो! ये आपके सामने स्वयं परमेश्वर आए हैं। इनके चरणों में गिरकर अपने जन्म-मरण का दीर्घ रोग कटवाओ और सत्यलोक चलो। जहाँ पर जाने के बाद जीवात्मा जन्म-मरण के चक्कर से बच जाती है।

कमाली ने बताया कि इस काल के जाल से बन्दी छोड़ कबीर साहेब के बिना कोई नहीं छुटवा सकता। चाहे हिन्दू पद्यति से तीर्थ-व्रत, गीता-भागवत, रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषद्ध, वेदों का पाठ करना, राम, कृष्ण, ब्रह्मा-विष्णु-शिव, शेराँवाली(आदि माया, आदि भवानी, प्रकृति देवी), ज्योति निरंजन की उपासना भी क्यों न करें, जीव चौरासी लाख प्राणियों के शरीर में कष्ट से नहीं बच सकता और मुसलमान पद्यति से भी जीव काल के जाल से नहीं छूट सकता। जैसे रोजे रखना, ईद बकरीद मनाना, पाँच वक्त नमाज करना, मक्का-मदीना में जाना, मस्जिद में बंग देना आदि सर्व व्यर्थ है। कमाली ने सर्व उपस्थित जनों को सम्बोधित करते हुए अपने पिछले जन्मों की कथा सुनाई जो उसे कबीर साहेब की कृपा से याद हो आई थी। जो कि आप पूर्व पढ़ चुके हो।

कबीर साहेब ने कहा कि बेटी अपने पिता के साथ जाओ। वह लड़की बोली मेरे वास्तविक पिता तो आप हैं। यह तो नकली पिता है। इसने तो मैं मिट्टी में दबा दी थी। मेरा और इसका हिसाब बराबर हो चुका है। सभी उपस्थित व्यक्तियों ने कहा कि कबीर परमेश्वर ने कमाल कर दिया। कबीर साहेब ने लड़की का नाम कमाली रख दिया और अपनी बेटी की तरह रखा और नाम दिया। उपस्थित व्यक्तियों ने हजारों की संख्या में कबीर परमेश्वर से उपदेश ग्रहण किया। अब शेखतकी ने सोचा कि यह तो और भी बात बिगड़ गई। मेरी तो सारी प्रभुता गई।

“सिकंदर लोधी बादशाह का असाध्य जलन का रोग ठीक करना”

एक बार दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोधी को जलन का रोग हो गया। जलन का रोग ऐसा होता है जैसे किसी का आग में हाथ जल जाए उसमें पीड़ा बहुत होती है। जलन के रोग में कहीं से शरीर जला दिखाई नहीं देता है परन्तु पीड़ा अत्यधिक होती है। उसको जलन का रोग कहते हैं। जब प्राणी के पाप बढ़ जाते हैं तो दवाई भी व्यर्थ हो जाती हैं। दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लौधी के साथ भी वही हुआ। सभी प्रकार की औषधि सेवन की। बड़े-बड़े वैद्य बुला लिए और मुँह बोला इनाम रख दिया कि मुझे ठीक कर दो, जो माँगोगे वही दूँगा। दुःख में व्यक्ति पता नहीं क्या संकल्प कर लेता है? सर्व उपाय निष्फल हुए।

सिकंदर लोधी बादशाह का असाध्य जलन का रोग ठीक करना
उसके बाद अपने धार्मिक काजी, मुल्ला, संतों आदि सबसे अपना आध्यात्मिक इलाज करवाया। परन्तु सब असफल रहा। {जब हम दुःखी हो जाते हैं तो हिन्दू और मुसलमान नहीं रहते। फिर तो कहीं पर रोग कट जाए, वही पर चले जाते हैं। वैसे तो हिन्दू कहते हैं कि मुसलमान बुरे और मुसलमान कहते हैं कि हिन्दू बुरे और बीमारी हो जाए तो फिर हिन्दू व मुसलमान नहीं देखते। जब कष्ट आए तब तो कोई बुरा नहीं। बुरा कोई नहीं है। जो मुसलमान बुरे हैं वे बुरे हैं और जो हिन्दू बुरे हैं वे बुरे भी हैं और दोनों में अच्छे भी है। हर मज़हब में अच्छे और बुरे व्यक्ति होते हैं। लेकिन हम जीव हैं। हमारी कोई जाति व्यवस्था नहीं है। हमारी जीव जाति है हमारा धर्म मानव है-परमात्मा को पाना है।} हिन्दू वैद्य तथा आध्यात्मिक संत भी बुलाए, स्वयं भी उनसे जाकर मिला और सबसे आशीर्वाद व जंत्र-मंत्र करवाए, परन्तु सर्व चेष्टा निष्फल रही। किसी ने बताया कि काशी शहर में एक कबीर नाम का महापुरूष है। यदि वह कृपा कर दे तो आपका दुःख निवारण अवश्य हो जाएगा।

जब बादशाह सिकंदर ने सुना कि एक काशी के अन्दर महापुरूष रहता है तो उसको कुछ-कुछ याद आया कि वह तो नहीं है जिसने गाय को भी जीवित कर दिया था। हजारों अंगरक्षकों सहित दिल्ली से काशी के लिए चल पड़ा। बीर सिंह बघेला काशी नरेश पहले ही कबीर साहेब की महिमा और ज्ञान सुनकर कबीर साहेब के शिष्य हो चुके थे और पूर्ण रूप से अपने गुरुदेव में आस्था रखते थे। उनको कबीर साहेब की महिमा का ज्ञान था क्योंकि कबीर परमेश्वर वहाँ पर बहुत लीलाएँ कर चुके थे। जब सिकंदर लोधी बनारस (काशी) गया तथा बीर सिंह से कहा बीर सिंह मैं बहुत दुःखी हो गया हूँ। अब तो आत्महत्या ही शेष रह गई है। यहाँ पर कोई कबीर नाम का संत है? आप तो जानते होंगे कि वह कैसा है? इतनी बात सिकंदर बादशाह के मुख से सुनी थी। काशी नरेश बीर सिंह की आँखों में पानी भर आया और कहा कि अब आप ठीक स्थान पर आ गए। अब आपके दुःख का अंत हो जाएगा।

बादशाह सिकंदर ने पूछा कि ऐसी क्या बात है? बीर सिंह ने कहा कि वह कबीर जी स्वयं भगवान आए हुए हैं। परमेश्वर स्वरूप हैं। यदि उनकी दयादृष्टि हो गई तो आपका रोग ठीक हो जाएगा। राजा सिकंदर ने कहा कि जल्दी बुला दो। काशी नरेश बीरदेवसिंह बघेल ने विनम्रता से प्रार्थना की कि आपकी आज्ञा शिरोधार्य है, आदेश भिजवा देता हूँ। लेकिन ऐसा सुना है कि संतो को बुलाया नहीं करते। यदि वे आ भी गए और रजा नहीं बख्शी तो भी आने का कोई लाभ नहीं। बाकी आपकी ईच्छा। सिकंदर ने कहा कि ठीक है मैं स्वयं ही चलता हूँ। इतनी दूर आ गया हूँ वहाँ पर भी अवश्य चलूँगा। शाम का समय हो गया था। बीर सिंह को पता था कि इस समय साहेब कबीर जी अपने औपचारिक गुरुदेव स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में ही होते हैं। यह समय परमेश्वर कबीर जी का वहाँ मिलने का है।

बीर देव सिंह बघेल काशी नरेश तथा सिकंदर लोधी दिल्ली के बादशाह दोनों, स्वामी रामानन्द जी के आश्रम के सामने खड़े हो गए। वहाँ जाकर पता चला कि कबीर साहेब अभी नहीं आए हैं, आने ही वाले हैं। बीर सिंह अन्दर नहीं गए। बाहर सेवक खड़ा था उससे ही पूछा। सिकंदर ने कहा कि ‘‘तब तक आश्रम में विश्राम कर लेते हैं।’’ राजा बीर सिंह ने स्वामी रामानन्द जी के द्वारपाल सेवक से कहा कि रामानन्द जी से प्रार्थना करो कि दिल्ली के बादशाह सिकंदर लौधी आपके दर्शन भी करना चाहते हैं और साहेब कबीर का इन्तजार भी आपके आश्रम में ही करना चाहते है। सेवक ने अन्दर जाकर रामानन्द जी को बताया कि दिल्ली के बादशाह सिकंदर लौधी आए हैं। रामानन्द जी मुसलमानों से घृणा करते थे। रामानन्द जी ने कहा कि मैं इन मलेच्छों (मुसलमानों) की शक्ल भी नहीं देखता।

कह दो कि बाहर बैठ जाएगा। जब सिकंदर लोधी ने यह सुना तो क्रोध में भरकर (क्योंकि राजा में अहंकार बहुत होता है और वह दिल्ली का बादशाह) कहा कि यह दो कौड़ी का महात्मा दिल्ली के बादशाह का अनादर कर सकता है तो साधारण मुसलमान के साथ यह कैसा व्यवहार करता होगा? इसको मज़ा चखा दूँ। रामानन्द जी अलग आसन पर बैठे थे। सिकंदर लोधी ने जाकर रामानन्द जी की गर्दन तलवार से काटदी। वापिस चल पड़ा और फिर उसको याद आया कि मैं जिस कार्य के लिए आया था? और वह काम अब पूरा नहीं होगा। कहा कि बीर सिंह देख मैं क्या जुल्म कर बैठा? मेरे बहुत बुरे दिन हैं। चाहता हूँ अच्छा करना और होता है बुरा। कबीर साहेब के गुरुदेव की हत्या कर दी। अब वे कभी भी मेरे ऊपर दयादृष्टि नहीं करेंगे। मुझे तो यह दुःख भोग कर ही मरना पड़ेगा।

मैं बहुत पापी जीव हूँ। यह कहता हुआ आश्रम से बाहर की ओर चल पड़ा। बीर सिंह अपने बादशाह के आगे क्या बोलता। ज्योंही आश्रम से बाहर आए, कबीर साहेब आते दिखाई दिए। बीर सिंह ने कहा कि महाराज जी मेरे गुरुदेव कबीर साहेब आ गए। ज्योंही कबीर साहेब थोड़ी दूर रह गए बीर सिंह ने जमीन पर लेटकर उनको दण्डवत् प्रणाम किया। अब सिकंदर बहुत घबराया हुआ था। {अगर उसने यह जुल्म नहीं किया होता तो वह दण्डवत् नहीं करता और दण्डवत् नहीं करता तो साहेब उस पर रजा भी नहीं बख्श पाते क्योंकि यह नियम होता है। अति आधीन दीन हो प्राणी, ताते कहिए ये अकथ कहानी। ऊँचे पात्र जल ना जाई, ताते नीचा हुजै भाई।

आधीनी के पास हैं पूर्ण ब्रह्म दयाल। मान बड़ाई मारिए बे अदबी सिर काल।। कबीर परमेश्वर ने यहाँ पर एक तीर से दो शिकार किए। स्वामी रामानंद जी में धर्म भेद-भाव की भावना शेष थी, वह भी निकालनी थी। रामानंद जी मुसलमानां को हिन्दुओं से अभी भी भिन्न तथा हेय मानते थे। सिकंदर में अहंकार की भावना थी। यदि वह नम्र नहीं होता तो कबीर साहेब कृपा नहीं करते तथा सिकंदर स्वस्थ नहीं होता} बीर सिंह को देखकर तथा डरते हुए सिकंदर लौधी ने भी दण्डवत् प्रणाम किया। कबीर परमेश्वर जी ने दोनों के सिर पर हाथ रखा और कहा कि दो-2 नरेश आज मुझ गरीब के पास कैसे आए हैं? मुझ गरीब को कैसे दर्शन दिए? परमेश्वर कबीर जी ने अपना हाथ उठाया भी नहीं था कि सिकंदर का जलन का रोग समाप्त हो गया। सिकंदर लोधी की आँखों में पानी आ गया। (संत के सामने यह मन भाग जाता है और ये आत्मा ऊपर आ जाती है क्योंकि परमात्मा आत्मा का साथी है। ‘‘अन्तर्यामी एक तू आत्म के आधार।‘‘ आत्मा का आधार कबीर भगवान है।)

स्वामी रामानंद जी को जीवित करना

सिकंदर लोधी ने पैर पकड़ कर छोड़े नहीं और रोता ही रहा। परमेश्वर जानी जान होते हुए भी कबीर साहेब ने सिकन्दर लोधी दिल्ली के बादशाह से पूछा क्या बात है?। सिकंदर ने कहा कि दाता मैंने घोर अपराध कर दिया। आप मुझे क्षमा नहीं कर सकते। जिस काम के लिए मैं आया था वह असाध्य रोग तो आपके स्पर्श मात्र से ठीक हो गया। इस पापी को क्षमा कर दो। कबीर साहेब ने कहा क्षमा कर दिया। यह तो बता कि क्या हुआ? सिकंदर ने कहा कि आप क्षमा कर नहीं सकते। मैंने ऐसा पाप किया है। कबीर साहेब ने कहा कि क्षमा कर दिया। सिकंदर ने फिर कहा कि सच में माफ कर दिया? कबीर साहेब ने कहा कि हाँ क्षमा कर दिया। अब बता क्या कष्ट है? सिकंदर ने कहा कि दाता मुझ पापी ने गुस्से में आकर आपके गुरुदेव का सिर कलम कर दिया और फिर सारी कहानी बताई।

स्वामी रामानंद जी को जीवित करना
कबीर साहेब बोले कोई बात नहीं। जो हुआ प्रभु इच्छा से ही हुआ है आप स्वामी रामानन्द जी का अन्तिम संस्कार करवा कर जाना नहीं तो आप निंदा के पात्र बनोगे। परमेश्वर कबीर साहेब जी नाराज नहीं हुए। सिकंदर लोधी ने बीर सिंह के मुख की और देखा और कहा कि बीर सिंह यह तो वास्तव में भगवान है। देखिए मैंने गुरुदेव का सिर काट दिया और कबीर जी को क्रोध भी नहीं आया। बीर सिंह चुप रहा और साथ-साथ हो लिया और मन ही मन में सोचता है कि अभी क्या है, अभी तो और देखना। यह तो शुरूआत है। परमेश्वर कबीर जी ने अन्दर जाकर देखा रामानंद जी का धड़ कहीं पर और सिर कहीं पर पड़ा था। शरीर पर चादर डाल रखी थी।

कबीर साहेब ने अपने गुरुदेव के मृत शरीर को दण्डवत् प्रणाम किया और चरण छुए तथा कहा कि गुरुदेव उठो। दिल्ली के बादशाह आपके दर्शनार्थ आए हैं। एक बार उठना।

दूसरी बार ही कहा था, सिर अपने आप उठकर धड़ पर लग गया और रामानन्द जी जीवित हो गए। रामानंद जी के शरीर से आधा खून और आधा दूध निकला हुआ था। जब साहेब कबीर से स्वामी रामानन्द जी ने कारण पूछा तो साहेब ने बताया कि स्वामी जी आपके अन्दर यह थोड़ी-सी कसर और रह गई है कि अभी तक आप हिन्दू और मुसलमान को दो समझते हो इसलिए आधा खून और आधा दूध निकला है। आप अन्य जाति वालों को अपना साथी समझ चुके हो। यह जीव सभी एक हैं। आप तो जानीजान हो। आप तो लीला कर रहे हो अर्थात् उसको गोल-मोल भी कर दिया और समझा भी गए।

कबीर-अलख इलाही एक है, नाम धराया दोय। कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।1।।
कबीर-राम रहीमा एक है, नाम धराया दोय। कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।2।।
कबीर-कृष्ण करीमा एक है, नाम धराया दोय। कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।।3।।
कबीर-काशी काबा एक है, एकै राम रहीम। मैदा एक पकवान बहु, बैठि कबीरा जीम।।4।।
कबीर-एक वस्तु के नाम बहु, लीजै वस्तु पहिचान। नाम पक्ष नहीं कीजिये, सार तत्व ले जान।।5।।
कबीर-सब काहूका लीजिये, सांचा शब्द निहार। पक्षपात ना कीजिये, कहै कबीर विचार।।6।।
कबीर-राम कबीरा एक है, दूजा कबहू ना होय। अंतर टाटी कपट की, तातै दीखे दोय।।7।।
कबीर-राम कबीर एक है, कहन सुनन को दोय। दो करि सोई जानई, सतगुरु मिला न होय।।8।।

रामानंद जी ने सिकंदर को सीने से लगाया तथा उसके बाद हिन्दू तथा मुसलमान को तथा सर्व जाति व धर्मों के व्यक्तियों को प्रभु के बच्चे जानकर प्यार देने लगे तथा अपने औपचारिक शिष्य वास्तव में परमेश्वर कबीर साहेब जी का धन्यवाद किया कि आपने मेरा अज्ञान पूर्ण रूप से दूर कर दिया। हम एक पिता प्रभु की संतान हैं, मुझे दृढ़ विश्वास हो गया। दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी के साथ उनका धार्मिक गुरु शेखतकी भी बनारस गया था। वह रैस्ट हाऊस(विश्राम गृह) में ही रूका था। क्योंकि शेखतकी हिन्दू संतों से बहुत ईर्ष्या करता था तथा उन्हें व उनके शिष्यों को काफिर कहता था। इसलिए स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में जाने से इंकार कर दिया था। राजा सिकंदर लोधी के साथ स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में नहीं गया था।

महाराजा सिकंदर ने विश्राम गृह में आकर परमेश्वर कबीर साहेब जी द्वारा अपने असाध्य रोग का निवारण केवल आशीर्वाद मात्रा से करने तथा स्वामी रामानन्द जी को पुनर् जीवित करने की कथा खुशी के साथ अपने धार्मिक पीर शेखतकी को बताई तथा कहा कि पीर जी मैं पूर्ण रूप से स्वस्थ हूँ। मेरे किसी अंग में कोई पीड़ा नहीं है। रात्रि का समय था। प्रभु कबीर साहेब जी सुबह आने की कहकर अपनी कुटिया पर चले गये थे। शेखतकी ने बादशाह के मुख से अन्य संत की भूरी-भूरी प्रशंसा सुनी तो अन्दर ही अन्दर जल-भुन गया। रात भर करवटें बदलता रहा। परमेश्वर कबीर साहेब जी को नीचा दिखाने की योजना बनाता रहा।

जगन्नाथ मंदिर की पुरी (उड़ीसा) में स्थापना

उड़ीसा प्रांत का राजा इंद्रदमन चिंतित था क्योंकि श्री कृष्ण जी ने स्वपन में आकर स्थान बताते हुए कहा था कि इंद्रदमन समुद्र किनारे एक मंदिर बनवाओ जिसमें मूर्ति पूजा नहीं होनी चाहिये। सिर्फ मंदिर में एक संत नियुक्त करो जो दर्शकों को गीता जी का पाठ सुनाया करेगा। लेकिन प्रतिशोध के चलते समुंद्र जगन्नाथ पुरी के मंदिर को तोड़ने की अपनी ज़िद पर कायम था क्योंकि त्रेतायुग में समुंद्र ने राम को रास्ता नहीं दिया था। तब राम ने क्रोधवश समुन्द्र को नष्ट करने के लिए डराया धमकाया था और उसी का बदला लेने के लिए अब समुंद्र बार बार जगन्नाथ पुरी मंदिर निर्माण में बाधक बन रहा था। राजा ने कृष्ण जी के आदेश अनुसार 5 बार मंदिर बनवाने की कोशिश की पर समुंद्र बड़े वेग से भीषण तूफान सरीखा उठकर आता और मंदिर को बहाकर ले जाता। राजा ने श्री कृष्ण से बार-बार मदद की विनती की लेकिन श्री कृष्ण जी भी समुंद्र को रोकने में असमर्थ रहे। धीरे धीरे राजा का खजाना भी खत्म हो गया और उसने मंदिर नही बनवाने का निर्णय लिया।

एक दिन कबीर परमात्मा संत रुप में राजा के पास आये और राजा को कहा की अब तुम मंदिर बनवाओ मैं तुम्हारे साथ हूं। अबकी बार समुंद्र मंदिर नहीं तोड़ेगा। राजा ने कहा की जब भगवान श्री कृष्ण जी समुंद्र को नहीं रोक पाये तो आप क्या कर पाओगे! कबीर परमेश्वर ने कहा की मुझे उस परमेश्वर की शक्ति प्राप्त है जिसने सर्व ब्रह्मांडो की रचना की है और वही समरथ प्रभु असंभव को भी संभव कर सकता है अन्य देवता नहीं। राजा ने कबीर परमात्मा की बात नहीं मानी तो कबीर जी ने अपना पता बताते हुए कहा की जब भी मंदिर बनाने का मन बने तो मेरे पास आ जाना।

आखिर श्री कृष्ण जी ने राजा को स्वपन में आकर कहा की वह जो संत आया था उसकी शक्ति का कोई वार पार नहीं वह मंदिर बनवा देगा, उससे याचना करो, फिर इंद्रदमन ने कबीर जी से विनती की तो कबीर जी ने मंदिर बनवाना शुरु करवा दिया, समुंद्र भी मंदिर तोड़ने के लिए बड़े तीव्र वेग से उठकर आता और विवश होकर थम जाता क्योंकि कबीर परमात्मा अपना हाथ ऊपर को उठाते और अपनी शक्ति से समुंद्र को रोक देते।
फिर समुंद्र कबीर जी से याचना करता की मैं आपके समक्ष निर्बल हूं आप से नहीं जीत सकता लेकिन मैं अपना प्रतिशोध कैसे लूं, उपाय बताएं ? तब कबीर जी ने द्वारिका को डुबोकर गुस्सा शांत करने का विकल्प बताया क्योंकि द्वारिका खाली पड़ी थी। जिस स्थान पर कबीरजी ने समुंद्र को रोका था वहाँ आज भी एक गुम्बद यादगार के रूप में मौजूद है जहाँ वर्तमान में महंत रहता है।

इसी दौरान नाथ परंपरा के एक सिद्ध महात्मा आये और राजा से कहा की मूर्ति बिना मंदिर कैसा, आप चंदन की लकड़ी की मूर्ति बनाओ और मंदिर में स्थापित करो, राजा ने तीन मूर्तियां बनवाई जो बार बार टूट जाती थी। इस तरह तीन बार मूर्ति बनवाई और तीनों बार खंड हो गई तो राजा फिर चिंतित हुआ। सुबह जब राजा दरबार में पहुँचा तो कबीर परमात्मा एक मूर्तिकार के रुप मे आये और राजा से कहा कि मुझे 60 साल का अनुभव है, मैं मूर्तियां बनाउंगा तो नहीं टूटेंगीं। मुझे एक कमरा दे दो जिसमें मैं मूर्तियां बनाउंगा और जब तक मूर्तियां नहीं बन जाती कोई भी कमरा ना खोले। राजा ने वही किया, उधर कुछ दिन बाद नाथ जी फिर आए और उनके पूछने पर राजा ने पूरा वृतांत बताया तो नाथ जी ने कहा की पिछले 10-12 दिन से वह कारीगर मूर्ति बना रहा है, कहीं गलत मूर्तियां ना बना दे।

हमें मूर्तियां को देखना चाहिये, यह सोचकर कमरे में दाखिल हुए तो कबीर परमात्मा गायब हो गये, तीनों मूर्तियां बन चुकी थी लेकिन बीच में ही व्यवधान उत्पन्न होने से तीनों मूर्तियों के हाथ और पांव की ऊँगलियां नही बनी थीं। इस कारण मंदिर में बगैर ऊँगलियों वाली मूर्तियां ही रखी गईं।

कुछ समय उपरांत जगन्नाथ पुरी मंदिर में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करने के लिए कुछ पंडित मंदिर में पहुँचे। मंदिर के द्वार की ओर मुंह करके कबीर परमात्मा खड़े थे। पंडित ने कबीर परमात्मा को अछूत कहते हुए धक्का दे दिया और मंदिर में प्रवेश किया। अंदर जाकर देखा तो हर मूर्ति कबीर परमात्मा के स्वरुप मे तब्दील हो गई थी और यह देखकर पंडित हैरान थे। बाद मे उस पंडित को कोढ़ हो गया जिसने कबीर परमात्मा को धक्का देकर अछूत कहा था। लेकिन दयालु कबीर परमात्मा जी ने बाद में उसे ठीक कर दिया। उसके बाद जगन्नाथ पुरी मंदिर में छुआछात नहीं हुई।

कबीर परमात्मा ने यहाँ सिद्ध करके बताया की वह समर्थ है और ब्रह्मा, विष्णु और महेश से ऊपर की शक्ति है। कबीर परमात्मा चारों युग में सतलोक से गति करके आते हैं सतयुग में सतसुकृत नाम से, त्रेता में मुनिंद्र नाम से, द्वापर में करुणामय नाम से, और कलयुग में अपने असली नाम कबीर (कविर्देव) नाम से आते हैं और यही सत्य वर्तमान मे भी संत रामपालजी महाराज ने बताया है की आत्मकल्याण तो केवल पवित्र गीता जी व पवित्र वेदों मे वर्णित तथा परमेश्वर कबीर के द्वारा दिये गये तत्वज्ञान के अनुसार भक्ति साधना करने मात्र से ही सम्भव है अन्यथा शास्त्र विरुद्ध होने से मानव जीवन व्यर्थ हो जाएगा।

श्री जगन्नाथ के मन्दिर में प्रभु के आदेशानुसार पवित्र गीता जी के ज्ञान की महिमा का गुणगान होना ही श्रेयकर है तथा जैसा श्रीमद्भगवत गीता जी में भक्ति विधि है उसी प्रकार साधना करने मात्रा से ही आत्म कल्याण संभव है, अन्यथा जगन्नाथ जी के दर्शन मात्र या खिचड़ी प्रसाद खाने मात्र से कोई लाभ नहीं क्योंकि यह क्रिया श्री गीता जी में वर्णित न होने से शास्त्रविरुद्ध हुई, जो अध्याय 16 मंत्र 23,24 में प्रमाण है।

जीवा तथा दत्ता (तत्वा) का प्रकरण

एक समय की बात है। गुजरात के अंदर एक भरुच शहर है। भरुच शहर में मंगलेश्वर नामक गाँव है। उस गाँव के साथ में नर्मदा नदी एक स्थान को दो हिस्से करके टापू बनाती है। आज से लगभग 550 (साढ़े पांच सौ) वर्ष पहले वहां एक शुक्ल तीर्थ नाम का गाँव बसा हुआ था। उसमें तीस-चालीस घर थे। उस गाँव में जीवा और तत्वा नाम के दो ब्राह्मण भाई रहा करते थे। उन्होंने संतों के सत्संग सुने। जो वास्तव में संत होते हैं, वे यही कहा करते हैं कि पूरे संत के बिना जीव उद्धार नहीं होगा। इन अधूरे गुरुओं के चक्कर में मनुष्य शरीर बर्बाद हो जाएगा। फिर न जाने कब और कौन से युग में मानव शरीर प्राप्त होगा? तब तक यह प्राणी चौरासी में चक्कर काटता रहेगा। मनुष्य शरीर का मिलना कोई बच्चों का खेल नहीं है। इसको ऐसे ही गवां देना, यह कोई समझदारी नहीं है।

jeeva dattta

अब उन दोनों भाइयों ने फैसला किया कि बात तो ज्यों की त्यों है कि यह मनुष्य शरीर का मिलना कोई बार-बार नहीं होता। यदि इससे सत भक्ति न हुयी तो इसकी कोई कीमत नहीं है। यदि इससे मालिक की भक्ति हो गयी, सत मार्ग मिल गया तो इसकी कीमत है, नहीं तो मिटटी का मिटटी है। उन्होंने पहले किसी संत से उपदेश ले रखा था। परन्तु जब सुना की पूरे संत के बिना जीव उद्धार नहीं है तो उन्होंने सोचा कि हम पूरे संत से उपदेश लेंगे।
अब पूरे संत की क्या पहचान हो? जहाँ भी जाते हैं, सभी संत अच्छी बातें बताते हैं। परमात्मा की महिमा गाते हैं। हमें तो बहुत प्रिय लगते हैं। हमें पता ही नहीं लगता कि इनमें अधूरा कौन है और पूरा कौन है? {क्योंकि वे स्वयं विनम्र आत्मा होती हैं। वे प्रभु को चाहने वाली आत्मा होती हैं। उनके अंदर विशेष कसक होती है, परन्तु उनमें विशेष विवेक नहीं होता ।} उन्होंने सोचा क्या फैसला करें? अपने आप ही मन में फैसला लेते हैं। एक सूखे वृक्ष की टहनी जो बिलकुल सूख कर जलाने योग्य हो चुकी थी, उसको अपने आँगन में जैसे पौधा लगाते हैं ऐसे लगा दिया और फैसला किया कि इसमें सभी महापुरुषों के चरण धोकर उनका चरणामृत डालेंगे।

जिसके चरणामृत से ये टहनी हरी हो जाएगी, हम उसे पूर्ण संत मान कर उपदेश ले लेंगे और समर्पण कर देंगे, अन्यथा नाम नहीं लेंगे। जिन महापुरुषों के बड़े-बड़े आश्रम बने हुए थे उनके पास गए। उनको घर पर पधारने की प्रार्थना की। कुछेक महापुरुष उनके घर पर आए। उनकी सेवा की, भोजन करवाया, और चरण धोकर चरणामृत को उस सूखी टहनी में डाल दिया। जो गरीब के घर पर नहीं जा सकते थे, उनके चरण धोकर चरणामृत घर पर ले आए और सूखी हुई टहनी में डाल दिया। परन्तु वह टहनी हरी न हो कर गलनि शुरू हो गई। उन्होंने लगभग एक वर्ष तक यह तरीका अपनाया। परन्तु कोई भी संत ऐसा नहीं मिला जिसके चरणामृत से वह टहनी हरी हो जाए।
फिर दोनों भाई बैठ कर कहते हैं की हे प्रभु, हम प्राणियों को मनुष्य शरीर भी मिला, परन्तु ऐसे समय में मिला की कोई पूर्ण संत नहीं है। हे दाता, इससे अच्छा तो हमारे इस शरीर का अंत कर दो। बाकी का जो हमारा मनुष्य शरीर का समय है, कभी ऐसे समय में देना जब कोई पूर्ण संत पृथ्वी पर आया हो। नहीं तो इस मिटटी का कुछ नहीं बनेगा। प्रार्थना करते थे और रोते थे, विलाप करते रहते थे। कई महीने ऐसे बीत गए। अब वह दीनदयाल अन्तर्यामी सतगुरु कबीर परमेश्वर भक्त आत्माओं की तड़फ को देखकर वहां शुक्ल तीर्थ पर पहुँच गए। जीवा और तत्वा के मकान के सामने से निकले। जीवा बाहर खड़ा था। जीवा ने देखा कि इतनी प्यारी सूरत और देखते ही आनंद हो रहा है।
गरीब, जिन मिलते सुख उपजे, मिटे कोटि अपाध।
भवन चतुर्दश ढूंढियो, परम स्नेही साध।।
जब परमेश्वर उनके सामने से निकले तो जीवा के रोम-रोम में आनंद हुआ। इतने में कबीर साहिब आगे चले गए। जीवा अपने भाई से बोला कि दत्ता, एक महात्मा आया हुआ है । क्या कारण है यह पता नहीं, किसी के घर जा रहा होगा? मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा है। आपकी आज्ञा हो तो उसको अपने घर पर बुला लूँ ? दत्ता बोला कि जीवा वैसे तो आपकी इच्छा है लेकिन मेरी इच्छा नहीं बन रही। क्योंकि अब पृथ्वी पर संत नहीं रहे। इनसे भी यह टहनी हरी नहीं होगी और फिर हमें रोना पड़ेगा। इस भूली हुई वास्तु को दोबारा याद न दिला। जीवा बोला कि देख लो जी जैसी आपकी इच्छा। परन्तु मेरी तो बहुत प्रबल इच्छा बन रही है कि एक बार अपने घर बुला लाऊँ। यदि आपका हुकुम हो तो बुला लाऊँ ?
दत्ता ने कहा की मैं आपकी आत्मा को क्यों दुःख दूँ? जब आपकी श्रद्धा बनी है तो संत आ जाए तो अच्छी ही बात है। इतनी देर में कबीर साहिब फिर वापिस आ जाते हैं। जैसे किसी का घर ढूंढ रहे हों। जिसकी सच्ची श्रद्धा परमेश्वर में लग जाती है उनको शरण में लेने के लिए परमात्मा न जाने क्या कारण बना दे ? स्वयं प्रकट हो जाएं या फिर अपना संत भेज दें। जब जीवा के मकान के पास आए तो जीवा दण्डवत प्रणाम करके बहुत मृदु भाषा में बोला की हे परवरदिगार, दास की झोंपड़ी साथ में ही है। एक बार पग फेरा कीजिए, चरण रखिए, दाता।
कबीर साहिब तो उसी उद्देश्य से आए थे। अपना उद्देश्य पूरा करना था, अंदर प्रवेश कर गए। साहिब के लिए बैठना दे दिया। कबीर साहिब बैठ गए। तत्वा बोला कि जीवा संतों का चरणामृत बनाएंगे, चरण धोएंगे। कबीर परमेश्वर के चरण धोए। तत्वा बोला कि जीवा संतों के चरणामृत को या तो पान कर लेना चाहिए या फिर किसी पौधे में डाल देना चाहिए। ऐसे वैसे गली में मत फैंकना। जीवा ने वह पात्र उठाया और चरणामृत को सूखी टहनी में डाल दिया। वह सूखी टहनी चरणामृत डालते-डालते हरी हो गई, उस पर कोपल फूट आई। बोलो सतगुरु देव की जय। बन्दी छोड़ कबीर साहिब की जय।
अब जीवा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। अपने भाई तत्वा को कहा की भईआ, जल्दी दौड़ कर आओ। जिसकी तलाश थी वे आज स्वयं आ गए हैं। अब दोनों भाई देख कर बहुत प्रसन्न हुए। विनय की कि हे परमेश्वर, आज तक कहाँ छुपे थे? दोनों एक-एक पैर पकड़कर खूब फूट-फूट कर रोने लगे। कहने लगे कि हे दाता! आप पहले क्यों नहीं आये? कबीर साहिब बोले कि मैं पहले भी आ जाता। परन्तु तुम्हारा भर्म नहीं मिटता। तुम सोचते कि एक महात्मा और है। शायद वह इनसे भी बड़ा होगा। कबीर साहिब से शक्तिशाली होगा। मेरे आते ही ये कार्य तो तुम्हारा हो जाना था। परन्तु फिर तुम्हारे मन में शंका रह जाती कि एक महात्मा और है जो बहुत बड़े मंडलेश्वर हैं और तू वहां भी जाता। फिर क्या होता है कि : -
गुरु को तजे भजे जो आना, ता पशुआ को फ़ोकट ज्ञाना।
जब पूर्ण संत मिल जाए तो फिर आन संत में आपकी श्रद्धा गुरु के तुल्य नहीं रहनी चाहिए। आदर अवश्य करें।
आये का आदर करे, चलते निवावे शीश।
तुलसी ऐसे मीत को, मिलियो बीसवे बीस।।
संतों का आदर करें, लेकिन गुरु से अधिक नहीं।
ज्यों पतिव्रता पति से राति, आन पुरुष नहीं भावै।
बसे पीहर में, ध्यान प्रीतम में, ऐसे सूरत लगावै।।
जब आपको पूर्ण संत मिल जाएँगे तो आपको पूर्ण ज्ञान हो जायेगा, सही नाम मिल जायेगा और आपके सभी दुखों का निवारण हो जायेगा ।संतों का आदर बहुत ज़रूरी है, अनादर करने से हमारे अंदर नफरत पैदा होगी। नफरत से भगवान दूर हो जाता है। जैसे पतिव्रता अपने पति से विशेष प्यार करती है अर्थात वास्तविक पूजा करती है। परन्तु फिर भी अपने जेठ का, जेठानी का, देवर और देवरानी का, रिश्तेदारों का, आये हुए अतिथि का बहुत आदर करती है। ऐसे हमने सब संतों व भक्तों का आदर करना है। लेकिन जो आदर अपने गुरु का करते हैं ऐसे नहीं करना, स्वाभाविक नहीं हो सकता। पतिव्रता अपने पति को जो प्यार दे सकती है और किसी को नहीं दे सकती। ऐसे कबीर साहिब जीवा तथा तत्वा को समझा रहे हैं।
फिर जीवा तथा तत्वा बोले कि प्रभु, दासों का कल्याण करो। कबीर साहिब ने कहा की उपदेश लो। बन्दी छोड़ ने उनको पहला मंत्र दिया और कहा कि कुछ समय के लिए इसका जाप करो। मैं फिर आऊँगा और फिर तुम्हें सतनाम दूंगा। सतनाम सतनाम यह कोई जाप नहीं है। वह सच्चा नाम, सतनाम, सतशब्द अन्य है। यदि कोई संत ऐसा सतनाम सतनाम जाप करने को देता है तो वो संत ज्ञानी नहीं है।
सच्चानाम (सच्चाशब्द, सतशब्द) है वह न्यारा है जो कबीर साहिब ने धर्मदास जी को दिया, गरीबदास जी को दिया, नानक जी को दिया, नामदेव जी को दिया, घीसा संत को दिया। वह सतनाम है। पहले केवल पान प्रवाना अर्थात तीन लोक से ऋण मुक्ति का मंत्र रूप में प्रथम मंत्र (नाम) दिया जाता है। फिर दूसरी बार सत्यनाम तथा फिर योग्यता तथा निष्ठा के आधार पर सारनाम दिया जाता है। सारनाम तीन मंत्र (नाम) का होता है। ऐसे तीन स्थिति में नाम दिया जाता है।
तब साहिब के चरणों में लगकर जीवा और दत्ता दोनों भाइयों की मुक्ति हुई।

ऋषि मुनीन्द्र और नल-नील की कथा

लाखो साल पहले त्रेता युग मे एक मुनीन्द्र नाम के ऋषि थे। वो अपने आश्रम में रहते थे व घूम घूम कर लोगो को भगवान की कथा सुनाते व भगति करने की सलाह देते। उनके आशीर्वाद से लोगो को बहुत से रोगों से छुटकारा मिलता व एक सुखपूर्ण जीवन का आधार मिलता। यहां तक कि श्रीरामचंद्र जी ,लंकापति रावण, हनुमान जी भी ऋषि मुनीन्द्र जी के संपर्क में आये। व उनके अटके काम भी ऋषि मुनीन्द्र जी की कृपा से ही ठीक हुए।

ऋषि मुनीन्द्र [Munindra Rishi] जी द्वारा नल व नील का भयंकर रोग सही करना।

नल व नील नाम के दो भाई थे ।उनको एक भयंकर रोग था। जिसके इलाज के लिए वो सब जगह गए लेकिन कोई भी ठीक न कर सका। उनका रोग निवारण मुनीन्द्र ऋषि जी के आशीर्वाद से हुआ। दोनों भाई मुनीन्द्र ऋषि के आश्रम में रहने लगे और वहां आने वाले भगतो की सेवा करने लगे।उनके कपड़े बर्तन आदि नदी में ले जाकर धो लाते।
दोनों भाई बहुत ही भोले भाले थे ।वे दोनों भाई नदी में कपड़ो को भिगो देते व बातें करने लग जाते। जब वो बातें करते तो कुछ कपड़े पानी मे बह जाते। इससे जिन लोगो के कपड़े गुम होते उन्हें बहुत परेशानी आती।उन्होंने यह शिकायत मुनीन्द्र ऋषि जी से की नल नील के कारण कभी हमारे बर्तन तो कभी हमारे कपड़े गुम हो जाते है। इस लिए हम अपना काम खुद कर लेंगें।

ऋषि मुनीन्द्र और नल-नील की कथा


नल नील ने जब ये सुना तो सेवा छिनने के डर से वे बहुत चिंतित हुए और ऋषि जी से प्रार्थना की “हे गुरुवर!ये सेवा हमसे मत छीनो हम आगे से और ज्यादा ध्यान रखेंगे”
ऋषि जी ने उनकी इस प्रार्थना से द्रवीभूत हो कर उनसे कहा कि “तुम्हारी सेवा भावना को देखकर मैं तुम्हेआशीर्वाद देता हूँ कि आज के बाद तुम्हारे हाथ से कोई वस्तु पानी मे नहीँ डूबेगी।”
ऐसा ही हुआ दोनों भाइयों ने पत्थर बर्तन आदि सब पानी मे रखकर देखे लेकिन कोई भी वस्तु पानी मे नही डूबी। दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा। कुछ समय पश्चात अयोध्या के राजा श्रीराम लंका जाने के लिए वहां आये।उनकी पत्नी सीता जी को लंका के राजा रावण उठाकर ले गया था इस कारण श्रीराम लंका पर अपनी सेना सहित चढ़ाई करना चाहते थे। लेकिन उनके सामने अथाह समुंदर था । उसे कैसे पार करे।श्रीराम जी मे तीन दिन तक पानी में खड़े रहकर समुंदर देवता से रास्ते की याचना की लेकिन कोई बात न बनी।इस पर क्रोधित होकर उन्होंने समुंदर को सुखाने के लिए अग्नि बाण निकाला ।तभी समुंदर देवता प्रगट हुए और कहा कि
“आपकी सेना में नल व नील नाम के दो कारीगर है जिनके हाथ से पानी मे रखी कोई वस्तु नही डूबती। जल के अंदर भी एक संसार बसा हुआ है यदी आप इसे सूखा दोगे तो वह सारा नस्ट हो जाएगा।”
इस पर श्रीराम ने दोनों भाइयों को बुलाकर उनसे इस बारे में पूछा गया कि क्या आपमे ऐसी करामात है । दोनों ने अभिमान वश कहा कि :
“हाँ ,हमारे हाथ से रखी कोई वस्तु पानी मे नही डूबती।”
जब उनकी इस बात का परीक्षण करने के लिए पत्थर पानी मे रखा गया तो वो डूब गया।। समुंदर देवता ने कहा कि जरूर इन्होंने कोई गलती की है जो ये शक्ति आज इनके हाथ मे नही रही। इन्होंने अपने गुरुदेव को याद नही किया।
अपना काम न बनता देख श्रीराम जी व्याकुल हो गए।तभी वहां पर मुनीन्द्र ऋषि जी जो नल नील के गुरुदेव थे वहां आये ।श्रीराम जी ने अपनी सारी व्यथा उनको सुनाई व पुल की आवश्यकता बताई।
तब मुनीन्द्र जी ने पास ही एक पहाड़ी के चारो तरफ एक डंडी से रेखा खींच दी और कहा
“इस रेखा के अंदर से जो भी पत्थर उठाकर पानी रखोगे वह डूबेगा नही।”
ऐसा ही हुआ। सभी ने मिलकर वहां से पत्थर उठाकर पानी मे रखे जिसे नल नील ने पानी मे सही तरीके से लगाया। व पुल बन कर तैयार हुआ. इस प्रकार समुंदर पर पुल मुनीन्द्र ऋषि जी के आशीर्वाद से बना।

ऋषि मुनीन्द्र [Munindra Rishi] जी द्वारा लंका के रावण को तत्वज्ञान समझाना

ऋषि मुनीन्द्र जी लंका में रावण को तत्वज्ञान समझाने भी गए थे। रावण की रानी मंदोदरी थी उसके मनोरंजन के लिए एक चन्द्रविजय नामक भाट की पत्नी उसके पास आती थी। मुनीन्द्र ऋषि जी ने चन्द्रविजय भाट को अपना शिष्य बनाया व बाद में उसका पूरा परिवार ऋषि मुनीन्द्र जी से उपदेशी हो गया। उपदेश लेने से पहले जब चन्द्रविजय की पत्नी रानी के पास जाती थी तो उसे असलील कहानी चुटकुले सुनाती थी लेकिन मुनीन्द्र जी से दीक्षित होने के बाद उसकी बातचीत का विषय बदल गया । जिससे मंदोदरी बहुत प्रभावित हुई। जब रानी मंदोदरी को यह पता चला कि यह परिवर्तन मुनीन्द्र ऋषि जी के कारण हैं तब उसने भी ऋषि जी दीक्षा ली।
मंदोदरी ने जब मुनीन्द्र ऋषि जी से दीक्षा ली तब एक दिन उसने अपने गुरुजी से कहा कि मेरे पति रावण को भी आप सत्य ज्ञान बताकर अपनी सरन में लो । मंदोदरी के बार बार विनय करने पर ऋषि मुनीन्द्र ने कहा कि मैं रावण को समझाने उसके राज दरबार के चला जाऊंगा। ऋषि मुनीन्द्र जी रावण की गुप्त सभा मे प्रकट हुए व ज्ञान बताने की चेष्ठा की। जिससे रावण तिलमिला गया व क्रोधित होकर तलवार से अनगिन वार किए जिसे मुनीन्द्र जी ने झाड़ू की सिंख से रोक दिया। रावण थककर चूर हो गया व कहा कि-
” मैं तुम्हारी बात नही सुनुँगा तुम्हे जाना है तो जाओ।”
इस प्रकार रावण को समझाने का भी ऋषि मुनीन्द्र जी ने बहुत प्रयास किया लेकिन अभिमान वश उसने उन्हें स्वीकार नही किया।
समुंदर पर पुल बनाने से पहले हनुमान जी भी ऋषि जी के संपर्क में आये थे। जब हनुमान जी लंका से सीता जी का पता लेकर उनके द्वारा दिया गया कंगन लेकर वापिस आ रहे थे तो रास्ते मे हनुमान जी कंगन को एक पत्थर पर रखकर स्नान करने लगे तभी एक बंदर ने वो कंगन उठा लिया। हनुमान जी कंगन के लिए उसके पीछे पड़ गए।तभी बंदर ऋषि मुनीन्द्र जी के आश्रम में प्रवेश कर गया वहाँ रखे बड़े से मटके में कंगन डालकर भाग गया। जब हनुमान जी ने मटके के अंदर देखे तो उसमें एक जैसे बहुत से कंगन थे। हनुमान जी उलझन में पड़ गए कि वास्तविक कंगन कौनसा है।
हनुमान जी ने इस विषय पर मुनीन्द्र ऋषि जी से पूछा। ऋषि जी ने बताया कि सभी कंगन असली है हनुमान ।
ये खेल बहुत बार हो चुका है। 30 करोड़ बार राम जा चुके है हर बार हनुमान आता है कंगन को बंदर उठाता है व इस मटके में डाल जाता है व फिर इसमें से एक कंगन हनुमान ले जाता है । हनुमान जी के यह पूछने पर की जब कंगन को हनुमान ले जाता है तो इसमें कहा से आये।
इस पर ऋषि जी हनुमान जी को समझाते है कि इस मटके में जैसे ही कोई वस्तु डलती है व तुरंत दो बन जाती है। मुनीन्द्र जी ने हनुमान जी को सच्चे राम की कथा सुनाई जो उन्होंने कुछ सुनी कुछ नही सुनी। लेकिन बाद में सीता जी के अयोध्या पहुंचने के बाद सीता जी की किसी कटु वचन पर व्यथित होकर हनुमान जी ने मुनीन्द्र ऋषि जी से दीक्षा लेकर अविनाशी राम की भगति की । इस पूरी घटना का वर्णन पवित्र कबीर सागर में हैं।
वास्तव में मुनीन्द्र ऋषि कोई और नही बल्कि खुद परमात्मा कबीर जी ही थे जो हर युग मे इस पृथ्वी पर आकर समाज मे भक्ति स्थापित करते है व साधको को सच्ची भगति बताकर उनका मोक्ष करते है। सतयुग में परमात्मा सत सुकृत नाम से इस पृथ्वी पर आए त्रेता में मुनीन्द्र नाम से वही द्वापर युग मे करुनामय नाम से उनका प्राकट्य हुआ । कलियुग में परमात्मा अपने वास्तविक नाम कबीर से 600 साल पहले कांशी शहर में अवतरित हुए।
कबीर जी की वाणी-
सतयुग में सतसुकृत कह टेरा –
त्रेता नाम मुनीन्द्र मेरा
द्वापर में करुनामय कहाया
कलियुग नाम कबीर धराया।


पाण्डवों की यज्ञ में सुपच सुदर्शन द्वारा शंख बजाना

सर्व विदित है कि महाभारत के युद्ध में अर्जुन युद्ध करने से मना करके शस्त्र त्याग कर युद्ध के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच में खड़े रथ के पिछले हिस्से में आंखों से आँसू बहाता हुआ बैठ गया। तब भगवान कृृ ृष्ण के अन्दर प्रवेश काल शक्ति (ब्रह्म) ने अर्जुन को युद्ध करने की राय दी। तब अर्जुन ने कहा भगवान! यह महापाप मैं नहीं करूँगा। इससे अच्छा तो भिक्षा का अन्न भी खा कर गुजारा कर लेंगे। तब भगवान काल श्री कृृष्ण के शरीर में प्रवेश काल ने कहा कि अर्जुन युद्ध कर। तुझे कोई पाप नहीं लगेगा। देखें गीता जी के अध्याय 11 के श्लोक 33, अध्याय 2 के श्लोक 37, 38 में।

पाण्डवों की यज्ञ में सुपच सुदर्शन द्वारा शंख बजाना


महाभारत में लेख (प्रकरण) आता है कि कृृष्ण जी के कहने से अर्जुन ने युद्ध करना स्वीकार कर लिया। घमासान युद्ध हुआ। करोड़ों व्यक्ति व सर्व कौरव युद्ध में मारे गए और पाण्डव विजयी हुए। तब पाण्डव प्रमुख युधिष्ठिर को राज्य सिंहासन पर बैठाने के लिए स्वयं भगवान कृृष्ण ने कहा तो युिधष्ठिर ने यह कहते हुए गद्दी पर बैठने से मना कर दिया कि मैं ऐसे पाप युक्त राज्य को नहीं करूंगा। जिसमें करोड़ों व्यक्ति मारे गए थे। उनकी पत्नियाँ विधवा हो गई, करोड़ों बच्चे अनाथ हो गए, अभी तक उनके आँसू भी नहीं सूखे हैं। किसी प्रकार भी बात बनती न देख कर श्री कृृष्ण जी ने कहा कि आप भीष्म जी से सलाह कर लो। क्योंकि जब व्यक्ति स्वयं फैसला लेने में असफल रहे तब किसी स्वजन से विचार कर लेना चाहिए। युधिष्ठिर ने यह बात स्वीकार कर ली। तब श्री कृृष्ण जी युधिष्ठिर को साथ ले कर वहाँ पहुँचे जहाँ पर श्री भीष्म शर (तीरों की) सैय्या (चारपाई) पर अंतिम स्वांस गिन रहे थे, वहाँ जा कर श्री कृृष्ण जी ने भीष्म से कहा कि युधिष्ठिर राज्य गद्दी पर बैठने से मना कर रहे हैं। कृृप्या आप इन्हें राजनीति की शिक्षा दें।
भीष्म जी ने बहुत समझाया परंतु युधिष्ठिर अपने उद्देश्य ये विचलित नहीं हुआ। यही कहता रहा कि इस पाप से युक्त रूधिर से सने राज्य को भोग कर मैं नरक प्राप्ति नहीं चाहूँगा। फिर श्री कृृष्ण जी ने कहा कि आप एक धर्म यज्ञ करो। जिससे आपको युद्ध में हुई हत्याओं का पाप नहीं लगेगा। इस बात पर युधिष्ठिर सहमत हो गया और एक धर्म यज्ञ की। फिर राज गद्दी पर बैठ गया। हस्तिनापुर (दिल्ली) का राजा बन गया।
प्रमाण:-- सुखसागर के पहले स्कन्ध के आठवें अध्याय से सहाभार पृृृष्ठ नं. 48 से 53
आठवाँ तथा नौवां अध्याय।।
श्री कृृष्ण भगवान ने अपनी शक्ति से युधिष्ठिर को उन सर्व महा मण्डलेश्वरों के भविष्य में होने वाले जन्म दिखाए जिसमें किसी ने कैंचवे का, किसी ने भेड़-बकरी, भैंस व शेर आदि के रूप बना रखे थे।
यह सब देख कर युधिष्ठिर ने कहा - हे भगवन! फिर तो पृृथ्वी संत रहित हो गई। भगवान कृृष्ण ने कहा जब पृृथ्वी संत रहित हो जाएगी तो यहाँ आग लग जाएगी। सर्व जीव-जन्तु आपस में लड़ मरेंगे। यह तो पूरे संत की शक्ति से सन्तुलन बना रहता है। फिर मैं (भगवान विष्णु) पृृथ्वी पर आ कर राक्षस वृृत्ति के लोगों को समाप्त करता हूँ जिससे संत सुखी हो जाएं। जिस प्रकार जमींदार अपनी फसल से हानि पहुँचने वाले अन्य पौधों को जो झाड़-खरपतवार आदि को काट-काट कर बाहर डाल देता है तब वह फसल स्वतन्त्राता पूर्वक फलती-फूलती है। पूर्ण संत उस फसल में सिचांई सा सुख प्रदान करते हैं। पूर्ण संत सबको समान सुख देते हैं। जिस प्रकार पानी दोनों प्रकार के पौधों का पोषण करते हैं। उनमें सर्व जीव के प्रति दया भाव होता है। श्री कृृष्ण जी ने फिर कहा अब मैं आपको पूर्ण संत के दर्शन करवाता हूँ। एक महात्मा दिल्ली के उत्तर पूर्व में रहते हैं। उसको बुलवाना है। तब युधिष्ठिर ने कहा कि उस ओर संतों को आमन्त्रिात करने का कार्य भीमसैन को सौंपा था। पता करते हैं कि वह उन महात्मा तक पहुँचा या नहीं। भीमसैन को बुलाकर पूछा तो उसने बताया कि मैं उस से मिला था। उनका नाम स्वपच सुदर्शन है। बाल्मिकी जाति में गृृहस्थी संत हैं। एक झौंपड़ी में रहता है। उन्होंने यज्ञ में आने से मना कर दिया। इस पर श्री कृृष्ण जी ने कहा कि संत मना नहीं किया करते। सर्व वार्ता जो उनके साथ हुई है वह बताओ। तब भीम सैन ने आगे बताया कि मैंने उनको आमन्त्रिात करते हुए कहा कि हे संत परवर! हमारी यज्ञ में आने का कष्ट करना। उनको पूरा पता बताया। उसी समय वे (सुदर्शन संत जी) कहने लगे भीम सैन आप के पाप के अन्न को खाने से संतों को दोष लगेगा। आपने तो घोर पाप कर रखा है। करोड़ों जीवा की हत्या करके आज आप राज्य का आनन्द ले रहे हो। युद्ध में वीरगति को प्राप्त सैनिकों की विधवा पत्नी व अनाथ बच्चे रह-रह कर अपने पति व पिता को याद करके फूट-फूट कर घंटों रोते हैं। बच्चे अपनी माँ से लिपट कर पूछ रहे हैं - माँ, पापा छुट्टी नहीं आए? कब आएंगे? हमारे लिए नए वस्त्रा लाएंगे। दूसरी लड़की कहती है कि मेरे लिए नई साड़ी लाएंगे। बड़ी होने पर जब मेरी शादी होगी तब मैं उसे बाँधकर ससुराल जाऊँगी। वह लड़का (जो दस वर्ष की आयु का है) कहता है कि मैं अब की बार पापा (पिता जी) से कहूँगा कि आप नौकरी पर मत जाना। मेरी माँ तथा भाई-बहन आपके बिना बहुत दुःख पाते हैं। माँ तो सारा दिन-रात आपकी याद करके जब देखो एकांत स्थान पर रो रही होती है। या तो हम सबको अपने पास बुला लो या आप हमारे पास रहो। छोड़ दो नौकरी को। मैं जवान हो गया हूँ। आपकी जगह मैं फौज में जा कर देश सेवा करूंगा। आप अपने परिवार में रहो। आने दो पिता जी को, बिल्कुल नहीं जाने दूँगा। (उन बच्चों को दुःखी होने से बचाने के लिए उनकी माँ ने उन्हें यह नहीं बताया कि आपके पिता जी युद्ध में मर चुके हैं क्योंकि उस समय वे बच्चे अपने मामा के घर गए हुए थे। केवल छोटा बच्चा जो डेढ़ वर्ष की आयु का था वही घर पर था। अन्य बच्चों को जान बूझ कर नहीं बुलाया था।) इस प्रकार उन मासूम बच्चों की आपसी वार्ता से दुःख पाकर उनकी माँ का हृदय पति की याद के दुःख से भर आया। उसे हल्का करने के लिए (रोने के लिए) दूसरे कमरे में जा कर फूट-फूट कर रोने लगी।

तब सारे बच्चे माँ के ऊपर गिरकर रोने लगे। सम्बन्धियों ने आकर शांत करवाया। कहा कि बच्चों को स्पष्ट बताओ कि आपके पिता जी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए। जब बच्चों को पता चला कि हमारे पापा (पिता जी) अब कभी नहीं आएंगे तब उस स्वार्थी राजा को कोसने लगे जिसने अपने भाई बटवारे के लिए दुनियाँ के लालों का खून पी लिया। यह कोई देश रक्षा की लड़ाई भी नहीं थी जिसमें हम संतोष कर लेते कि देश के हित में प्राण त्याग दिए हैं। इस खूनी राजा ने अपने ऐशो-आराम के लिए खून की नदी बहा दी। अब उस पर मौज कर रहा है। आगे संत सुदर्शन (स्वपच) बता रहे हैं कि भीम ऐसे-2 करोड़ों प्राणी युद्ध की पीड़ा से पीडि़त हैं। उनकी हाय आपको चैन नहीं लेने देगी चाहे करोड़ यज्ञ करो। ऐसे दुष्ट अन्न को कौन खाए? यदि मुझे बुलाना चाहते हो तो मुझे पहले किए हुए सौ (100) यज्ञों का फल देने का संकल्प करो अर्थात् एक सौ यज्ञों का फल मुझे दो तब मैं आपके भोजन पाऊँ। सुदर्शन जी के मुख से इस बात को सुन कर भीम ने बताया कि मैं बोला आप तो कमाल के व्यक्ति हो, सौ यज्ञों का फल मांग रहे हो। यह हमारी दूसरी यज्ञ है। आपको सौ का फल कैसे दें? इससे अच्छा तो आप मत आना। आपके बिना कौन सी यज्ञ सम्पूर्ण नहीं होगी। जब स्वयं भगवान कृृष्ण जी साथ हैं। सर्व वार्ता सुन कर श्री कृृष्ण जी ने कहा भीम! संतों के साथ ऐसा अभद्र-व्यवहार नहीं किया करते। सात समुद्रों का अंत पाया जा सकता है परंतु सतगुरु (कबीर साहेब) के संत का पार नहीं पा सकते। उस महात्मा सुदर्शन (स्वपच) के एक बाल के समान तीन लोक भी नहीं हैं। मेरे साथ चलो, उस परमपिता परमात्मा के प्यारे हंस को लाने के लिए।
तब पाँचों पाण्डव व श्री कृृष्ण भगवान रथ में सवार होकर चले। सन्त के निवास से एक मील दूर रथ खड़ा करके नंगे पैरों स्वपच की झोंपड़ी पर पहुँचे। उस समय स्वयं कबीर साहेब (करुणामय साहेब जी स्वपच के गुरुदेव थे क्योंकि साहिब कबीर द्वापर युग में करुणामय नाम से अपने सतलोक से आए थे तथा सुदर्शन को अपना सतलोक का सत्य ज्ञान समझाया था) सुदर्शन स्वपच का रूप बना कर झोपड़ी में बैठ गए व सुदर्शन को अपनी गुप्त प्रेरणा से मन में संकल्प उठा कर कहीं दूर के संत या भक्त से मिलने भेज दिया जिसमें आने व जाने में कई रोज लगने थे। तब सुदर्शन के रूप में सतगुरु की चमक व शक्ति देख कर सर्व पाण्डव बहुत प्रभावित हुए।

स्वयं श्री कृृष्णजी ने लम्बी दण्डवत् प्रणाम की। तब देखा देखी सर्व पाण्डवों ने भी एैसा ही किया। कृृष्ण जी की ओर दृृष्टि डाल कर सुपच सुदर्शन जी ने आदर पूर्वक कहा कि - हे त्रिभुवननाथ! आज इस दीन के द्वार पर कैसे? मेरा अहोभाग्य है कि आज दीनानाथ विश्वम्भर मुझ तुच्छ को दर्शन देने स्वयं चल कर आए हैं। सबको आदर पूर्वक बैठना दिया तथा आने का कारण पूछा। श्री कृृष्ण जी ने कहा कि हे जानी-जान! आप सर्व गति (स्थिति) से परीचित हैं। पाण्डवों ने यज्ञ की है। वह आपके बिना सम्पूर्ण नहीं हो रही है। कृृप्या इन्हें कृृतार्थ करें। उसी समय वहां उपस्थित भीम की ओर संकेत करते हुए महात्मा जी सुदर्शन रूप में विराजमान परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि यह वीर मेरे पास आया था तथा मैंने अपनी विवशता से इसे अवगत करवाया था। श्री कृृष्ण जी नेे कहा कि - हे पूर्णब्रह्म! आपने स्वयं अपनी वाणी में कहा है कि -
‘‘संत मिलन को चालिए, तज माया अभिमान। ज्यों ज्यों पग आगे धरै, सो-सो यज्ञ समान।।‘‘
आज पांचों पाण्डव राजा हैं तथा मैं स्वयं द्वारिकाधीश आपके दरबार में राजा होते हुए भी नंगे पैरों उपस्थित हूँ। अभिमान का नामों निशान भी नहीं है तथा स्वयं भीम ने भी खड़ा हो कर उस दिन कहे हुए अपशब्दों की चरणों में पड़ कर क्षमा याचना की। इसलिए हे नाथ! आज यहाँ आपके दर्शनार्थ आए आपके छः सेवकों के कदमों के यज्ञ समान फल को स्वीकार करते हुए सौ आप रखो तथा शेष हम भिक्षुकों को दान दो ताकि हमारा भी कल्याण हो। इतना आधीन भाव सर्व उपस्थित जनों में देख कर जगतगुरु (करुणामय)सुदर्शन रूप में अति प्रसन्न हुए।
कबीर, साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं।जो कोई धन का भूखा, वो तो साधू नाहिं।।
उठ कर उनके साथ चल पड़े। जब सुदर्शन जी यज्ञशाला में पहुँचे तो चारों ओर एक से एक ऊँचे सुसज्जित आसनों पर विराजमान महा मण्डलेश्वर सुदर्शन जी के रूप (दोहरी धोती घुटनों से थोड़ी नीचे तक, छोटी-2 दाड़ी, सिर के बिखरे केश न बड़े न छोटे, टूटी-फूटी जूती। मैले से कपड़े, तेजोमय शरीर) को देखकर अपने मन में सोच सोचने लगे ऐसे अपवित्रा व्यक्ति से शंख सात जन्म भी नहीं बज सकता है। यह तो हमारे सामने ऐसे है जैसे सूर्य के सामने दीपक। श्रीकृृष्ण जी ने स्वयं उस महात्मा का आसन अपने हाथों लगाया (बिछाया) क्योंकि श्री कृृष्ण श्रेष्ठ आत्मा हैं, (परमात्मा हैं) उन्होंने सुदामा व भिलनी को भी हृदय से चाहा। यहाँ तो स्वयं परमेश्वर पूर्णब्रह्म सतपुरुष, (अकाल मूर्ति) आए हैं। द्रौपदी से कहा कि हे बहन! सुदर्शन महात्मा जी आए हैं, भोजन तैयार करो। बहुत पहुँचे हुए संत हैं। द्रौपदी देख रही है कि संत लक्षण तो एक भी नहीं दिखाई देते हैं।

यह तो एक गृृहस्थी गरीब (कंगाल) व्यक्ति नजर आता है। न तो वस्त्रा भगवां, न गले में माला, न तिलक, न सिर पर बड़ी जटा, न मुण्ड ही मुण्डवा रखा और न ही कोई चिमटा, झोली, करमण्डल लिए हुए था। फिर भी श्री कृृष्ण जी के कहते ही स्वादिष्ट भोजन कई प्रकार का बनाकर एक सुन्दर थाल (चांदी का) में परोस कर सुदर्शन जी के सामने रख कर मन में सोचने लगी कि आज यह भक्त भोजन खा कर ऊँगली चाटता रह जाएगा। जिन्दगी में ऐसा भोजन कभी नहीं खाया होगा। सुदर्शन जी ने नाना प्रकार के भोजन को इक्ट्ठा किया तथा खिचड़ी सी बनाई। उस समय द्रौपदी ने देखा कि इसने तो सारा भोजन (खीर, खांड, हलुवा, सब्जी, दही, बड़े आदि) घोल कर एक कर लिया। तब मन में दुर्भावना पूर्वक विचार किया कि इस मूर्ख हब्शी ने तो खाना खाने का भी ज्ञान नहीं। यह काहे का संत? कैसा शंख बजाएगा। {क्योंकि खाना बनाने वाली स्त्राी की यह भावना होती है कि मैं एैसा स्वादिष्ट भोजन बनाऊँ कि खाने वाला मेरे भोजन की प्रशंसा कई जगह करे)। प्रत्येक बहन की यही आशा होती है।
वह बेचारी एक घंटे तक धुएँ से आँखें खराब करती है और मेरे जैसा कह दे कि नमक तो है ही नहीं, तब उसका मन बहुत दुःखी होता है। इसलिए संत जैसा मिल जाए उसे खा कर सराहना ही करते हैं। यदि कोई न खा सके तो नमक कह कर ‘संत‘ नहीं मांगता। संतों ने नमक का नाम राम-रस रखा हुआ है। कोई ज्यादा नमक खाने का अभ्यस्त हो तो कहेगा कि भईया- रामरस लाना। घर वालों को पता ही न चले कि क्या मांग रहा है? क्योंकि सतसंग में सेवा में अन्य सेवक ही होते हैं। न ही भोजन बनाने वालों को दुःख हो। एक समय एक नया भक्त किसी सतसंग में पहली बार गया। उसमें किसी ने कहा कि भक्त जी रामरस लाना।

दूसरे ने भी कहा कि रामरस लाना तथा थोड़ा रामरस अपनी हथेली पर रखवा लिया। उस नए भक्त ने खाना खा लिया था। परंतु पंक्ति में बैठा अन्य भक्तों के भोजन पाने का इंतजार कर रहा था कि इकट्ठे ही उठेंगे। यह भी एक औपचारिकता सतसंग में होती है। उसने सोचा रामरस कोई खास मीठा खाद्य पदार्थ होगा। यह सोच कर कहा मुझे भी रामरस देना। तब सेवक ने थोड़ा सा रामरस (नमक) उसके हाथ पर रख दिया। तब वह नया भक्त बोला - ये के कान कै लाना है, चैखा सा (ज्यादा) रखदे। तब उस सेवक ने दो तीन चमच्च रख दिया। उस नए भक्त ने उस बारीक नमक को कोई खास मीठा खाद्य प्रसाद समझ कर फांका मारा।

तब चुपचाप उठा तथा बाहर जा कर कुल्ला किया। फिर किसी भक्त से पूछा रामरस किसे कहते हैं? तब उस भक्त ने बताया कि नमक को रामरस कहते हैं। तब वह नया भक्त कहने लगा कि मैं भी सोच रहा था कि कहें तो रामरस परंतु है बहुत खारा। फिर विचार आया कि हो सकता है नए भक्तों पर परमात्मा प्रसन्न नहीं हुए हों। इसलिए खारा लगता हो। मैं एक बार फिर कोशिश करता, अच्छा हुआ जो मैंने आपसे स्पष्ट कर लिया। फिर उसे बताया गया कि नमक को रामरस किस लिए कहते हैं?}
स्वपच सुदर्शन जी ने उस सारे भोजन को पाँच ग्रास बना कर खा लिया। पाँच बार शंख ने आवाज की। उसके बाद शंख ने आवाज नहीं की।
गरीबदास जी महाराज की वाणी
(सतग्रन्थ साहिब पृृष्ठ नं. 862)
राग बिलावल से
व्यंजन छतीसों परोसिया जहाँ द्रौपदी रानी।
बिन आदर सतकार के, कही श्ंाख ना बानी।।
पंच गिरासी बालमीक, पंचै बर बोले।
आगे शंख पंचायन, कपाट न खोले।।
बोले कष्ण महाबली, त्रिभुवन के साजा।
बाल्मिक प्रसाद से, शंख अखण्ड क्यों न बाजा।।
द्रोपदी सेती कष्ण देव, जब ऐसे भाखा।
बाल्मिक के चरणों की, तेरे ना अभिलाषा।।
प्रेम पंचायन भूख है, अन्न जग का खाजा।
ऊँच नीच द्रोपदी कहा, शंख अखण्ड यूँ नहीं बाजा।।
बाल्मिक के चरणों की, लई द्रोपदी धारा।
अखण्ड शंख पंचायन बाजीया, कण-कण झनकारा।।
उस समय श्री कृृष्ण ने सोचा कि इन महात्मा सुदर्शन के भोजन खा लेने से भी शंख अखण्ड क्यों नहीं बजा? अपनी दिव्य दृृष्टि से देखा? तब द्रौपदी से कहा - द्रौपदी, भोजन सब प्राणी अपने-2 घर पर रूखा-सूखा खा कर ही सोते हैं। आपने बढि़या भोजन बना कर अपने मन में अभिमान पैदा कर लिया। बिना आदर सतकार के किया हुआ धार्मिक अनुष्ठान (यज्ञ, हवन, पाठ) सफल नहीं होता। फिर आपने इस साधारण से व्यक्ति को क्या समझ रखा है? यह पूर्णब्रह्म हैं। इसके एक बाल के समान तीनों लोक भी नहीं हैं। आपने अपने मन में इस महापुरुष के बारे में गलत विचार किए हैं उनसे आपका अन्तःकरण मैला (मलीन) हो गया है।

इनके भोजन ग्रहण कर लेने से तो यह शंख स्वर्ग तक आवाज करता और सारा ब्रह्मण्ड गूंज उठता। अब यह पांच बार बोला है। इसलिए कि आपका भ्रम दूर हो जाए क्योंकि और किसी ऋषि के भोजन पाने से तो यह टस से मस नहीं हुआ। अब आप अपना मन साफ करके इन्हें पूर्ण परमात्मा समझकर इनके चरणों को धो कर पीओ, ताकी तेरे हृदय का मैल (पाप) साफ हो जाए।
उसी समय द्रौपदी ने अपनी गलती को स्वीकार करते हुए संत से क्षमा याचना की और सुपच सुदर्शन गृृहस्थी भक्त के चरण अपने हाथों धो कर चरणामृृत बनाया। रज भरे (धूलि युक्त) जल को पीने लगी। जब आधा पी लिया तब भगवान कृृष्ण ने कहा द्रौपदी कुछ अमृृत मुझे भी दे दो ताकि मेरा भी कल्याण हो। यह कह कर कृृ ृष्ण जी ने द्रौपदी से आधा बचा हुआ चरणामृृत पीया। उसी समय वही पंचायन शंख इतने जोरदार आवाज से बजा कि स्वर्ग तक ध्वनि सुनि। बहुत समय तक अखण्ड बजता रहा तब वह पाण्डवों की यज्ञ सफल हुई।
प्रमाण के लिए

बन्दी छोड़ गरीबदास जी महाराज कृृत
।। अचला का अंग।।
(सत ग्रन्थ साहिब पृृृष्ठ नं. 359)
गरीब, सुपच रूप धरि आईया, सतगुरु पुरुष कबीर।
तीन लोक की मेदनी, सुर नर मुनिजन भीर।।97।।
गरीब, सुपच रूप धरि आईया, सब देवन का देव।
कष्णचन्द्र पग धोईया, करी तास की सेव।। 98।।
गरीब, पांचैं पंडौं संग हैं, छठ्ठे कष्ण मुरारि।
चलिये हमरी यज्ञ में, समर्थ सिरजनहार।।99।।
गरीब, सहंस अठासी ऋषि जहां, देवा तेतीस कोटि।
शंख न बाज्या तास तैं, रहे चरण में लोटि।।100।।
गरीब, पंडित द्वादश कोटि हैं, और चैरासी सिद्ध।
शंख न बाज्या तास तैं, पिये मान का मध।।101।।
गरीब, पंडौं यज्ञ अश्वमेघ में, सतगुरु किया पियान।
पांचैं पंडौं संग चलैं, और छठा भगवान।।102।।
गरीब, सुपच रूप को देखि करि, द्रौपदी मानी शंक।
जानि गये जगदीश गुरु, बाजत नाहीं शंख।।103।।
गरीब, छप्पन भोग संजोग करि, कीनें पांच गिरास।
द्रौपदी के दिल दुई हैं, नाहीं दढ़ विश्वास।। 104।।
गरीब, पांचैं पंडौं यज्ञ करी, कल्पवक्ष की छांहिं।
द्रौपदी दिल बंक हैं, शंख अखण्ड बाज्या नांहि।।105।।
गरीब, छप्पन भोग न भोगिया, कीन्हें पंच गिरास।
खड़ी द्रौपदी उनमुनी, हरदम घालत श्वास।।107।।
गरीब, बोलै कष्ण महाबली, क्यूं बाज्या नहीं शंख।
जानराय जगदीश गुरु, काढत है मन बंक।।108।।
गरीब, द्रौपदी दिल कूं साफ करि, चरण कमल ल्यौ लाय।
बालमीक के बाल सम, त्रिलोकी नहीं पाय।।109।।
गरीब, चरण कमल कूं धोय करि, ले द्रौपदी प्रसाद।
अंतर सीना साफ होय, जरैं सकल अपराध।।110।।
गरीब, बाज्या शंख सुभान गति, कण कण भई अवाज।
स्वर्ग लोक बानी सुनी, त्रिलोकी में गाज।।111।।
गरीब, पंडौं यज्ञ अश्वमेघ में, आये नजर निहाल।
जम राजा की बंधि में, खल हल पर्या कमाल।।113।।
सत ग्रन्थ साहिब पृृृष्ठ नं. 328
।।पारख का अंग।।
गरीब, सुपच शंक सब करत हैं, नीच जाति बिश चूक।
पौहमी बिगसी स्वर्ग सब, खिले जो पर्वत रूंख।
गरीब, करि द्रौपदी दिलमंजना, सुपच चरण जी धोय।
बाजे शंख सर्व कला, रहे अवाजं गोय।।
गरीब, द्रौपदी चरणामृत लिये, सुपच शंक नहीं कीन।
बाज्या शंख असंख धुनि, गण गंधर्व ल्यौलीन।।
गरीब, फिर पंडौं की यज्ञ में, संख पचायन टेर।
द्वादश कोटि पंडित जहां, पडी सभन की मेर।।
गरीब, करी कृष्ण भगवान कूं, चरणामृत स्यौं प्रीत।
शंख पंचायन जब बज्या, लिया द्रोपदी सीत।।
गरीब, द्वादश कोेटि पंडित जहां, और ब्रह्मा विष्णु महेश।
चरण लिये जगदीश कूं, जिस कूं रटता शेष।।
गरीब, बालमीक के बाल समि, नाहीं तीनौं लोक।
सुर नर मुनि जन कृष्ण सुधि, पंडौं पाई पोष।।
गरीब, बाल्मीक बैंकुठ परि, स्वर्ग लगाई लात।
संख पचायन घुरत हैं, गण गंर्धव ऋषि मात।।
गरीब, स्वर्ग लोक के देवता, किन्हैं न पूर्या नाद।
सुपच सिंहासन बैठतैं, बाज्या अगम अगाध।।
गरीब, पंडित द्वादश कोटि थे, सहिदे से सुर बीन।
संहस अठासी देव में, कोई न पद में लीन।
गरीब, बाज्या संख स्वर्ग सुन्या, चैदह भवन उचार।
तेतीसौं तत्त न लह्या, किन्हैं न पाया पार।।

सतनाम व सारनाम बिना सर्व साधना व्यर्थ।।

यज्ञ संवाद में स्वयं कृृष्ण भगवान कहते हैं कि युधिष्ठिर ये सर्व भेष धारी व सर्व ऋषि, सिद्ध, देवता, ब्राह्मण आदि सब पाखण्डी लोग हैं। इनके अन्दर भाव भक्ति नहीं है। सिर्फ दिखावा करके दुनियां के भोले-भाले भक्तों को अपनी महिमा जनाए बैठे हैं। कृृप्या पाठक विचार करें कि वह समय द्वापर युग का था उस समय के संत बहुत ही अच्छे साधु थे क्योंकि आज से साढे पांच हजार वर्ष पूर्व आम व्यक्ति के विचार भी नेक होते थे। आज से 30,40 वर्ष पहले आम व्यक्ति के विचार आज की तुलना में बहुत अच्छे होते थे। इसकी तुलना को साढे पांच हजार वर्ष पूर्व का विचार करें तो आज के संतों-साधुओं से उस समय के सन्यासी साधु बहुत ही उच्च थे। फिर भी स्वयं भगवान ने कहा ये सब पशु हैं, शास्त्रविधि अनुसार उपासना करने वाले उपासक नहीं हैं। यही कड़वी सच्चाई गरीबदास जी महाराज ने षटदर्शन घमोड़ बहदा तथा बहदे के अंग में, तक्र वेदी में, सुख सागर बोध में तथा आदि पुराण के अंग में कही है कि जो साधना यह साधक कर रहे हैं वह सत्यनाम व सारनाम बिना बहदा (अनावश्यक) है। 

मृत लड़के सेऊ को जीवित करना

एक समय साहेब कबीर अपने भक्त सम्मन के यहाँ अचानक दो सेवकों (कमाल व शेखफरीद) के साथ पहुँच गए। सम्मन के घर कुल तीन प्राणी थे। सम्मन, सम्मन की पत्नी नेकी और सम्मन का पुत्र सेऊ। भक्त सम्मन इतना गरीब था कि कई बार अन्न भी घर पर नहीं होता था। सारा परिवार भूखा सो जाता था। आज वही दिन था। भक्त सम्मन ने अपने गुरुदेव कबीर साहेब से पूछा कि साहेब खाने का विचार बताएँ, खाना कब खाओगे? कबीर साहेब ने कहा कि भाई भूख लगी है। भोजन बनाओ। सम्मन अन्दर घर में जा कर अपनी पत्नी नेकी से बोला कि अपने घर अपने गुरुदेव भगवान आए हैं। जल्दी से भोजन तैयार करो। तब नेकी ने कहा कि घर पर अन्न का एक दाना भी नहीं है। सम्मन ने कहा पड़ोस वालों से उधार मांग लाओ। नेकी ने कहा कि मैं मांगने गई थी लेकिन किसी ने भी उधार आटा नहीं दिया। उन्होंने आटा होते हुए भी जान बूझ कर नहीं दिया और कह रहे हैं कि आज तुम्हारे घर तुम्हारे गुरु जी आए हैं।


तुम कहा करते थे कि हमारे गुरु जी भगवान हैं। आपके गुरु जी भगवान हैं तो तुम्हें माँगने की आवश्यकता क्यों पड़ी? ये ही भर देगें तुम्हारे घर को आदि-2 कह कर मजाक करने लगे। सम्मन ने कहा लाओ आपका चीर गिरवी रख कर तीन सेर आटा ले आता हूँ। नेकी ने कहा यह चीर फटा हुआ है। इसे कोई गिरवी नहीं रखता। सम्मन सोच में पड़ जाता है और अपने दुर्भाग्य को कोसते हुए कहता है कि मैं कितना अभागा हूँ। आज घर भगवान आए और मैं उनको भोजन भी नहीं करवा सकता। हे परमात्मा! ऐसे पापी प्राणी को पृथ्वी पर क्यों भेजा। मैं इतना नीच रहा हूँगा कि पिछले जन्म में कोई पुण्य नहीं किया। अब सतगुरु को क्या मुंह दिखाऊँ? यह कह कर अन्दर कोठे में जा कर फूट-2 कर रोने लगा। तब उसकी पत्नी नेकी कहने लगी कि हिम्मत करो। रोवो मत। परमात्मा आए हैं। इन्हें ठेस पहुँचेगी। सोचंेगे हमारे आने से तंग आ कर रो रहा है। सम्मन चुप हुआ। फिर नेकी ने कहा आज रात्राी में दोनों पिता पुत्रा जा कर तीन सेर (पुराना बाट किलो ग्राम के लगभग) आटा लाना। केवल संतों व भक्तों के लिए। तब लड़का सेऊ बोला माँ - गुरु जी कहते हैं चोरी करना पाप है। फिर आप भी मुझे शिक्षा दिया करती कि बेटा कभी चोरी नहीं करनी चाहिए। जो चोरी करते हैं उनका सर्वनाश होता है।

आज आप यह क्या कह रही हो माँ? क्या हम पाप करेंगे माँ? अपना भजन नष्ट हो जाएगा। माँ हम चैरासी लाख योनियों में कष्ट पाएंगे। एैसा मत कहो माँ। माँ आपको मेरी कसम। तब नेकी ने कहा पुत्रा तुम ठीक कह रहे हो। चोरी करना पाप है परंतु पुत्रा हम अपने लिए नहीं बल्कि संतों के लिए करेंगे। नेकी ने कहा बेटा - ये नगर के लोग अपने से बहुत चिड़ते हैं। हमने इनको कहा था कि हमारे गुरुदेव कबीर साहेब (पूर्ण परमात्मा) आए हुए हैं। इन्होंने एक मृतक गऊ तथा उसके बच्चे को जीवित कर दिया था जिसके टुकड़े सिंकदर लौधी ने करवाए थे। एक लड़के तथा एक लड़की को जीवित कर दिया। सिंकदर लौधी राजा का जलन का रोग समाप्त कर दिया तथा श्री रामानन्द जी (कबीर साहेब के गुरुदेव) जो सिंकदर लौधी ने तलवार से कत्ल कर दिया था वे भी कबीर साहेब ने जीवित कर दिए थे। इस बात का ये नगर वाले मजाक कर रहे हैं और कहते हैं कि आपके गुरु कबीर तो भगवान हैं तुम्हारे घर को भी अन्न से भर देंगे। फिर क्यों अन्न (आटे) के लिए घर घर डोलती फिरती हो?
बेटा ये नादान प्राणी हैं यदि आज साहेब कबीर इस नगरी का अन्न खाए बिना चले गए तो काल भगवान भी इतना नाराज हो जाएगा कि कहीं इस नगरी को समाप्त न कर दे। हे पुत्रा! इस अनर्थ को बचाने के लिए अन्न की चोरी करनी है। हम नहीं खाएंगे। केवल अपने सतगुरु तथा आए भक्तों को प्रसाद बना कर खिलाएगें। यह कह कर नेकी की आँखों में आँसू भर आए और कहा पुत्रा नाटियो मत अर्थात् मना नहीं करना। तब अपनी माँ की आँखों के आँसू पौंछता हुआ लड़का सेऊ कहने लगा

- माँ रो मत, आपका पुत्रा आपके आदेश का पालन करेगा। माँ आप तो बहुत अच्छी हो न।
अर्ध रात्राी के समय दोनों पिता (सम्मन) पुत्रा (सेऊ) चोरी करने के लिए चले दिए। एक सेठ की दुकान की दीवार में छिद्र किया। सम्मन ने कहा कि पुत्रा मैं अन्दर जाता हूँ। यदि कोई व्यक्ति आए तो धीरे से कह देना मैं आपको आटा पकड़ा दूंगा और ले कर भाग जाना। तब सेऊ ने कहा नहीं पिता जी, मैं अन्दर जाऊँगा। यदि मैं पकड़ा भी गया तो बच्चा समझ कर माफ कर दिया जाऊँगा। सम्मन ने कहा पुत्रा यदि आपको पकड़ कर मार दिया तो मैं और तेरी माँ कैसे जीवित रहेंगे? सेऊ प्रार्थना करता हुआ छिद्र द्वार से अन्दर दुकान में प्रवेश कर जाता है। तब सम्मन ने कहा पुत्रा केवल तीन सेर आटा लाना, अधिक नहीं। लड़का सेऊ लगभग तीन सेर आटा अपनी फटी पुरानी चद्दर में बाँध कर चलने लगा तो अंधेरे में तराजू के पलड़े पर पैर रखा गया। जोर दार आवाज हुई जिससे दुकानदार जाग गया और सेऊ को चोर-चोर करके पकड़ लिया और रस्से से बाँध दिया। इससे पहले सेऊ ने वह चद्दर में बँधा हुआ आटा उस छिद्र से बाहर फैंक दिया और कहा पिता जी मुझे सेठ ने पकड़ लिया है।

आप आटा ले जाओ और सतगुरु व भक्तों को भोजन करवाना। मेरी चिंता मत करना। आटा ले कर सम्मन घर पर गया तो सेऊ को न पा कर नेकी ने पूछा लड़का कहाँ है? सम्मन ने कहा उसे सेठ जी ने पकड़ कर थम्ब से बाँध दिया। तब नेकी ने कहा कि आप वापिस जाओ और लड़के सेऊ का सिर काट लाओ। क्योंकि लड़के को पहचान कर
अपने घर पर लाएंगे। फिर सतगुरु को देख कर नगर वाले कहेंगे कि ये हैं जो चोरी करवाते हैं। हो सकता है सतगुरु देव को परेशान करें। हम पापी प्राणी अपने दाता को भोजन के स्थान पर कैद न दिखा दें। यह कह कर माँ अपने बेटे का सिर काटने के लिए अपने पति से कह रही है वह भी गुरुदेव जी के लिए। सम्मन ने हाथ में कर्द (लम्बा छुरा) लिया तथा दुकान पर जा कर कहा सेऊ बेटा, एक बार गर्दन बाहर निकाल। कुछ जरूरी बातें करनी हैं। कल तो हम नहीं मिल पाएंगे। हो सकता है ये आपको मरवा दें। तब सेऊ उस सेठ (बनिए) से कहता है कि सेठ जी बाहर मेरा बाप खड़ा है।

कोई जरूरी बात करना चाहता है। कृप्या करके मेरे रस्से को इतना ढीला कर दो कि मेरी गर्दन छिद्र से बाहर निकल जाए। तब सेठ ने उसकी बात को स्वीकार करके रस्सा इतना ढीला कर दिया कि गर्दन आसानी से बाहर निकल गई। तब सेऊ ने कहा पिता जी मेरी गर्दन काट दो। यदि आप मेरी गर्दन नहीं काटोगे तो आप मेरे पिता नहीं हो। सम्मन ने एक दम कर्द मारी और सिर काट कर घर ले गया। सेठ ने लड़के का कत्ल हुआ देख कर उसके शव को घसीट कर साथ ही एक पजावा (ईटें पकाने का भट्ठा) था उस खण्डहर में डाल गया।
जब नेकी ने सम्मन से कहा कि आप वापिस जाओ और लड़के का धड़ भी बाहर मिलेगा उठा लाओ। जब सम्मन दुकान पर पहुँचा उस समय तक सेठ ने उस दुकान की दीवार के छिद्र को बंद कर लिया था। सम्मन ने शव कीे घसीट (चिन्हों) को देखते हुए शव के पास पहुँच कर उसे उठा लाया। ला कर अन्दर कोठे में रख कर ऊपर पुराने कपड़े (गुदड़) डाल दिए और सिर को अलमारी के ताख (एक हिस्से) में रख कर खिड़की बंद कर दी।
कुछ समय के बाद सूर्य उदय हुआ। नेकी ने स्नान किया। फिर सतगुरु व भक्तों का खाना बनाया। फिर सतगुरु कबीर साहेब जी से भोजन करने की प्रार्थना की। नेकी ने साहेब कबीर व दोनों भक्त (कमाल तथा शेख फरीद), तीनों के सामने आदर के साथ भोजन परोस दिया। साहेब कबीर ने कहा इसे छः दौनों में डाल कर आप तीनों भी साथ बैठो। यह प्रेम प्रसाद पाओ। बहुत
प्रार्थना करने पर भी साहेब कबीर नहीं माने तो छः दौनों में प्रसाद परोसा गया। पाँचों प्रसाद के लिए बैठ गए। तब साहेब कबीर ने कहा --
आओ सेऊ जीम लो, यह प्रसाद पे्रम। शीश कटत हैं चोरों के, साधों के नित्य क्षेम।।
साहेब कबीर ने कहा कि सेऊ आओ भोजन पाओ। सिर तो चोरों के कटते हैं। संतों (भक्तों) के नहीं। उनको तो क्षमा होती है। साहेब कबीर ने इतना कहा था उसी समय सेऊ के धड़ पर सिर लग गया। कटे हुए का कोई निशान भी गर्दन पर नहीं था तथा पंगत (पंक्ति) में बैठ कर भोजन करने लगा। बोलो कबीर साहेब (कविरमितौजा) की जय।
सम्मन तथा नेकी ने देखा कि गर्दन पर कोई चिन्ह भी नहीं है। लड़का जीवित कैसे हुआ? अन्दर जा कर देखा तो वहाँ शव तथा शीश नहीं था। केवल रक्त के छीटें लगे थे जो इस पापी मन के संश्य को समाप्त करने के लिए प्रमाण बकाया था।

साहेब कबीर द्वारा भैंसे से वेद मन्त्र बुलवाना

एक समय तोताद्रि नामक स्थान पर विद्वानों (पंडितों) का महासम्मेलन हुआ। उसमें दूर-दूर के ब्रह्मवेता, वेदों, गीता जी आदि के विशेष ज्ञाता महापुरुष आए हुए थे। उसी महासम्मेलन में वेदों और पुराणों तथा शास्त्रों व गीता जी के प्राकाण्ड ज्ञाता महर्षि स्वामी रामानन्द जी भीआमन्त्रिात किए गए थे। स्वामी रामानन्द जी के साथ उनके परम शिष्य साहेब कबीर भी पहुँच गए। श्री रामानन्द जी साहेब कबीर को अपने साथ ही रखतेथे। क्योंकि स्वामी रामानन्द जी जानते थे कि यह कबीर (कविर्देव) साहेब परम पुरुष हैं। इनके रहते मुझे कोई ज्ञान और सिद्धि में पराजितनहीं कर सकता।

साहेब कबीर द्वारा भैंसे से वेद मन्त्र बुलवाना
सम्मेलन में इस बात की विशेष चर्चा हो गई कि श्री रामानन्द जी के शिष्य कबीर साहेब (छोटी जाति के)
जुलाहा हैं। यदि हमारे भण्डारे में भोजन करेंगे तो हम अपवित्र हो जाएंगे। हमारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। यदि सीधे शब्दों में मना करेंगे तो हो सकता है श्री रामानन्द जी नाराज हो जाऐं क्योंकि श्री रामानन्द जी उस समय के जाने-माने विद्वानों में से एक थे। यहसोच कर एक युक्ति निकाली कि भण्डारा दो स्थानों पर शुरु किया जाए। एक तो पंडितों के लिए, जो पंडितों (ब्राह्मणों) वाले भण्डारे में प्रवेश करे उसे चारों वेदों के एक-2 मंत्र संस्कृत में सुनाने पड़ेंगे।
ऐसा न करने वालों को दूसरे भण्डारे में जो आम संगत (साधारण व्यक्तियों) के लिए बना है में जाएंगे। क्योंकि उनका मानना था कि श्री रामानन्द जी तो विद्वान (पंडित) हैं। वेद मंत्र सुना कर उत्तम भण्डारे में आ जाएंगे तथा साहेब कबीर (कविर्देव) ऐसा नहीं कर पाएगें क्योंकि उन्हें वे पंडितजन अशिक्षित मानते थे। अपने आप आम (साधारण) भण्डारे में चले जाएंगे। फिर सतसंग (प्रवचन)चल रहा था।
उसमें वही उपस्थित पंडित जन संगत में मीठी-2 बातें बना कर कथाएँ सुनारहे थे कि - एक अछूत जाति की भीलनी (शबरी) परमात्मा के वियोग में वर्षों से तड़फ-2 कर राहजोह रही थी कि मेरे भगवान राम आएंगे। मैं उन्हें बेरों का भोग लगवाऊँगी। प्रतिदिन बहुत दूर तक रास्ता बुहार कर आती है। कहीं मेरे भगवानको कांटा न लग जाए। एक दिन वह समय भी आ गया कि भगवान श्रीरामचन्द्र जी आते दिखाई दिए। भिलनी सुध-बुद्ध भूल कर श्री रामचन्द्र जी के मुख कमलकी ओर बावलों की तरह निहार रही है। श्री राम व लक्ष्मण खड़े-2 देख रहे हैं। इस पर लक्ष्मण ने कहाशबरी भगवान को बैठने के लिए भी कहेगी या ऐसे ही ठडेसरी (खड़े तपस्वी)बनाए रखेगी। तब मानो नींद से जागी हो।
हड़बड़ा कर अपने सिर का फटा पुराना मैला- कुचैला चीर उतार कर एक पत्थर के टुकड़ेपर बिछा दिया और कहा कि
भगवन! बैठो इस पर। श्री रामचन्द्र जी ने कहा कि नहीं बेटी, चीर उठाओ यह कह कर उसका चीर उठा कर उसी के सिर पर रखना चाहा। भिलनी (शबरी) रोने लगी और रोती हुई ने कहा यह गन्दा (मैला) है न भगवान! इसलिए स्वीकार नहीं किया न। मैं कितनी अभागिन हूँ। आपके लिए उत्तम कपड़ा नहीं ला सकी। क्षमा करना भगवन। यह कह कर आँखों से अश्रुधार बह चली।

तब श्री रामचन्द्र जी ने कहा कि शबरी! यह कपड़ा मेरे लिए मखमल से भी अच्छा कपड़ा है। लाओ बिछाओ!
फिर भगवान उसी मैले कुचैले चीर पर विराजमान हो गए और शबरी के आँसुओं को अपने पिताम्बर से पौंछने लगे।
फिर शबरी ने बेरों का भोग भगवान को लगवाया। पहले बेर को स्वयं थोड़ा सा खाती (चखती) है फिर वही बेर श्री राम को अपने हाथों से खिला रही है। भगवान श्री राम ने उस काली कलूटी, लम्बे-2 दाँतों वाली मैली कुचैली, अछूत शबरीके हाथ के झूठे बेरों का भोग रूचि-2 लगाया तथा कहा शबरी, बहुत स्वादिष्ट हैं। क्या मिलाया है इन बेरो में? शबरी ने कहा आपका प्यार मिलाया है आपकी बेटी ने। फिर लक्ष्मण को भी दिए कि खाओ बेर। लक्ष्मण ग्लानि करके श्री राम जी के भय से खाने का बहाना करके हाथ मेंलेकर पीछे फैंक देता है। जो बाद में द्रौणागिरी पर (शबरी के झूठे बेर)संजीवनी बूटी बन गए और लक्ष्मण के युद्ध में मूर्छित हो जाने पर वही बेर फिर खाने पड़े। भक्तकी भावना का अनादर हानिकारक होता है।
जब आस-पासके ऋषियों को मालूम हुआ कि श्री राम आए हैं।

वो हमारे यहाँ आश्रमों में अवश्य आएंगे क्योंकि हम ब्राह्मण हैं और भगवान श्री राम (शत्रिय हैं) अवश्य आएंगे। जब ऐसा नहीं हुआ तो सर्व ऋषि जन बन में साधना करने वाले (कर्मसन्यासी) श्री राम को मिले तथा कहा भगवन! एक ही नदी है जो साथ बह रही है। उसका पानी गंदा हो गया है।कृपया इसे स्चच्छ करने की कृपा करें। श्री राम ने कहा कि आप सर्व योगी जन बारी-2 अपना दायां पैर नदी के जल में डुबोएँ। फिर निकाल लें। सब उपस्थित ऋषियों ने ऐसा ही किया। परंतु जलनिर्मल नहीं हुआ। फिर श्री राम ने उस प्रेमभक्ति युक्त शबरी से कहा आप भी ऐसा ही करें। तब शबरी ने अपने दायां पैर नदी के जल में डाला तो उसी समय नदी का जल निर्मल हो गया। सर्व उपस्थित साधुजन शबरी की प्रशंसा करने लगे तथा शर्मिन्दा होकर श्री राम से पूछा कि प्रभु! क्या कारण है जो इस अछूत के स्पर्श मात्रा से जल निर्मल हुआ जबकि हमारे से नहीं।
तब श्री राम ने कहा - जो व्यक्ति परमात्मा का सच्चे प्रेम से भजन करता है तथा विकारों से रहित है वह उच्च प्राणी है। जाति ऊँची नीची नहीं होती है। आपको भक्ति साधना के साथ-2 जाति अहंकार भी है जो भक्ति का दुश्मन है। गीता जी भी यह सिद्ध करती है कि कर्मसन्यासी (गृहत्यागी) को अपनेकत्र्तापन का अभिमान हुए बिना नहीं रहता। इसलिए कर्मयोगी (ब्रह्मचारी या गृहस्थी कार्य करते.2 साधना करने वाला) भक्त कर्म सन्यासी (गृहत्यागी) भक्तों से श्रेष्ठ हैं तथा जो पूर्ण परमात्मा की भक्ति करते हैं वो सर्वोंत्तम हैं।
कबीर साहेब कहते हैं कि --
"कबीर, पोथी पढ-2 जग मुआ, पंडित भया न कोय।अढ़ाई अक्षर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय।।"
प्रेम में जाति कुल का कोई अभिमान नहीं रहता है। केवल अपने महबूब का ही ध्यान बना रहता है। (सतसंग समाप्त हुआ)
सत्संग समाप्न के पश्चात् भण्डारे का समय हुआ। दो ब्राह्मण वेदों के मन्त्र सुनने के लिए परीक्षार्थ पंडितों वाले भण्डार के द्वार पर खड़े हो गए तथा परीक्षा लेकर वेद मन्त्र सुन कर भण्डारे में प्रवेश करवा रहे थे। साहेब कबीर (कविरग्नि) भी पंक्ति में खड़े अपनी वारी का इन्तजार कर रहे थे। जब साहेब कबीर की बारी आई उसी समय एक पास में घास चर रहे भैंसे को साहेब कबीर ने पुकारा -
ऐ भैंसा! कृप्या इधर आना।
इतना कहना था कि भैंसा दौड़ा-2 आया तथा साहेब कबीर के चरणों में शीश झुका कर अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा। तब कविर्देव ने उस भैंसे कीकमर परहाथ रखकर कहा कि - हे भैंसा! चारों वेदों का एक-2 श्लोक सुनाओ! उसी समय भैंसे ने शुद्ध संस्कृत भाषा में चारों वेदां के एक-2 मन्त्र कह सुनाए।
साहेब कबीर ने कहा - भैंसा इन श्लोकों का हिन्दी अनुवाद भी करो, कहीं पंडित जन यह न सोच बैठें कि भैंसा हिन्दी नहीं जानता। भैंसे ने साहेब कबीर की शक्ति से चारों वेदों के एक-2 मन्त्र का हिन्दी अनुवाद भी कर दिया।
कबीर साहेब ने कहा - जाओ भैंसा पंडित! इन उत्तम जनों के भण्डारे में भोजन पाओ। मैं तो उस साधारण भण्डारे में प्रसाद पाऊँगा।
कबीर साहेब जी की यह लीला देखकर सैकड़ों कथित पंडितों ने नाम लिया तथा आत्म कल्याण करवाया और अपनी भूल का पश्चाताप किया। साहेब कबीर ने कहा नादानों कथा सुना रहे थे शबरी और श्री राम की, आप समझे नहीं। अपने आप को उच्च समझ कर भक्त आत्माओं का अनादर करते हो। यह आप भक्तों का अनादर नहीं बल्कि भगवान का अनादर करते हो। जो गीता जी में कहते हैं कि अर्जुन कोई व्यक्ति कितना ही दुराचारी हो यदि वह भगवत विश्वासी है, साधु समान मान्य है।
गरीबदास जी महाराज कहते हैं -
कुष्टि होवे साध बन्दगी कीजिए।
वैश्या के विश्वास चरण चित्त दीजिए।।
ऐसे अनजानों को जो कहते कुछ और करते कुछ हैं।
कबीर साहेब कहते हैं-
"कबीर, कहते हैं करते नहीं, मुख के बड़े लबार।
दोजख धक्के खाएगें, धर्मराय दरबार।।"
"कबीर, करनी तज कथनी कथें, अज्ञानी दिन रात।
कुकर ज्यों भौंकत फिरै, सुनी सुनाई बात।।"
"गरीब, कहन सुनन की करते बातां ।
कोई न देख्या अमृत खाता।।"
"कबीर सत्यनाम सुमरण बिन, मिटे न मन का दाग।
विकार मरे मत जानियो, ज्यों भूभल में आग।


परमेश्वर कबीर (कविर्देव) द्वारा महर्षि सर्वानन्द को शरण में लेना

एक सर्वानन्द नाम के महर्षि थे। उसकी पूज्य माता श्रीमति शारदा देवी पाप कर्म फल से पीडि़त थी। उसने सर्व पुजाऐं व जन्त्र-मन्त्र कष्ट निवारण के लिए वर्षों किए। शारीरिक पीड़ा निवारण के लिए वैद्यों की दवाईयाँ भी खाई, परन्तु कोई राहत नहीं मिली। उस समय के महर्षियों से उपदेश भी प्राप्त किया, परन्तु सर्व महर्षियों ने कहा कि बेटी शारदा यह आप का पाप कर्म दण्ड प्रारब्ध कर्म का है, यह क्षमा नहीं हो सकता, यह भोगना ही पड़ता है। भगवान श्री राम ने बाली का वध किया था, उस पाप कर्म का दण्ड श्री राम (विष्णु) वाली आत्मा ने श्री कृष्ण बन कर भोगा। श्री बाली वाली आत्मा शिकारी बनी। जिसने श्री कृष्ण जी के पैर में विषाक्त तीर मार कर वध किया।

परमेश्वर कबीर (कविर्देव) द्वारा महर्षि सर्वानन्द को शरण में लेना

इस प्रकार गुरु जी व महन्तांे व संतों - ऋषियों के विचार सुनकर दुःखी मन से भक्तमति शारदा अपना प्रारब्ध पापकर्म का कष्ट रो-रो कर भोग रही थी। एक दिन किसी निजी रिश्तेदार के कहने पर काशी में (स्वयंभू) स्वयं सशरीर प्रकट हुए (कविर्देव) कविर परमेश्वर अर्थात् कबीर प्रभु से उपदेश प्राप्त किया तथा उसी दिन कष्ट मुक्त हो गई। क्योंकि पवित्र यजुर्वेद अध्याय 5 मंत्र 32 में लिखा है कि ‘‘कविरंघारिरसि‘‘ अर्थात् (कविर्) कबीर (अंघारि) पाप का शत्राु (असि) है। फिर इसी पवित्रा यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 में लिखा है कि परमात्मा (एनसः एनसः) अधर्म के अधर्म अर्थात् पापों के भी पाप घोर पाप को भी समाप्त कर देता है। प्रभु कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ने कहा बेटी शारदा यह सुख आप के भाग्य में नहीं था, मैंने अपने कोष से प्रदान किया है तथा पाप विनाशक होने का प्रमाण दिया है।

आप का पुत्रा महर्षि सर्वानन्द जी कहा करता है कि प्रभु पाप क्षमा (विनाश)नहीं कर सकता तथा आप मेरे से उपदेश प्राप्त करके आत्म कल्याण करो। भक्तमति शारदा जी ने स्वयं आए परमेश्वर कबीर प्रभु (कविर्देव)से उपदेश लेकर अपना कल्याण करवाया। महर्षि सर्वानन्द जी को जो भक्तमति शारदा का पुत्रा था, शास्त्रार्थ का बहुत चाव था। उसने अपने समकालीन सर्व विद्वानों को शास्त्रार्थ करके पराजित कर दिया। फिर सोचा कि जन - जन को कहना पड़ता है कि मैंने सर्व विद्वानों पर विजय प्राप्त कर ली है। क्यों न अपनी माता जी से अपना नाम सर्वाजीत रखवा लूं। यह सोच कर अपनी माता श्रीमति शारदा जी के पास जाकर प्रार्थना की। कहा कि माता जी मेरा नाम बदल कर सर्वाजीत रख दो। माता ने कहा कि बेटा सर्वानन्द क्या बुरा नाम है ? महर्षि सर्वानन्द जी ने कहा माता जी मैंने सर्व विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया है। इसलिए मेरा नाम सर्वाजीत रख दो।

माता जी ने कहा कि बेटा एक विद्वान मेरे गुरु महाराज कविर्देव (कबीर प्रभु)को भी पराजित कर दे, फिर अपने पुत्र का नाम आते ही सर्वाजीत रख दूंगी। माता के ये वचन सुन कर श्री सर्वानन्द पहले तो हँसा, फिर कहा माता जी आप भी भोली हो। वह जुलाहा (धाणक)कबीर तो अशिक्षित है। उसको क्या पराजित करना? अभी गया, अभी आया।
महर्षि सर्वानन्द जी सर्व शास्त्रों को एक बैल पर रख कर कविर्देव (कबीर परमेश्वर)की झौंपड़ी के सामने गया। परमेश्वर कबीर जी की धर्म की बेटी कमाली पहले कूएँ पर मिली, फिर द्वार पर आकर कहा आओ महर्षि जी यही है परमपिता कबीर का घर। श्री सर्वानन्द जी ने लड़की कमाली से अपना लोटा पानी से इतना भरवाया कि यदि जरा-सा जल और डाले तो बाहर निकल जाए तथा कहा कि बेटी यह लोटा धीरे-धीरे ले जाकर कबीर को दे तथा जो उत्तर वह देवें वह मुझे बताना।

लड़की कमाली द्वारा लाए लोटे में परमेश्वर कबीर (कविर्देव)जी ने एक कपड़े सीने वाली बड़ी सुई डाल दी, कुछ जल लोटे से बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिर गया तथा कहा पुत्राी यह लोटा श्री सर्वानन्द जी को लौटा दो। लोटा वापिस लेकर आई लड़की कमाली से सर्वानन्द जी ने पूछा कि क्या उत्तर दिया कबीर ने? कमाली ने प्रभु द्वारा सुई डालने का वृतांत सुनाया। तब महर्षि सर्वानन्द जी ने परम पूज्य कबीर परमेश्वर (कविर्देव)से पूछा कि आपने मेरे प्रश्न का क्या उत्तर दिया? प्रभु कबीर जी ने पूछा कि क्या प्रश्न था आपका?
श्री सर्वानन्द महर्षि जी ने कहा ‘‘मैंने सर्व विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया है। मैंने अपनी माता जी से प्रार्थना की थी कि मेरा नाम सर्वाजीत रख दो। मेरी माता जी ने आपको पराजीत करने के पश्चात् मेरा नाम परिवर्तन करने को कहा है। आपके पास लोटे को पूर्ण रूपेण जल से भर कर भेजने का तात्पर्य है कि मैं ज्ञान से ऐसे परिपूर्ण हूँ जैसे लोटा जल से। इसमें और जल नहीं समाएगा, वह बाहर ही गिरेगा अर्थात् मेरे साथ ज्ञान चर्चा करने से कोई लाभ नहीं होगा। आपका ज्ञान मेरे अन्दर नहीं समाएगा, व्यर्थ ही थूक मथोगे। इसलिए हार लिख दो, इसी में आपका हित है।
पूज्य कबीर परमेश्वर (कविर्देव) ने कहा कि आपके जल से परिपूर्ण लोटे में लोहे की सूई डालने का अभिप्राय है कि मेरा ज्ञान (तत्वज्ञान) इतना भारी (सत्य) है कि जैसे सुई लोटे के जल को बाहर निकालती हुई नीचे जाकर रूकी है। इसी प्रकार मेरा तत्वज्ञान आपके असत्य ज्ञान (लोक वेद) को निकाल कर आपके हृदय में समा जाएगा।
महर्षि सर्वानन्द जी ने कहा प्रश्न करो। एक बहु चर्चित विद्वान को जुलाहों (धाणकों) के मौहल्ले (काॅलोनी) में आया देखकर आस-पास के भोले-भाले अशिक्षित जुलाहे शास्त्रार्थ सुनने के लिए एकत्रित हो गए।
पूज्य कविर्देव ने प्रश्न किया:

कौन ब्रह्मा का पिता है, कौन विष्णु की माँ।
शंकर का दादा कौन है, सर्वानन्द दे बताए।।
उत्तर महर्षि सर्वानन्द जी का: - श्री ब्रह्मा जी रजोगुण हैं तथा श्री विष्णु जी सतगुण युक्त हैं तथा श्री शिव जी तमोगुण युक्त हैं। यह तीनों अजर-अमर अर्थात् अविनाशी हैं, सर्वेश्वर - महेश्वर - मृत्यु×जय हैं। इनके माता-पिता कोई नहीं। आप अज्ञानी हो। आपने शास्त्रों का ज्ञान नहीं है। ऐसे ही उट-पटांग प्रश्न किया है। सर्व उपस्थित श्रोताओं ने ताली बजाई तथा महर्षि सर्वानन्द जी का समर्थन किया।
पूज्य कबीर प्रभु (कविर्देव) जी ने कहा कि महर्षि जी आप श्रीमद्देवी भागवत पुराण के तीसरे स्कंद तथा श्री शिव पुराण का छटा तथा सातवां रूद्र संहिता अध्याय प्रभु को साक्षी रखकर गीता जी पर हाथ रख कर पढ़ें तथा अनुवाद सुनाऐं। महर्षि सर्वानन्द जी ने पवित्रा गीता जी पर हाथ रख कर शपथ ली कि सही-सही सुनाऊँगा।
पवित्र पुराणों को प्रभु कबीर (कविर्देव) जी के कहने के पश्चात् ध्यान पूर्वक पढ़ा। श्री शिव पुराण (गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित, जिसके अनुवादक हैं श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार) में पृष्ठ नं. 100 से 103 पर लिखा है कि सदाशिव अर्थात् काल रूपी ब्रह्म तथा प्रकृति (दुर्गा) के संयोग (पति-पत्नी व्यवहार) से सतगुण श्री विष्णु जी, रजगुण श्री ब्रह्मा जी तथा तमगुण श्री शिवजी का जन्म हुआ। यही प्रकृति (दुर्गा) जो अष्टंगी कहलाती है, त्रिदेव जननी (तीनों ब्रह्मा, विष्णु, शिव जी) की माता कहलाती है।
पवित्र श्री मद्देवी पुराण (गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित, अनुवादक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार तथा चिमन लाल गोस्वामी) तीसरे स्कंध में पृष्ठ नं. 114 से 123 तक में स्पष्ट वर्णन है कि भगवान विष्णु जी कह रहे हैं कि यह प्रकृति (दुर्गा) हम तीनों की जननी है। मैंने इसे उस समय देखा था जब मैं छोटा-सा बच्चा था। माता की स्तुति करते हुए श्री विष्णु जी ने कहा कि हे माता मैं (विष्णु), ब्रह्मा तथा शिव तो नाशवान हैं। हमारा तो आविर्भाव (जन्म) तथा तिरोभाव (मृत्यु) होती है।
आप प्रकृति देवी हो। भगवान शंकर ने कहा कि हे माता यदि ब्रह्मा व विष्णु आप से उत्पन्न हुए हैं तो मैं शंकर भी आप से ही उत्पन्न हुआ हूँ अर्थात् आप मेरी भी माता हो।
महर्षि सर्वानन्द जी पहले सुने सुनाए अधूरे शास्त्र विरुद्ध ज्ञान (लोकवेद) के आधार पर तीनों (ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव)को अविनाशी व अजन्मा कहा करता था। पुराणों को पढ़ता भी था फिर भी अज्ञानी ही था। क्योंकि ब्रह्म (काल)पवित्र गीता जी में कहता है कि मैं सर्व प्राणियों (जो मेरे इक्कीस ब्रह्मण्डों में मेरे अधीन हैं)की बुद्धि हूँ। जब चाहूँ ज्ञान प्रदान कर दूं तथा जब चाहूँ अज्ञान भर दूं। उस समय पूर्ण परमात्मा के कहने के बाद काल (ब्रह्म) का दबाव हट गया तथा सर्वानन्द जी को स्पष्ट ज्ञान हुआ। वास्तव में ऐसा ही लिखा है। परन्तु मान हानि के भय से कहा मैंने सर्व पढ़ लिया ऐसा कहीं नहीं लिखा है। कविर्देव (कबीर परमेश्वर)से कहा तू झूठा है। तू क्या जाने शास्त्रों के विषय में। हम प्रतिदिन पढ़ते हैं। फिर क्या था, सर्वानन्द जी ने धारा प्रवाहिक संस्कृत बोलना प्रारम्भ कर दिया। बीस मिनट तक कण्ठस्थ की हुई कोई और ही वेदवाणी बोलता रहा, पुराण नहीं सुनाया।
सर्व उपस्थित भोले-भाले श्रोतागण जो उस संस्कृत को समझ भी नहीं रहे थे, प्रभावित होकर सर्वानन्द महर्षि जी के समर्थन में वाह-वाह महाज्ञानी कहने लगे। भावार्थ है कि परमेश्वर कबीर (कविर्देव)जी को पराजीत कर दिया तथा महर्षि सर्वानन्द जी को विजयी घोषित कर दिया। परम पूज्य कबीर परमेश्वर (कविर्देव)जी ने कहा कि सर्वानन्द जी आपने पवित्रा गीता जी की कसम खाई थी, वह भी भूल गए। जब आप सामने लिखी शास्त्रों की सच्चाई को भी नहीं मानते हो तो मैं हारा तुम जीते।
एक जमींदार का पुत्र सातवीं कक्षा में पढ़ता था। उसने कुछ अंग्रेजी भाषा को जान लिया था। एक दिन दोनों पिता पुत्रा खेतों में बैल गाड़ी लेकर जा रहे थे। सामने से एक अंगे्रज आ गया। उसने बैलगाड़ी वालों से अंग्रेजी भाषा में रास्त्ता जानना चाहा। पिता ने पुत्र से कहा बेटा यह अंग्रेज अपने आप को ज्यादा ही शिक्षित सिद्ध करना चाहता है। आप भी तो अंग्रेजी भाषा जानते हो। निकाल दे इसकी मरोड़। सुना दे अंग्रेजी बोल कर। किसान के लड़के ने अंग्रेजी भाषा में बीमारी की छुट्टी के लिए प्रार्थना-पत्रा पूरी सुना दी।

अंग्रेज उस नादान बच्चे की नादानी पर कि पूछ रहा हूँ रास्त्ता सुना रहा है बीमारी की छुट्टी की प्रार्थना - पत्र। अपनी कार लेकर माथे में हाथ मार कर चल पड़ा। किसान ने अपने विजेता पुत्र की कमर थप-थपाई तथा कहा वाह पुत्रा मेरा तो जीवन सफल कर दिया। आज तुने अंग्रेज को अंग्रेजी भाषा में पराजीत कर दिया। तब पुत्रा ने कहा पिता जी माई बैस्ट फ्रेंड (मेरा खास दोस्त नामक प्रस्त्ताव)भी याद है। वह सुना देता तो अंग्रेज कार छोड़ कर भाग जाता। इसी प्रकार कविर्देव जी पूछ कुछ रहें हैं और सर्वानन्द जी उत्तर कुछ दे रहे हैं। यह शास्त्रार्थ ने घर घाल रखे हैं।
परम पूज्य कबीर परमेश्वर (कविर्देव) ने कहा कि सर्वानन्द जी आप जीते मैं हारा। महर्षि सर्वानन्द जी ने कहा लिख कर दे दो, मैं कच्चा कार्य नहीं करता। परमात्मा कबीर (कविर्देव)जी ने कहा कि यह कृपा भी आप कर दो। लिख लो जो लिखना है, मैं अंगूठा लगा दूंगा। महर्षि सर्वानन्द जी ने लिख लिया कि शास्त्रार्थ में सर्वानन्द विजयी हुआ तथा कबीर साहेब पराजीत हुआ तथा कबीर परमेश्वर से अंगूठा लगवा लिया। अपनी माता जी के पास जाकर सर्वानन्द जी ने कहा कि माता जी लो आपके गुरुदेव को पराजीत करने का प्रमाण। भक्तमति शारदा जी ने कहा पुत्र पढ़ कर सुनाओ। जब सर्वानन्द जी ने पढ़ा उसमें लिखा था कि शास्त्रार्थ में सर्वानन्द पराजीत हुआ तथा कबीर परमेश्वर (कविर्देव)विजयी हुआ। सर्वानन्द जी की माता जी ने कहा पुत्रा आप तो कह रहे थे कि मैं विजयी हुआ हूँ, तुम तो हार कर आये हो। महर्षि सर्वानन्द जी ने कहा माता जी मैं कई दिनों से लगातार शास्त्रार्थ में व्यस्त था, इसलिए निंद्रा वश होकर मुझ से लिखने में गलती लगी है।

फिर जाता हूँ तथा सही लिख कर लाऊँगा। माता जी ने शर्त रखी थी कि विजयी होने का कोई लिखित प्रमाण देगा तो मैं मानुँगी, मौखिक नहीं। महर्षि सर्वानन्द जी दोबारा गए तथा कहा कि कबीर साहेब मेरे लिखने में कुछ त्राुटि रह गई है, दोबारा लिखना पड़ेगा। साहेब कबीर जी ने कहा कि फिर लिख लो। सर्वानन्द जी ने फिर लिख कर अंगूठा लगवा कर माता जी के पास आया तो फिर विपरीत ही पाया। कहा माता जी फिर जाता हूँ। तीसरी बार लिखकर लाया तथा मकान में प्रवेश करने से पहले पढ़ा ठीक लिखा था। सर्वानन्द जी ने उस लेख से दृष्टि नहीं हटाई तथा चलकर अपने मकान में प्रवेश करता हुआ कहने लगा कि माता जी सुनाऊँ, यह कह कर पढ़ने लगा तो उसकी आँखों के सामने अक्षर बदल गए। तीसरी बार फिर यही प्रमाण लिखा गया कि शास्त्रार्थ में सर्वानन्द पराजीत हुए तथा कबीर साहेब विजयी हुए। सर्वानन्द बोल नहीं पाया। तब माता जी ने कहा पुत्रा बोलता क्यों नहीं? पढ़कर सुना क्या लिखा है। माता जानती थी कि नादान पुत्रा पहाड़ से टकराने जा रहा है।

माता जी ने सर्वानन्द जी से कहा कि पुत्र परमेश्वर आए हैं, जाकर चरणों में गिर कर अपनी गलती की क्षमा याचना कर ले तथा उपदेश ले कर अपना जीवन सफल कर ले। सर्वानन्द जी अपनी माता जी के चरणों में गिर कर रोने लगा तथा कहा माता जी यह तो स्वयं प्रभु आए हैं। आप मेरे साथ चलो, मुझे शर्म लगती है। सर्वानन्द जी की माता अपने पुत्रा को साथ लेकर प्रभु कबीर के पास गई तथा सर्वानन्द जी को भी कबीर परमेश्वर से उपदेश दिलाया। तब उस महर्षि कहलाने वाले नादान प्राणी का पूर्ण परमात्मा के चरणों में आने से ही उद्धार हुआ। पूर्ण ब्रह्म कबीर परमेश्वर (कविर्देव)ने कहा सर्वानन्द आपने अक्षर ज्ञान के आधार पर भी शास्त्रों को नहीं समझा। क्योंकि मेरी शरण में आए बिना ब्रह्म (काल)किसी की बुद्धि को पूर्ण विकसित नहीं होने देता। अब फिर पढ़ो इन्हीं पवित्रा वेदों व पवित्रा गीता जी तथा पवित्रा पुराणों को। अब आप ब्राह्मण हो गए हो। ‘‘ब्राह्मण सोई ब्रह्म पहचाने‘‘ विद्वान वही है जो पूर्ण परमात्मा को पहचान ले। फिर अपना कल्याण करवाए।
विशेष:- आज से 550 वर्ष पूर्व यही पवित्रा वेदों, पवित्रा गीता जी व पवित्र पुराणों में लिखा ज्ञान कबीर परमेश्वर (कविर्देव) जी ने अपनी साधारण वाणी में भी दिया था। जो उस समय से तथा आज तक के महर्षियों ने व्याकरण त्राुटि युक्त भाषा कह कर पढ़ना भी आवश्यक नहीं समझा तथा कहा कि कबीर तो अज्ञानी है, इसे अक्षर ज्ञान तो है ही नहीं। यह क्या जाने संस्कृत भाषा में लिखे शास्त्रों में छूपे गूढ़ रहस्य को। हम विद्वान हैं जो हम कहते हैं वह सब शास्त्रों में लिखा है तथा श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी व श्री शिव जी के कोई माता-पिता नहीं हैं। ये तो अजन्मा-अजर-अमर-अविनाशी तथा सर्वेश्वर, महेश्वर, मृत्यु×जय हैं। सर्व स ृष्टी रचन हार हैं, तीनों गुण युक्त हैं।

आदि आदि व्याख्या ठोक कर अभी तक कहते रहे। आज वे ही पवित्रा शास्त्रा अपने पास हैं। जिनमें तीनों प्रभुओं (श्री ब्रह्मा जी रजगुण, श्री विष्णु जी सतगुण, श्री शिव जी तमगुण) के माता-पिता का स्पष्ट विवरण है। उस समय अपने पूर्वज अशिक्षित थे तथा शिक्षित वर्ग को शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान नहीं था। फिर भी कबीर परमेश्वर (कविर्देव) के द्वारा बताए सत्यज्ञान को जान बूझ कर झुठला दिया कि कबीर झूठ कह रहा है किसी शास्त्रा में नहीं लिखा है कि श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी व श्री शिव जी के कोई माता-पिता हैं। जब कि पवित्र पुराण साक्षी हैं कि श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी का जन्म-मृत्यु होता है। ये अविनाशी नहीं हैं तथा इन तीनों देवताओं की माता प्रकृति (दुर्गा) है तथा पिता ज्योति निरंजन काल रूपी ब्रह्म है।

आज सर्व मानव समाज बहन-भाई, बालक व जवान तथा बुजुर्ग, बेटे तथा बेटी शिक्षित हैं। आज कोई यह नहीं बहका सकता कि शास्त्रों में ऐसा नहीं लिखा जैसा कबीर परमेश्वर (कविर्देव) साहेब जी की अमृत वाणी में लिखा है।

अमृतवाणी पूज्य कबीर परमेश्वर (कविर्देव) की:-

धर्मदास यह जग बौराना। कोइ न जाने पद निरवाना।।
अब मैं तुमसे कहों चिताई। त्रियदेवन की उत्पति भाई।।
ज्ञानी सुने सो हिरदै लगाई। मूर्ख सुने सो गम्य ना पाई।।
माँ अष्टंगी पिता निरंजन। वे जम दारुण वंशन अंजन।।
पहिले कीन्ह निरंजन राई। पीछेसे माया उपजाई।।
धर्मराय किन्हाँ भोग विलासा। मायाको रही तब आसा।।
तीन पुत्र अष्टंगी जाये। ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये।।
तीन देव विस्त्तार चलाये। इनमें यह जग धोखा खाये।।
तीन लोक अपने सुत दीन्हा। सुन्न निरंजन बासा लीन्हा।।
अलख निरंजन सुन्न ठिकाना। ब्रह्मा विष्णु शिव भेद न जाना।।
अलख निरंजन बड़ा बटपारा। तीन लोक जिव कीन्ह अहारा।।
ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये। सकल खाय पुन धूर उड़ाये।।
तिनके सुत हैं तीनों देवा। आंधर जीव करत हैं सेवा।।
तीनों देव और औतारा। ताको भजे सकल संसारा।।
तीनों गुणका यह विस्त्तारा। धर्मदास मैं कहों पुकारा।।
गुण तीनों की भक्ति में, भूल परो संसार।
कहै कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरें पार।।

उपरोक्त अमृतवाणी में परमेश्वर कबीर साहेब जी अपने निजी सेवक श्री धर्मदास साहेब जी को कह रहे हैं कि धर्मदास यह सर्व संसार तत्वज्ञान के अभाव से विचलित है। किसी को पूर्ण मोक्ष मार्ग तथा पूर्ण सृष्टी रचना का ज्ञान नहीं है। इसलिए मैं आपको मेरे द्वारा रची सृष्टी की कथा सुनाता हूँ। बुद्धिमान व्यक्ति तो तुरंत समझ जायेंगे। परन्तु जो सर्व प्रमाणों को देखकर भी नहीं मानंेगे तो वे नादान प्राणी काल प्रभाव से प्रभावित हैं, वे भक्ति योग्य नहीं। अब मैं बताता हूँ तीनों भगवानों (ब्रह्मा जी, विष्णु जी तथा शिव जी) की उत्पत्ति कैसे हुई? इनकी माता जी तो अष्टंगी (दुर्गा) है तथा पिता ज्योति निरंजन (ब्रह्म, काल)है। पहले ब्रह्म की उत्पत्ति अण्डे से हुई। फिर दुर्गा की उत्पत्ति हुई।

दुर्गा के रूप पर आसक्त होकर काल (ब्रह्म) ने गलती (छेड़-छाड़) की, तब दुर्गा (प्रकृति) ने इसके पेट में शरण ली। मैं वहाँ गया जहाँ ज्योति निरंजन काल था। तब भवानी को ब्रह्म के उदर से निकाल कर इक्कीस ब्रह्मण्ड समेत 16 संख कोस की दूरी पर भेज दिया। ज्योति निरंजन ने प्रकृति देवी (दुर्गा)के साथ भोग-विलास किया। इन दोनों के संयोग से तीनों गुणों (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) की उत्पत्ति हुई। इन्हीं तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी) की ही साधना करके सर्व प्राणी काल जाल में फंसे हैं। जब तक वास्तविक मंत्र नहीं मिलेगा, पूर्ण मोक्ष कैसे होगा?

साहेब कबीर व गोरख नाथ की गोष्ठी

एक समय गोरख नाथ (सिद्ध महात्मा) काशी (बनारस) में स्वामी रामानन्द जी (जो साहेब कबीर के गुरु जी थे) से शास्त्रार्थ करने के लिए (ज्ञान गोष्टी के लिए) आए। जब ज्ञान गोष्टी के लिए एकत्रित हुए तब कबीर साहेब भी अपने पूज्य गुरुदेव स्वामी रामानन्द जी के साथ पहुँचे थे। एक उच्च आसन पर रामानन्द जी बैठे उनके चरणों में बालक रूप में कबीर साहेब (पूर्ण परमात्मा) बैठे थे। गोरख नाथ जी भी एक उच्च आसन पर बैठे थे तथा अपना त्रिशूल अपने आसन के पास ही जमीन में गाड़ रखा था। गोरख नाथ जी ने कहा कि रामानन्द मेरे से चर्चा करो। उसी समय बालक रूप (पूर्ण ब्रह्म) कबीर जी ने कहा - नाथ जी पहले मेरे से चर्चा करें। पीछे मेरे गुरुदेव जी से बात करना।

साहेब कबीर व गोरख नाथ की गोष्ठी

योगी गोरखनाथ प्रतापी, तासो तेज पृथ्वी कांपी।
काशी नगर में सो पग परहीं, रामानन्द से चर्चा करहीं।
चर्चा में गोरख जय पावै, कंठी तोरै तिलक छुड़ावै।
सत्य कबीर शिष्य जो भयऊ, यह वृतांत सो सुनि लयऊ।
गोरखनाथ के डर के मारे, वैरागी नहीं भेष सवारे।
तब कबीर आज्ञा अनुसारा, वैष्णव सकल स्वरूप संवारा।
सो सुधि गोरखनाथ जो पायौ, काशी नगर शीघ्र चल आयौ।
रामानन्द को खबर पठाई, चर्चा करो मेरे संग आई।
रामानन्द की पहली पौरी, सत्य कबीर बैठे तीस ठौरी।
कह कबीर सुन गोरखनाथा, चर्चा करो हमारे साथा।
प्रथम चर्चा करो संग मेरे, पीछे मेरे गुरु को टेरे।
बालक रूप कबीर निहारी, तब गोरख ताहि वचन उचारी।
इस पर गोरख नाथ जी ने कहा तू बालक कबीर जी कब से योगी बन गया। कल जन्मा अर्थात् छोटी आयु का बच्चा और चर्चा मेरे (गोरख नाथ के) साथ। तेरी क्या आयु है? और कब वैरागी (संत) बन गए?
गोरखनाथ जी का प्रश्न:-
कबके भए वैरागी कबीर जी, कबसे भए वैरागी।
कबीर जी का उत्तर:-
नाथ जी जब से भए वैरागी मेरी, आदि अंत सुधि लागी।।
धूंधूकार आदि को मेला, नहीं गुरु नहीं था चेला।
जब का तो हम योग उपासा, तब का फिरूं अकेला।।
धरती नहीं जद की टोपी दीना, ब्रह्मा नहीं जद का टीका।
शिव शंकर से योगी, न थे जदका झोली शिका।।
द्वापर को हम करी फावड़ी, त्रोता को हम दंडा।
सतयुग मेरी फिरी दुहाई, कलियुग फिरौ नो खण्डा।।
गुरु के वचन साधु की संगत, अजर अमर घर पाया।
कहैं कबीर सुनांे हो गोरख, मैं सब को तत्व लखाया।।
साहेब कबीर जी ने गोरख नाथ जी को बताया हैं कि मैं कब से वैरागी बना। साहेब कबीर ने उस समय वैष्णों संतों जैसा वेष बना रखा था। जैसा श्री रामानन्द जी ने बाणा (वेष) बना रखा था। मस्तिक में चन्दन का टीका, टोपी व झोली सिक्का एक फावड़ी (जो भजन करने के लिए लकड़ी की अंग्रेजी के अक्षर ‘‘T‘‘ के आकार की होती है) तथा एक डण्डा (लकड़ी का लट्ठा) साथ लिए हुए थे। ऊपर के शब्द में कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि जब कोई सृष्टि (काल सृष्टि) नहीं थी तथा न सतलोक सृष्टि थी तब मैं (कबीर) अनामी लोक में था और कोई नहीं था। चूंकि साहेब कबीर ने ही सतलोक सृष्टि शब्द से रची तथा फिर काल (ज्योति निरंजन-ब्रह्म) की सृष्टि भी सतपुरुष ने रची। जब मैं अकेला रहता था जब धरती (पृथ्वी) भी नहीं थी तब से मेरी टोपी जानो। ब्रह्मा जो गोरखनाथ तथा उनके गुरु मच्छन्दर नाथ आदि सर्व प्राणियों के शरीर बनाने वाला पैदा भी नहीं हुआ था। तब से मैंने टीका लगा रखा है अर्थात् मैं (कबीर) तब से सतपुरुष आकार रूप मैं ही हूँ।
सतयुग-त्रोतायुग-द्वापर तथा कलियुग ये चार युग तो मेरे सामने असंख्यों जा लिए। कबीर परमेश्वर जी ने कहा कि हमने सतगुरु वचन में रह कर अजर-अमर घर (सतलोक) पाया। इसलिए सर्व प्राणियों को तत्व (वास्तविक ज्ञान) बताया है कि पूर्ण गुरु से उपदेश ले कर आजीवन गुरु वचन में चलते हुए पूर्ण परमात्मा का ध्यान सुमरण करके उसी अजर-अमर सतलोक में जा कर जन्म-मरण रूपी अति दुःखमयी संकट से बच सकते हो।
इस बात को सुन कर गोरखनाथ जी ने पूछा हैं कि आपकी आयु तो बहुत छोटी है अर्थात् आप लगते तो हो बालक से।
जो बूझे सोई बावरा, क्या है उम्र हमारी।
असंख युग प्रलय गई, तब का ब्रह्मचारी।।टेक।।
कोटि निरंजन हो गए, परलोक सिधारी।
हम तो सदा महबूब हैं, स्वयं ब्रह्मचारी।।
अरबों तो ब्रह्मा गए, उनन्चास कोटि कन्हैया।
सात कोटि शम्भू गए, मोर एक नहीं पलैया।।
कोटिन नारद हो गए, मुहम्मद से चारी।
देवतन की गिनती नहीं है, क्या सृष्टि विचारी।।
नहीं बुढ़ा नहीं बालक, नाहीं कोई भाट भिखारी।
कहैं कबीर सुन हो गोरख, यह है उम्र हमारी।।
श्री गोरखनाथ सिद्ध को सतगुरु कबीर साहेब अपनी आयु का विवरण देते हैं। असंख युग प्रलय में गए। तब का मैं वर्तमान हूँ अर्थात् अमर हूँ। करोड़ों ब्रह्म (क्षर पुरूष अर्थात् काल) भगवान मृत्यु को प्राप्त होकर पुनर्जन्म प्राप्त कर चुके हैं।
  • एक ब्रह्मा की आयु 100 (सौ) वर्ष की है

ब्रह्मा का एक दिन = 1000 (एक हजार) चतुर्युग तथा इतनी ही रात्राी।
दिन-रात = 2000 (दो हजार) चतुर्युग।

{नोट - ब्रह्मा जी के एक दिन में 14 इन्द्रों का शासन काल समाप्त हो जाता है। एक इन्द्र का शासन काल बहतर चतुर्युग का होता है। इसलिए वास्तव में ब्रह्मा जी का एक दिन (72 गुणा 14 😊 1008 चतुर्युग का होता है तथा इतनी ही रात्राी, परन्तु इस को एक हजार चतुर्युग ही मान कर चलते हैं।}

महीना = 30 गुणा 2000 = 60000 (साठ हजार) चतुर्युग।
वर्ष = 12 गुणा 60000 = 720000 (सात लाख बीस हजार) चतुर्युग की।

  • ब्रह्मा जी की आयु -
720000 गुणा 100 = 72000000 (सात करोड़ बीस लाख) चतुर्युग की।
ब्रह्मा से सात गुणा विष्णु जी की आयु -
72000000 गुणा 7 = 504000000 (पचास करोड़ चालीस लाख) चतुर्युग की विष्णु की आयु
है।

  • विष्णु से सात गुणा शिव जी की आयु -
504000000 गुणा 7 = 3528000000 (तीन अरब बावन करोड़ अस्सी लाख) चतुर्युग की शिव
की आयु हुई।
ऐसी आयु वाले सत्तर हजार शिव भी मर जाते हैं तब एक ज्योति निरंजन (ब्रह्म) मरता है। पूर्ण परमात्मा के द्वारा पूर्व निर्धारित किए समय पर एक ब्रह्मण्ड में महाप्रलय होती है। यह (सत्तर हजार शिव की मृत्यु अर्थात् एक सदाशिव/ज्योति निरंजन की मृत्यु होती है) एक युग होता है परब्रह्म का। परब्रह्म का एक दिन एक हजार युग का होता है इतनी ही रात्राी होती है तीस दिन-रात का एक महिना तथा बारह महिनों का परब्रह्म का एक वर्ष हुआ तथा सौ वर्ष की परब्रह्म की आयु है। परब्रह्म की भी मृत्यु होती है। ब्रह्म अर्थात् ज्योति निरंजन की मृत्यु परब्रह्म के एक दिन के पश्चात् होती है परब्रह्म के सौ वर्ष पूरे होने के पश्चात् एक शंख बजता है सर्व ब्रह्मण्ड नष्ट हो जाते हैं।

केवल सतलोक व ऊपर तीनों लोक ही शेष रहते हैं। इस प्रकार कबीर परमात्मा ने कहा है कि करोड़ों ज्योति निरंजन मर लिए मेरी एक पल भी आयु कम नहीं हुई है अर्थात् मैं वास्तव में अमर पुरुष हूं। अन्य भगवान जिसका तुम आश्रय ले कर भक्ति कर रहे हो वे नाशवान हैं। फिर आप अमर कैसे हो सकते हो? अरबों तो ब्रह्मा गए, 49 कोटि कन्हैया। सात कोटि शंभु गए, मोर एक नहीं पलैया।
यहां देखें अमर पुरुष कौन है? 343 करोड़ त्रिलोकिय ब्रह्मा मर जाते हैं, 49 करोड़ त्रिलोकिय विष्णु तथा 7 करोड़ त्रिलोकिय शिव मर जाते हैं तब एक ज्योति निरंजन (काल-ब्रह्म) मरता है। जिसे गीता जी के अध्याय 15 के श्लोक 16 में क्षर -पुरूष (नाशवान) भगवान कहा है इसे ब्रह्म भी कहते हैं तथा इसी श्लोक में जिसे अक्षर पुरूष (अविनाशी) कहा है वह परब्रह्म है जिसे अक्षर पुरुष भी कहते हैं। अक्षर पुरुष अर्थात् परब्रह्म भी नष्ट होता है। यह काल भी करोड़ों समाप्त हो जाएंगे। तब सर्व अण्डों अर्थात् ब्रह्मण्डों का नाश होगा। केवल सतलोक व उससे ऊपर के लोक शेष रहेगें। अचिंत, सत्यपुरूष के आदेश से सृष्टि रचेगा। यही क्षर पुरुष तथा अक्षर पुरुष की सृष्टि पुनः प्रारम्भ होगी।
जो गीता जी के अध्याय 15 के श्लोक 17 में कहा है कि वह उत्तम पुरुष (पूर्ण परमात्मा) तो कोई और ही है जिसे अविनाशी परमात्मा नाम से जाना जाता है। वह पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर सतपुरुष स्वयं कबीर साहेब है। केवल सतपुरुष अजर-अमर परमात्मा है तथा उसी का सतलोक (सतधाम) अमर है जिसे अमर लोक भी कहते हैं। वहाँ की भक्ति करके भक्त आत्मा पूर्ण मुक्त होती है। जिसका कभी मरण नहीं होता।

कबीर साहेब ने कहा कि यह उपलब्धि सत्यनाम के जाप से प्राप्त होती है जो उसके मर्म भेदी गुरु से मिले तथा उसके बाद सारनाम मिले तथा साधक आजीवन मर्यादा में रहकर तीनों मन्त्रों (ओम् तथा तत् जो सांकेतिक है तथा सत् भी सांकेतिक है) का जाप करे तब सतलोक में वास तथा सतपुरुष प्राप्ति होती है। करोंड़ों नारद तथा मुहम्मद जैसी पाक (पवित्र) आत्मा भी आकर (जन्म कर) जा (मर) चुके हैं, देवताओं की तो गिनती नहीं। मानव शरीर धारी प्राणियों तथा जीवों का तो हिसाब क्या लगाया जा सकता है? मैं (कबीर साहेब) न बूढ़ा न बालक, मैं तो जवान रूप में रहता हूँ जो ईश्वरीय शक्ति का प्रतीक है। यह तो मैं लीलामई शरीर में आपके समक्ष हूँ। कहै कबीर सुनों जी गोरख, मेरी आयु (उम्र) यह है जो आपको ऊपर बताई है।
यह सुन कर श्री गोरखनाथ जी जमीन में गड़े लगभग 7 फूट ऊँचें त्रिशूल के ऊपर के भाग पर अपनी सिद्धि शक्ति से उड़ कर बैठ गए और कहा कि यदि आप इतने महान् हो तो मेरे बराबर में (जमीन से लगभग सात फूट) ऊँचा उठ कर बातें करो। यह सुन कर कबीर साहेब बोले नाथ जी! ज्ञान गोष्टी के लिए आए हैं न कि नाटक बाजी करने के लिए। आप नीचे आएं तथा सर्व भक्त समाज के सामने यथार्थ भक्ति संदेश दें।
श्री गोरखनाथ जी ने कहा कि आपके पास कोई शक्ति नहीं है। आप तथा आपके गुरुजी दुनियाँ को गुमराह कर रहे हो। आज तुम्हारी पोल खुलेगी। ऐसे हो तो आओ बराबर। तब कबीर साहेब के बार-2 प्रार्थना करने पर भी नाथ जी बाज नहीं आए तो साहेब कबीर ने अपनी पराशक्ति (पूर्ण सिद्धि) का प्रदर्शन किया। साहेब कबीर की जेब में एक कच्चे धागे की रील (कुकड़ी) थी जिसमें लगभग 150 (एक सौ पचास) फुट लम्बा धागा लिप्टा (सिम्टा) हुआ था, को निकाला और धागे का एक सिरा (आखिरी छौर) पकड़ा और आकाश में फैंक दिया। वह सारा धागा उस बंडल (कुकड़ी) से उधड़ कर सीधा खड़ा हो गया। साहेब कबीर जमीन से आकाश में उड़े तथा लगभग 150 (एक सौ पचास) फुट सीधे खड़े धागे के ऊपर वाले सिरे पर बैठ कर कहा कि आओ नाथ जी! बराबर में बैठकर चर्चा करें। गोरखनाथ जी ने ऊपर उड़ने की कोशिश की लेकिन उल्टा जमीन पर
टिक गए।
पूर्ण परमात्मा (पूर्णब्रह्म) के सामने सिद्धियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं। जब गोरख नाथ जी की कोई कोशिश सफल नहीं हुई, तब जान गए कि यह कोई मामूली भक्त या संत नहीं है। जरूर कोई अवतार (ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से) है। तब साहेब कबीर से कहा कि हे परम पुरुष! कृप्या नीचे आएँ और अपने दास पर दया करके अपना परिचय दें। आप कौन शक्ति हो? किस लोक से आना हुआ है? तब कबीर साहेब नीचे आए और कहा कि -

(कबीर सागर - अगम निगम बोध - पृष्ठ 41)

अवधु अविगत से चल आया, कोई मेरा भेद मर्म नहीं पाया।।टेक।।
ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा, बालक ह्नै दिखलाया।
काशी नगर जल कमल पर डेरा, तहाँ जुलाहे ने पाया।।
माता-पिता मेरे कछु नहीं, ना मेरे घर दासी।
जुलहा को सुत आन कहाया, जगत करे मेरी हांसी।।
पांच तत्व का धड़ नहीं मेरा, जानूं ज्ञान अपारा।
सत्य स्वरूपी नाम साहिब का, सो है नाम हमारा।।
अधर दीप (सतलोक) गगन गुफा में, तहां निज वस्तु सारा।
ज्योति स्वरूपी अलख निरंजन (ब्रह्म) भी, धरता ध्यान हमारा।।
हाड चाम लोहू नहीं मोरे, जाने सत्यनाम उपासी।
तारन तरन अभै पद दाता, मैं हूं कबीर अविनासी।।
साहेब कबीर ने कहा कि हे अवधूत गोरखनाथ जी मैं तो अविगत स्थान (जिसकी गति/भेद कोई नहीं जानता उस सतलोक) से आया हूँ। मैं तो स्वयं शक्ति से बालक रूप बना कर काशी (बनारस) मंे एक लहर तारा तालाब में कमल के फूल पर प्रकट हुआ हूँ। वहाँ पर नीरू-नीमा नामक जुलाहा दम्पति को मिला जो मुझे अपने घर ले आया। मेरे कोई मात-पिता नहीं हैं। न ही कोई घर दासी (पत्नी) है और जो उस परमात्मा का वास्तविक नाम है, वही कबीर नाम मेरा है। आपका ज्योति स्वरूप जिसे आप अलख निरंजन (निराकार भगवान) कहते हो वह ब्रह्म भी मेरा ही जाप करता है। मैं सतनाम का जाप करने वाले साधक को प्राप्त होता हूँ अर्थात् वहीं मेरे विषय में सही जानता है।

हाड-चाम तथा लहु रक्त से बना मेरा शरीर नहीं है। कबीर साहेब सतनाम की महिमा बताते हुए कहते हैं कि मेरे मूल स्थान (सतलोक) में सतनाम के आधार से जाया जाता है। अन्य साधकों को संकेत करते हुए प्रभु कबीर (कविर्देव) जी कह रहे हैं कि मैं उसी का जाप करता रहता हूँ। इसी मन्त्रा (सतनाम) से सतलोक जाने योग्य होकर फिर सारनाम प्राप्ति करके जन्म-मरण से पूर्ण छुटकारा मिलता है। यह तारन तरन पद (पूजा विधि) मैंने (कबीर साहेब अविनाशी भगवान ने) आपको बताई है। इसे कोई नहीं जानता। गोरख नाथ जी को बताया कि हे पुण्य आत्मा! आप काल क्षर पुरुष (ज्योति निरंजन) के जाल में ही हो। न जाने कितनी बार आपके जन्म हो चुके हैं। कभी चैरासी लाख जूनियों में कष्ट पाया। आपकी चारांे युगों की भक्ति को काल अब (कलियुग में) नष्ट कर देता यदि आप मेरी शरण मंे नहीं आते।
यह काल इक्कीस ब्रह्मण्डों का मालिक है। इसको शाप लगा है कि एक लाख मानव शरीर धारी (देव व ऋषि भी) जीव प्रतिदिन खायेगा तथा सवा लाख मानव शरीरधारी प्राणियों को नित्य उत्पन्न करेगा। इस प्रकार प्रतिदिन पच्चीस हजार बढ़ रहे हैं। उनको ठिकाने लगाए रखने के लिए तथा कर्म भुगताने के लिए अपना कानून बना कर चैरासी लाख योनियाँ बना रखी हैं। इन्हीं 25 हजार अधिक उत्पन्न जीवों के अन्य प्राणियों के शरीर में प्रवेश करता है। जैसे खून में जीवाणु, वायु में जीवाणु आदि-2। इसकी पत्नी आदि माया (प्रकृति देवी) है। इसी से काल (ब्रह्म/अलख निरंजन) ने (पत्नी-पति के संयोग से) तीन पुत्रा ब्रह्मा-विष्णु-शिव उत्पन्न किए। इन तीनों को अपने सहयोगी बना कर ब्रह्मा को शरीर बनाने का, विष्णु को पालन-पोषण का और शिव को संहार करने का कार्य दे रखा है।

इनसे प्रथम तप करवाता है फिर सिद्धियाँ भर देता है जिसके आधार पर इनसे अपना उल्लु सीधा करता है और अंत में इन्हें (जब ये शक्ति रहित हो जाते हैं) भी मार कर तप्त शिला पर भून कर खाता है तथा अन्य पुत्रा पूर्व ही उत्पन्न करके अचेत रखता है उनको सचेत करके अपना उत्पति, स्थिति तथा संहार का कार्य करता है। ऐसे अपने काल लोक को चला रहा है। इन सब से ऊपर पूर्ण परमात्मा है। उसका ही अवतार मुझ (कबीर परमेश्वर) को जान।
गोरख नाथ के मन में विश्वास हो गया कि कोई शक्ति है जो कुल का मालिक है। गोरख नाथ ने कहा कि मेरी एक शक्ति और देखो। यह कह कर गंगा की ओर चल पड़ा। सर्व दर्शकों की भीड़ भी साथ ही चली। लगभग 500 फुट पर गंगा नदी थी। उसमंे जा कर छलांग लगाते हुए कहा कि मुझे ढूंढ दो। फिर मैं (गोरखनाथ) आप का शिष्य बन जाऊँगा। गोरखनाथ मछली बन गए। साहेब कबीर ने उसी मछली को पानी से बाहर निकाल कर सबके सामने गोरखनाथ बना दिया। तब गोरखनाथ जी ने परमेश्वर कबीर जी को पूर्ण परमात्मा स्वीकार किया और शिष्य बने। परमेश्वर कबीर जी से सतनाम ले कर भक्ति की तथा सिद्धियाँ प्राप्त करने वाली साधना त्याग दी।
गीता जी के अध्याय 14 के श्लोक 26,27 का भाव है कि साधक अव्याभिचारिणी भक्ति अर्थात् पूर्ण आश्रित मुझ (काल-ब्रह्म) पर हो कर (अन्य देवी-देवताओं तथा माता, रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव आदि की पूजा त्याग कर) केवल मेरी भक्ति करता है तथा एक मेरे मन्त्रा ऊँ का जाप करता है वह उपासक उस परमात्मा को पाने योग्य हो जाता है और आगे की साधना करके उस परमानन्द के परम सुख को भी मेरे माध्यम से प्राप्त करता है।
जैसे कोई विधार्थी मैट्रिक, बी.ए., एम.ए. करके किसी कोर्स में प्रवेश ले कर सर्विस प्राप्त करके रोजी प्राप्त करके सुखी होता है तो उसके लिए उसने मैट्रिक की शिक्षा प्राप्त की जिसके बाद कोर्स (ट्रेनिंग) में प्रवेश किया। उसको मैट्रिक की शिक्षा प्रतिष्ठा (अवस्था) अर्थात् सहयोगी हुआ।

सर्विस प्रदान कत्र्ता नहीं हुआ। ठीक इसी प्रकार काल भगवान (ब्रह्म) कह रहा है कि उस अविनाशी परमात्मा के अमरत्व का और नित्य रहने वाले स्वभाव का तथा धर्म का और अखण्ड स्थाई रहने के आनन्द का सहयोगी मैं (ब्रह्म) हूँ। इसी का प्रमाण गीता जी के अध्याय 18 के श्लोक 66 में कहा है कि सर्व मेरे सत्रा की साधनाओं (ओंम् एक अक्षर के जाप तथा पांचों यज्ञों की कमाई) को मुझमें त्याग कर एक (पूर्णब्रह्म) की शरण में जा तब तेरे सर्व पाप क्षमा करवा दूंगा। जिन भक्त आत्माओं ने काल (ब्रह्म) के ऊँ मन्त्रा का जाप अनन्य मन से किया। उनको कबीर भगवान ने आगे की उस पूर्ण परमात्मा की भक्ति प्रदान करके काल लोक से पार किया। जैसे नामदेव नामक परम भक्त केवल एक नाम ऊँ का जाप करते थे। उससे उनको बहुत सिद्धियाँ प्राप्त हो गई थी फिर भी मुक्ति नहीं थी। फिर कबीर साहेब श्री नामदेव जी को मिले तथा सतलोक व सतपुरुष का ज्ञान कराया। सोहं मन्त्र दिया जो परब्रह्म का जाप है। फिर सार शब्द दिया जो पूर्णब्रह्म का जाप है। जब नामदेव जी मुक्त हुए।

ऐसे ही गोरखनाथ जी ने भी एक मन्त्र अलख निरंजन का जाप तथा चांचरी मुद्रा की साधना की। तब साहेब कबीर ने उन्हें ऊँ तथा सोहं मन्त्र दिया तथा काल जाल से बाहर किया।

शेख फरीद (बाबा फरीद) की कथा

एक शेख फरीद नाम के मुसलमान संत थे, भक्त थे। वो बचपन में काफी शरारती था। और उसकी माता जी प्रतिदिन नमाज़ करने को कहती थी, वो नहीं करता था, मानता नहीं था। वो कहता था कि मुझे अल्लाह से क्या मिलेगा? मैं क्यों करूँ नमाज़? एक दिन माँ ने कहा कि अल्लाह तुझे खजूर देगा। अब शेख फरीद जी को खजूर बहुत प्रिय थे। वो उसका मनपसंद फल था। वह कहने लगा - सचमुच। माँ ने कहा - हाँ। शेख फरीद ने कहा कि देख लो, अगर अल्लाह ने खजूर नहीं दिए तो मैं कभी नमाज़ नहीं करूँगा। माता ने कहा -अवश्य देगा बेटा। वो यह चाहती थी कि ये किसी तरह शरारत से पीछा छोड़ दे, नमाज़ तो इसे क्या करनी आएगी। और मैं अपने काम कर लिया करुँगी। बहुत उलाहने आते हैं।
माता ने क्या किया कि एक चद्दर बिछाई, और कहा कि बेटा, जब तक मैं न कहूँ तब तक आँख नहीं खोलनी। और ऐसे विधि बता दी कि ऐसे लेट कर मत्था टेकना है। शेख फरीद ने कहा कि क्या कहूँ माँ ? माता ने कहा कि ये कहता रहियो कि - अल्लाह मुझे खजूर दे, अल्लाह मुझे खजूर दे। शेख फरीद यही करता रहा - अल्लाह मुझे खजूर दे। माँ अपने काम में लग गयी। उसकी माँ ने क्या किया कि थोड़े से खजूर ला कर, 4-5 खजूर एक पत्ते में लपेट कर जहाँ वो चद्दर बिछा राखी थी, उसके नीचे रख दिए।

शेख फरीद (बाबा फरीद) की कथा


जब माँ का काम हो लिया तो उसने कहा कि बेटा अब उठ ले। माँ ने सोचा की अब यह कोई शरारत करेगा तो मैं इसे पकड़ लाऊंगी, बिठा लुंगी। शेख फरीद उठा, उसने देखा कि कहीं खजूर तो है ही नहीं। तो वो चल पड़ा और कहने लगा कि माँ तू तो बहुत झूठी है। आप कह रहे थे कि अल्लाह तुझे खजूर देगा। पर अल्लाह ने तो खजूर नहीं दिए। अब आज के बाद मैं कभी नहीं करूँगा नमाज़। माँ बोली बेटा, अल्लाह ऐसे सबके समक्ष थोड़े ही न दिया करता है। वो तो गुप्त रूप से दिया करता है। जिस कपडे के नीचे तू नमाज़ कर रहा था, देख उसको उठा कर। उसने उठा कर देखा कि एक पत्ते के अंदर 4-5 खजूर थे। वो उन्हें खाए और कूदे। जब शेख फरीद ने खजूर खा लिए तो थोड़ी देर बाद बोला कि माँ अब बता नमाज़ कब करनी है।
नमाज़ पांच समय करनी होती है। तो माँ क्या करती थी कि जब वो व्यस्त हो जाता था आँखे बंद करके कहने में कि अल्लाह मुझे खजूर दे, तो माँ चुपके से वो खजूर रख आती थी। एक दिन वो काम में लग गयी और खजूर रखना भूल गयी। तो शेख फरीद (Sheikh Farid) उठा, उसने चद्दर उठा कर देखी, वहां उसी प्रकार खजूर पड़े थे। वो खजूर खता हुआ आ रहा था। अब उसकी माँ को याद आया कि आज मैं खजूर रखना भूल गयी, और यह आ गया। और यह निकम्मा कभी नमाज़ नहीं करेगा। हे भगवान, यह आज क्या बनी, मैं कैसे भूल गयी। शेख फरीद खजूर खता हुआ आ रहा था। उसकी माँ ने कहा कि बेटा, यह खजूर कहाँ से लाया तू? शेख फरीद बोला - अरे माँ, अल्लाह रोज़ ही तो देता है! माँ ने सोचा यह निकम्मा आप लाया है कहीं से। उसने कहा कि सच बता तू कहाँ से लाया है? शेख फरीद ने कहा कि माँ देख यहीं तो पड़े थे, मैं कहीं बाहर तो गया ही नहीं। अब उसकी माँ के पसीने आ गए कि सचमुच ये तो परमात्मा ने बहुत ही सुन्दर और स्वादिष्ट खजूर भेज दिए। अब यह लक्षण हैं क्योंकि वो पिछले जन्म का संस्कारी हंस था। और ऐसे हंस के लिए पूर्ण ब्रह्म परमात्मा साथ-साथ फिरते हैं। कहते हैं :-
जो जन हमरी शरण है, ताका हूँ मैं दास।
गेल-गेल लाग्या रहूँ, जब तक धरती आकाश।।
उसी बालक शेख फरीद ने बड़ा हो कर के घर त्याग दिया। क्योंकि जिनको भगवान की चाह है वो तड़फ जाते हैं जब तक उनको यथार्थ भक्ति मार्ग नहीं मिलता। तो उसने जा कर के एक सूफी संत यानी तपस्वी संत को गुरु बना लिया। अब उस तपस्वी को जैसा ज्ञान था उसने उसको कहा कि बेटा, तप से अल्लाह का दीदार होगा, परमात्मा के दर्शन होंगे। और जितना घोर तप आप कर सकते हो करो। उसने विधि बता दी। शेख फरीद वैसा करने लगा। आश्रम में जहाँ वो रहते थे, वहां पांच-सात और भी शिष्य थे उस गुरु के।

उन्होंने क्या कर रखा था कि प्रतिदिन एक शिष्य की सेवा बाँट रखी थी कि एक दिन एक ही व्यक्ति, एक ही सेवक खाना भी बनाएगा गुरु जी का, और वस्त्र भी धोएगा, और गुरु जी का हुक्का भी भरेगा। शेख फरीद का गुरु हुक्का पीया करता था। शेख फरीद के प्रति उस गुरुदेव का काफी रुझान था। वो शेख फरीद को अत्यधिक विश्वसनीय मानता था। और उसको सेवा में अधिक रखता था। तो अन्य शिष्य ईर्ष्या करने लग गए कि गुरु जी शेख फरीद से ज्यादा लगाव रखते हैं। और हमसे इतना प्रेम नहीं करते। ऐसा कोई तरीका ढूंढो कि ये गुरु जी की नज़रों में गिर जाय।
ये आग सब जगह लगी है। जहाँ परमात्मा का वास नहीं होता वहां यह बिमारी सब डेरों में घर कर जाती है। परन्तु जहाँ पूर्ण परमात्मा का वास होता है, पंजा होता है, वहां ऐसी घटनाएँ जल्दी से नहीं घटती। परमात्मा कोई न कोई कारण बनाकर उनको सीधा कर देता है। तो वहां क्या हुआ कि एक दिन शेख फरीद की सेवा का दिन आ गया। उसने शाम के समय खाना बनाया। और खाना बना कर जब खिलाने के लिए गया, उसके बाद हुक्का भरने के लिए अग्नि तैयार करनी होती है। वो तैयार करके गया। उन चेलों ने क्या सोचा कि यह जो हुक्का भरने के लिए अग्नि होती है, इस पर पानी डाल दो। ये बुझ जायेगी। और वो गुरु जी इतना क्रोधी था कि खाना खाते ही दस मिनट के अंदर उसको हुक्का चाहिए। अगर दस मिनट में हुक्का नहीं आता, तो डंडा उठा कर बिना गिनती के उस सेवक के मार दिया करता। इतना पीट देता था और उस सेवक को सेवा से वंचित कर देता था।
तो उन्होंने सही तरीका ढूँढा कि आज ये समय से हुक्का नहीं भर पायेगा और ये गुरु-चेले की यारी टूटेगी। अब शेख फरीद खाना खिलने गया। वो तो निश्चिन्त था की दो मिनट में हुक्का भर के दे दूंगा। अग्नि तैयार कर रखी है। उसने गुरु जी को खाना खिलाया और फिर बर्तन रख कर आया। तो धीरे-धीरे आ कर के ज्यों ही वो अग्नि के पास पहुंचा जहाँ चिलम रखी थी, तो उसने देखा कि आग तो बुझ गयी। उन दिनों वर्षा के दिन थे। उसने सोचा गीली लकड़ी थी बुझ गयी होगी। वहां से आधा किलोमीटर की दूरी पर गाँव था।

अब उसने आव देखा न ताव। हाथ में चिलम ले ली, तम्बाकू डाल लिया और दौड़ लिया। वहाँ देखा कि एक घर से धुँआ उठ रहा था। भाग कर उसमें घुस गया और बोला कि -माई, अग्नि दे दे। माई की बेटी, अग्नि दे दे। अब वो माई खुद दुखी हो रही थी। फूक मारे, आग बाले, आग बले नहीं, धुँआ उठे, आँखों में पानी आए। वो गुस्से में आकर बोली - क्यों सिर पर चढ़ता आवे है। आँख फूटे है आग में। तू आँख फुड़वा ले। तब आग मिलेगी। ऐसे थोड़े ही न मिलती है आग। शेख फरीद ने कहा कि माई, आँख फोड़ने से आग मिल जाएगी? माई ने कहा -हाँ, आँख फ़ुड़वा ले, तब मिलेगी आग। वो उसकी तरफ देख नहीं रही थी और फूँ-फूँ कर रही थी।

शेख फरीद ने क्या किया कि चिमटा दे कर आँख में और आँख निकाल दी। उसको ये था कि यदि आज गुरु जी रुष्ट हो गए, तो तेरी करी करायी कमाई जाएगी। उसने निकाल के आँख और कहा कि -ले माई, आँख ले ले, मुझे आग दे दे। अब माई ने देखा कि इसने तो सचमुच आँख निकाल दी। वो डर गयी कि सुना है जिसका ये शिष्य है वो साधू बहुत सिद्ध है और उसके वचन सिद्ध होते हैं। वो डर गई, और बोली - महाराज, ले लो आग।
अब शेख फरीद ने उस फूटी आँख के ऊपर कपड़ा बाँध लिया। और फटा-फट आग रख कर भाग लिया। अब गुरु जी ने पहली आवाज़ लगायी थी कि भाई शेख फरीद, हुक्का ला बेटा। वो भी उसने सुन ली दूर से। अगर दूसरे-तीसरे पर वो न पहुँचता तो, गुरु जी के हाथ में डंडा होता। वो भगा आ रहा था। आँख निकाल रखी थी। पीड़ा असहनीय हो रही थी। लेकिन वो भक्त चसक भी नहीं रहा था। और भाग लिया। जब दूसरी आवाज़ लगाई, तो भी दूर था। जब तीसरी आवाज़ लगाई के शेख फरीद कहाँ मर गया तू। तो शेख फरीद बोला -आ गया गुरु जी, आ गया गुरु जी, आ गया गुरु जी, आ गया। वो पहुँच गया।

गुरु जी बोले - क्या हो गया था बेटा? शेख फरीद बोला - गुरु जी वर्षा के दिन हैं, और आग बनी नहीं। यहाँ नगरी से जाकर लाया हूँ। गुरु जी बोले - अच्छा बेटा। तेरी आँख को क्या हो गया? शेख फरीद बोला - बस जी, आपकी दया है जी। कुछ नहीं हुआ जी। भागा जा रहा था और एक झाड़ी लग गयी और खरोंच सी आ गयी। इसलिए बाँध ली। गुरु जी बोले - अच्छा बेटा। कोई दवाई लगा ले। अब वो गुरु जी तो पी के हुक्का सो गया।
उस माई को नींद नहीं आई कि - हे भगवान, ये क्या हुआ। कैसा पाप हो गया मेरे से। उसने एक डब्बे में रख रखी थी वो आँख छुपा के। उसने सोचा कि अभी रात को तो जा नहीं सकती, सुबह जाऊंगी। सुबह वो उस आँख को ले कर गई और कहा कि महाराज जी, मुझे माफ़ कर दो, मेरे से गलती हो गयी। संत बोला - क्या हो गया बेटी? माई बोली - माफ़ कर दो महाराज, मेरे से बहुत बड़ी गलती हो गयी। ऐसे-ऐसे आपका भक्त अग्नि लेने गया था, और मैं धूंए में दुखी हो रही थी। मौसम गीला था। जिसकी वजह से लकड़ी भी ठीक से नहीं जल रही थी, और फूंक मार मारकर मेरी आँखें धुँयें से खराब हो रही थीं, और मैंने ऐसे-ऐसे कह दिया, और आपके शिष्य ने सच में आँख निकाल कर रख दी।

हे गुरु जी, मुझे माफ़ कर दो। मुझे पाप लग गया। मैंने तो वैसे ही कहा था। उस संत ने सोचा कि ये तो गजब हो गया। उसने बोला कि शेख फरीद कहाँ है? उसे बुलाओ। शेख फरीद आ गया। उसने देख लिया कि माई आ गयी, ये तो बात बिगाड़ दी। संत बोला - बेटा, क्या हो गया तेरी आँख को? शेख फरीद बोला - कुछ नहीं, गुरु जी। आप बैठे हो, दास को क्या हो सकता है। गुरु जी ने कहा - खोल इस कपड़े को। वो कपड़ा खोला तो आँख ज्यों की त्यों पाई। लेकिन थोड़ी छोटी हो गयी पहले वाली से। और वो माई अलग से एक आँख ले रही थी। तत्वज्ञान से ये बताना चाहते हैं की शेख फरीद के वो गुरुदेव इतने सिद्ध पुरुष थे कि उनकी शक्ति से वो आँख भी पूरी हो गयी फूटी हुई, पर मोक्ष फिर भी नहीं था।
कुछ दिनों के बाद उस संत का देहांत हो गया। शेख फरीद ने सोचा कि गुरु जी ने कहा है की तप करने से परमात्मा के दर्शन हो सकते हैं। अगर इस मानव जीवन से परमात्मा प्राप्ति नहीं हुई, तो यह व्यर्थ है। ऐसा सोच कर जैसे उसके गुरुदेव ने बताया था वो वैसे साधना करता रहा। पहले बैठ कर किया, फिर खड़ा हो कर किया। उसने सोचा कि भाई ऐसे तो बात नहीं बनेगी। एक दिन उसने कुएँ में उल्टा लटक कर तप करने की सोची। वह एक वृक्ष की मोटी डार से अपने पैर बाँध कर कुँए के अंदर उल्टा लटक जाता और पानी के स्तर के ऊपर रह कर घंटों तप करता रहता। बीच बीच में थोड़ा सा अन्न खाता। बहुत कमज़ोर हो गया। कहते हैं कि 12 वर्ष में शेख फरीद ने सवा मण यानी 50 किलो अन्न खाया था। तो एक दिन में कितना खाया होगा, हिसाब लगा लो। उसके शरीर में केवल अस्थि पिंजर शेष था।
एक दिन वो कुँए से बाहर आकर लेटा हुआ था और बहुत घबराया हुआ था कि हे भगवान, यह शरीर भी जायेगा और दर्शन परमात्मा के हुए नहीं। वो ऐसे लेटा हुआ था और कौअे आ गए और उन्होंने सोचा कि ये आदमी मरा हुआ है। उसके शरीर पर और तो कहीं मांस था नहीं, क्योंकि वो बिलकुल सूख चूका था लकड़ी की तरह। कमज़ोर इतना हो गया था। कौओं ने सोचा कि इसकी आँख खा लो थोड़ी बहुत गीली होंगी। तो उसके माथे पर कौअे आ कर बैठ गए। जैसे ही कौअे आये तो शेख फरीद कहने लगा, भाई कौओं मेरी आँख न फोड़ो। मेरी आँख छोड़ दो। अगर मेरे शरीर पर कहीं माँस बचा हो तो उसको सारे को खा लो। मेरी आँख न खाओ।

हो सकता है मुझे अल्लाह के दर्शन हो जाएँ। जब वो इतना बोला तो कौअे उड़ गए कि ये आदमी तो जिन्दा है। अब उसने सोचा कि यहाँ तो ये कौअे तेरी आँख फोड़ेंगे और भगवान के दर्शन होंगे नहीं। ऐसा सोच कर वो वापिस कुएँ में लटक गया। ऐसे वो एक बार कुँए से बाहर आता था, थोड़ा सा भोजन करता था और फिर वापिस लटक जाता था। ऐसे वो एक दिन लटका हुआ था और फूट-फूट कर रोने लग गया कि हे परमात्मा, जीवन बर्बाद हो गया, आपके दर्शन हुए नहीं। अब यह पुण्य आत्मा पहले कभी परमेश्वर की शरण में रही थी। जब परमात्मा ने देखा कि यह हृदय से रो रहा है, फूट-फूट कर रो रहा है कि जीवन नाश हो गया। तो परमात्मा कबीर भगवान, अल्लाहु अकबर, सतलोक से आये और शेख फरीद को कुँए से बाहर निकल लिया। जब शेख फरीद बाहर आया तो बोला -भाई, क्यों मुझे परेशान कर रहे हो। मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है। मैं अपना काम कर रहा हूँ, तुम अपना करो।
कबीर साहिब ने कहा कि तुम कुँए में क्या कर रहे हो। शेख फरीद ने कहा कि मैं अल्लाह के दीदार कर प्रयत्न कर रहा हूँ। कबीर साहिब बोले - मैं अल्लाह हूँ। यह सुनकर शेख फरीद बोला - क्यों मेरे से मज़ाक़ कर रहे हो। अल्लाह ऐसा थोड़े ही न होता है। कबीर साहिब ने कहा कि कैसा होता है अल्लाह। शेख फरीद ने कहा कि अल्लाह तो बेचून है, निराकार है। कबीर साहिब बोले - सोच तू क्या बोल रहा है, और क्या कर रहा है। एक तरफ तो तुम कह रहे हो कि अल्लाह बेचून है, निराकार है। और दूसरी तरफ अल्लाह के दीदार (दर्शन) के लिए तप कर रहे हो। अल्लाह से साक्षात्कार करने के लिए इतना कठिन परिश्रम कर रहे हो और दूसरी तरफ कह रहे हो की अल्लाह निराकार है। यह सुनते ही शेख फरीद जान गया कि यह पुण्य आत्मा अल्लाह का जानकार है।

शेख फरीद कबीर साहिब के चरणो में गिर गया और कहने लगा कि मुझे सत मार्ग बताईये, मैं बहुत दुखी हूँ। कबीर साहिब ने कहा कि तप से परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती। तप करने से इंसान राजा बनता है और राज भोगने के बाद फिर नरक और चौरासी लाख योनियों में दुःख उठाता है। तुम्हारे गुरुदेव ने तुम्हे गलत मार्ग दर्शन किया। वे अज्ञानी थे और तुम्हारा जीवन बर्बाद कर दिया।
कबीर, ज्ञान हीन जो गुरु कहावे, आपन डूबे औरों डुबावे।
तब शेख फरीद ने साकार परमात्मा, कबीर साहिब जी, से नाम उपदेश लिया और सतनाम का जाप किया अर्थात असली मंत्र का जाप किया। उसके बाद सतगुरु कबीर साहिब ने उसे सारशब्द दिया। जिसको प्राप्त करके शेख फरीद ने अपना जीवन सफल किया, सतलोक चला गया और पूर्ण मोक्ष प्राप्त किया।

परमेश्वर कबीर जी द्वारा काशी शहर में भोजन-भण्डारा यानि लंगर (धर्म यज्ञ) की व्यवस्था करना

शेखतकी सब मुसलमानों का मुखिया अर्थात् मुख्य पीर था जो पहले से ही परमेश्वर कबीर जी से खार खाए था अर्थात् पहले से ही ईष्र्या करता था। सर्व ब्राह्मणों तथा मुल्ला-काजियों व शेखतकी ने मजलिस (मीटिंग) करके षड़यंत्रा के तहत योजना बनाई कि कबीर निर्धन व्यक्ति है। इसके नाम से पत्रा भेज दो कि कबीर जी काशी में बहुत बड़े सेठ हैं। उनका पूरा पता है कबीर पुत्रा नूरअली अंसारी, जुलाहों वाली काॅलोनी, काशी शहर। कबीर जी तीन दिन का धर्म भोजन-भण्डारा करेंगे। सर्व साधु संत आमंत्रित हैं। प्रतिदिन प्रत्येक भोजन करने वाले को एक दोहर (जो उस समय का सबसे कीमती कम्बल के स्थान पर माना जाता था), एक मोहर (10 ग्राम स्वर्ण से बनी गोलाकार की मोहर) दक्षिणा देगें। प्रतिदिन जो जितनी बार भी भोजन करेगा, कबीर उसको उतनी बार ही दोहर तथा मोहर दान करेगा। भोजन में लड्डू, जलेबी, हलवा, खीर, दही बड़े, माल पूडे़, रसगुल्ले आदि-2 सब मिष्ठान खाने को मिलेंगे।

सुखा सीधा (आटा, चावल, दाल आदि सूखे जो बिना पकाए हुए, घी-बूरा) भी दिया जाएगा। एक पत्रा शेखतकी ने अपने नाम तथा दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी के नाम भी भिजवाया निश्चित दिन से पहले वाली रात्रि को ही साधु-संत भक्त एकत्रित होने लगे। अगले दिन भण्डारा होना था। परमेश्वर कबीर जी को संत रविदास दास जी ने बताया कि आपके नाम के पत्रा लेकर लगभग 18 लाख साधु-संत व भक्त काशी शहर में आए हैं। भण्डारा खाने के लिए आमंत्रित हैं। कबीर जी अब तो अपने को काशी त्यागकर कहीं और जाना पड़ेगा। कबीर जी तो जानीजान थे। फिर भी अभिनय कर रहे थे, बोले रविदास जी झोंपड़ी के अंदर बैठ जा, सांकल लगा ले। अपने आप झख मारकर चले जाएंगे। हम बाहर निकलेंगे ही नहीं। परमेश्वर कबीर जी अपनी राजधानी सत्यलोक में पहुँचे।

परमेश्वर कबीर जी द्वारा काशी शहर में भोजन-भण्डारा यानि लंगर (धर्म यज्ञ) की व्यवस्था करना

वहाँ से नौ लाख बैलों के ऊपर गधों जैसा बौरा (थैला) रखकर उनमें पका-पकाया सर्व सामान भरकर तथा सूखा सामान (चावल, आटा, खाण्ड, बूरा, दाल, घी आदि) भरकर पृथ्वी पर उतरे। सत्यलोक से ही सेवादार आए। परमेश्वर कबीर जी ने स्वयं बनजारे का रूप बनाया और अपना नाम केशव बताया। दिल्ली के सिकंदर बादशाह तथा उसका धार्मिक पीर शेखतकी भी आया। काशी में भोजन-भण्डारा चल रहा था। सबको प्रत्येक भोजन के पश्चात् एक दोहर तथा एक मोहर (10 ग्राम) सोना (ळवसक) दक्षिणा दी जा रही थी। कई बेईमान संत तो दिन में चार-चार बार भोजन करके चारों बार दोहर तथा मोहर ले रहे थे। कुछ सूखा सीधा (चावल, खाण्ड, घी, दाल, आटा) भी ले रहे थे।
यह सब देखकर शेखतकी ने तो रोने जैसी शक्ल बना ली। सिकंदर लोधी राजा के साथ उस टैंट में गया जिसमें केशव नाम से स्वयं कबीर जी वेश बदलकर बनजारे (उस समय के व्यापारियों को बनजारे कहते थे) के रूप में बैठे थे। सिकंदर लोधी राजा ने पूछा आप कौन हैं? क्या नाम है? आप जी का कबीर जी से क्या संबंध है? केशव रूप में बैठे परमात्मा जी ने कहा कि मेरा नाम केशव है, मैं बनजारा हूँ। कबीर जी मेरे पगड़ी बदल मित्रा हैं। मेरे पास उनका पत्रा गया था कि एक छोटा-सा भण्डारा (भोजन कराने का आयोजन) यानि लंगर का आयोजन करना है, कुछ सामान लेते आइएगा। उनके आदेश का पालन करते हुए सेवक हाजिर है। भण्डारा चल रहा है।

शेखतकी तो कलेजा पकड़कर जमीन पर बैठ गया जब यह सुना कि एक छोटा-सा भण्डारा करना है जहाँ पर 18 लाख व्यक्ति भोजन करने आए हैं। प्रत्येक को दोहर तथा मोहर और आटा, दाल, चावल, घी, खाण्ड भी सूखा सीधा रूप में दिए जा रहे हैं। इसको छोटा-सा भण्डारा कह रहे हैं। परंतु ईष्र्या की अग्नि में जलता हुआ विश्राम गृह में चला गया जहाँ पर राजा ठहरा हुआ था। सिकंदर लोधी ने केशव से पूछा कबीर जी क्यों नहीं आए? केशव ने उत्तर दिया कि उनका गुलाम जो बैठा है, उनको तकलीफ उठाने की क्या आवश्यकता? जब इच्छा होगी, आ जाएंगे। यह भण्डारा तो तीन दिन चलना है। सिकंदर लोधी हाथी पर बैठकर अंगरक्षकों के साथ कबीर जी की झोंपड़ी पर गए। हाथी से उतरकर राजा ने दरवाजे पर दस्तक दी। कहा, परवरदिगार! दरवाजा (ळंजम) खोलो। आपका बच्चा सिकंदर आया है। कबीर परमेश्वर जी ने कहा, हे राजन! कुछ व्यक्ति मेरे पीछे पड़े हैं। प्रतिदिन कोई न कोई नया षड़यंत्रा रचकर परेशान करते हैं। आज झूठा पत्र डालकर लाखों व्यक्ति बुलाये हैं। मैं निर्धन जुलाहा कपड़े बुनकर परिवार पोषण कर रहा हूँ

मेरे पास भोजन-भण्डारा (लंगर) करवाने तथा दक्षिणा देने के लिए धन नहीं है। मैं रात्रि में परिवार सहित काशी नगर को त्यागकर कहीं दूर स्थान पर चला जाऊँगा। मैं दरवाजा नहीं खोलूँगा। सिकंदर सम्राट बोला, हे कादिर अल्लाह (समर्थ परमात्मा)! मैंने आपको पहचाना है। आप मुझे नहीं बहका सकते। आपने चैपड़ के खुले स्थान पर कैसे भण्डारा लगाया है। आपका मित्रा केशव आया है। अपार खाद्य सामग्री लाया है। लाखों लोग भोजन करके आपकी जय-जयकार कर रहे हैं। आपका दर्शन करना चाहते हैं। एक बार किवाड़ खोलकर अपने गुलाम सिकंदर को दर्शन तो दो। कबीर जी ने संत रविदास जी से कहा कि खोल दो किवाड़। दरवाजा खुलते ही सिकंदर राजा ने जूती उतारकर मुकुट सहित दण्डवत् प्रणाम किया। फिर काशी में चल रहे भोजन-भण्डारे में चलने की विनय की। जब कबीर परमात्मा झोंपड़ी से बाहर निकले तो आकाश से सुंदर मुकुट आया और परमात्मा कबीर जी के सिर पर सुशोभित हुआ तथा आसमान से सुगंधित फूल बरसने लगे। राजा ने कबीर परमेश्वर जी को हाथी पर चढ़ने की प्रार्थना की।
कबीर जी ने रविदास जी को साथ लिया। राजा, रविदास जी तथा परमात्मा कबीर जी तीनों हाथी पर चढ़कर भण्डारा स्थल पर आए। सबसे कबीर सेठ का परिचय कराया तथा केशव रूप में स्वयं डबल रोल करके उपस्थित संतों-भक्तों को प्रश्न-उत्तर करके सत्संग सुनाया जो 24 घण्टे तक चला। कई लाख सन्तों ने अपनी गलत भक्ति त्यागकर कबीर जी से दीक्षा ली, अपना कल्याण कराया।

भण्डारे के समापन के बाद जब बचा हुआ सब सामान तथा टैंट बैलों पर लादकर चलने लगे, उस समय सिकंदर लोधी राजा तथा शेखतकी, केशव तथा कबीर जी एक स्थान पर खड़े थे, सब बैल तथा साथ लाए सेवक जो बनजारों की वेशभूषा में थे, गंगा पार करके चले गए। कुछ ही देर के बाद सिकंदर लोधी राजा ने केशव से कहा आप जाइये आपके बैल तथा साथी जा रहे हैं। जिस ओर बैल तथा बनजारे गए थे, उधर राजा ने देखा तो कोई भी नहीं था। आश्चर्यचकित होकर राजा ने पूछा कबीर जी! वे बैल तथा बनजारे इतनी शीघ्र कहाँ चले गए? उसी समय देखते-देखते केशव भी परमेश्वर कबीर जी के शरीर में समा गए। अकेले कबीर जी खड़े थे। सब माजरा (रहस्य) समझकर सिकंदर लोधी राजा ने कहा कि कबीर जी! यह सब लीला आपकी ही थी। आप स्वयं परमात्मा हो। शेखतकी के तो तन-मन में ईष्र्या की आग लग गई, कहने लगा ऐसे-ऐसे भण्डारे हम सौ कर दें, यह क्या भण्डारा किया है? महौछा किया है।
महौछा उस अनुष्ठान को कहते हैं जो किसी गुरू द्वारा किसी वृद्ध की गति करने के लिए थोपा जाता है। उसके लिए सब घटिया सामान लगाया जाता है। जग जौनार करना उस अनुष्ठान को कहते हैं जो विशेष खुशी के अवसर पर किया जाता है, जिसमें अनुष्ठान करने वाला दिल खोलकर रूपये लगाता है। संत गरीबदास जी ने कहा है कि:-
गरीब, कोई कह जग जौनार करी है, कोई कहे महौछा।
बड़े बड़ाई किया करें, गाली काढे़ औछा।।
सारांश:- कबीर जी ने भक्तों को उदाहरण दिया है कि यदि आप मेरी तरह सच्चे मन से भक्ति करोगे तथा ईमानदारी से निर्वाह करोगे तो परमात्मा आपकी ऐसे सहायता करता है।
भक्त ही वास्तव में सेठ अर्थात् धनवंता हैं। भक्त के पास दोनों धन हैं, संसार में जो चाहिए वह भी धन भक्त के पास होता है तथा सत्य साधना रूपी धन भी भक्त के पास होता है।

कबीर साहेब द्वारा मीरा बाई को शरण में लेना

जिस श्री कृष्ण जी के मंदिर में मीराबाई पूजा करने जाती थी, उसके मार्ग में एक छोटा बगीचा था। उसमें कुछ घनी छाया वाले वृक्ष भी थे। उस बगीचे में परमेश्वर कबीर जी तथा संत रविदास जी सत्संग कर रहे थे। सुबह के लगभग 10 बजे का समय था। मीरा जी ने देखा कि यहाँ परमात्मा की चर्चा या कथा चल रही है। कुछ देर सुनकर चलते हैं।
परमेश्वर कबीर जी ने सत्संग में संक्षिप्त सृष्टि रचना का ज्ञान सुनाया। कहा कि श्री कृष्ण जी यानि श्री विष्णु जी से ऊपर अन्य सर्वशक्तिमान परमात्मा है। जन्म-मरण समाप्त नहीं हुआ तो भक्ति करना न करना समान है। जन्म-मरण तो श्री कृष्ण जी (श्री विष्णु) का भी समाप्त नहीं है। उसके पुजारियों का कैसे होगा। जैसे हिन्दू संतजन कहते हैं कि गीता का ज्ञान श्री कृष्ण अर्थात् श्री विष्णु जी ने अर्जुन को बताया।

कबीर साहेब द्वारा मीरा बाई को शरण में लेना

गीता ज्ञानदाता गीता अध्याय 2 श्लोक 12, अध्याय 4 श्लोक 5, अध्याय 10 श्लोक 2 में स्पष्ट कर रहा है कि हे अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं। तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। इससे स्वसिद्ध है कि श्री कृष्ण जी का भी जन्म-मरण समाप्त नहीं है। यह अविनाशी नहीं है। इसीलिए गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में गीता बोलने वाले ने कहा है कि हे भारत! तू सर्वभाव से उस परमेश्वर की शरण में जा। उस परमेश्वर की कृपा से ही तू सनातन परम धाम को तथा परम शांति को प्राप्त होगा।
परमेश्वर कबीर जी के मुख कमल से ये वचन सुनकर परमात्मा के लिए भटक रही आत्मा को नई रोशनी मिली। सत्संग के उपरांत मीराबाई जी ने प्रश्न किया कि हे महात्मा जी! आपकी आज्ञा हो तो शंका का समाधान करवाऊँ। कबीर जी ने कहा कि प्रश्न करो बहन जी!
प्रश्न:- हे महात्मा जी! आज तक मैनें किसी से नहीं सुना कि श्री कृष्ण जी से ऊपर भी कोई परमात्मा है। आज आपके मुख से सुनकर मैं दोराहे पर खड़ी हो गई हूँ। मैं मानती हूँ कि संत झूठ नहीं बोलते। परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि आपके धार्मिक अज्ञानी गुरूओं का दोष है जिन्हें स्वयं ज्ञान नहीं कि आपके सद्ग्रन्थ क्या ज्ञान बताते हैं? देवी पुराण के तीसरे स्कंद में श्री विष्णु जी स्वयं स्वीकारते हैं कि मैं (विष्णु), ब्रह्मा तथा शंकर नाशवान हैं। हमारा आविर्भाव (जन्म) तथा तिरोभाव (मृत्यु) होता रहता है। (लेख समाप्त)
मीराबाई बोली कि हे महाराज जी! भगवान श्री कृष्ण मुझे साक्षात दर्शन देते हैं। मैं उनसे संवाद करती हूँ। कबीर जी ने कहा कि हे मीराबाई जी! आप एक काम करो। भगवान श्री कृष्ण जी से ही पूछ लेना कि आपसे ऊपर भी कोई मालिक है। वे देवता हैं, कभी झूठ नहीं बोलेंगे। मीराबाई को लगा कि वह पागल हो जाएगी यदि श्री कृष्ण जी से भी ऊपर कोई परमात्मा है तो। रात्रि में मीरा जी ने भगवान श्री कृष्ण जी का आह्वान किया। त्रिलोकी नाथ प्रकट हुए। मीरा ने अपनी शंका के समाधान के लिए निवेदन किया कि हे प्रभु! क्या आपसे ऊपर भी कोई परमात्मा है। एक संत ने सत्संग में बताया है। श्री कृष्ण जी ने कहा कि मीरा! परमात्मा तो है, परंतु वह किसी को दर्शन नहीं देता।

हमने बहुत समाधि व साधना करके देख ली है। मीराबाई जी ने सत्संग में परमात्मा कबीर जी से यह भी सुना था कि उस पूर्ण परमात्मा को मैं प्रत्यक्ष दिखाऊँगा। सत्य साधना करके उसके पास सतलोक में भेज दूँगा। मीराबाई ने श्री कृष्ण जी से फिर प्रश्न किया कि क्या आप जीव का जन्म-मरण समाप्त कर सकते हो? श्री कृष्ण जी ने कहा कि यह संभव नहीं। कबीर जी ने कहा था कि मेरे पास ऐसा भक्ति मंत्रा है जिससे जन्म-मरण सदा के लिए समाप्त हो जाता है। वह परमधाम प्राप्त होता है जिसके विषय में गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में कहा है कि तत्वज्ञान तथा तत्वदर्शी संत की प्राप्ति के पश्चात् परमात्मा के उस परमधाम की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार में कभी नहीं आते। उसी एक परमात्मा की भक्ति करो। मीराबाई ने कहा कि हे भगवान श्री कृष्ण जी! संत जी कह रहे थे कि मैं जन्म-मरण समाप्त कर देता हूँ। अब मैं क्या करूं। मुझे तो पूर्ण मोक्ष की चाह है। श्री कृष्ण जी बोले कि मीरा! आप उस संत की शरण ग्रहण करो, अपना कल्याण कराओ। मुझे जितना ज्ञान था, वह बता दिया।

मीरा बाई अगले दिन मंदिर नहीं गई। सीधी संत जी के पास अपनी नौकरानियों के साथ गई तथा दीक्षा लेने की इच्छा व्यक्त की तथा श्री कृष्ण जी से हुई वार्ता भी संत कबीर जी से साझा की। उस समय छूआछात चरम पर थी। ठाकुर लोग अपने को सर्वोत्तम मानते थे। परमात्मा मान-बड़ाई वाले प्राणी को कभी नहीं मिलता। मीराबाई की परीक्षा के लिए कबीर जी ने संत रविदास जी से कहा कि आप मीरा राठौर को प्रथम मंत्रा दे दो। यह मेरा आपको आदेश है। संत रविदास जी ने आज्ञा का पालन किया। संत कबीर परमात्मा जी ने मीरा से कहा कि बहन जी! वो बैठे संत जी, उनके पास जाकर दीक्षा ले लें। बहन मीरा जी तुरंत रविदास जी के पास गई और बोली, संत जी! दीक्षा देकर कल्याण करो। संत रविदास जी ने बताया कि बहन जी! मैं चमार जाति से हूँ। आप ठाकुरों की बेटी हो। आपके समाज के लोग आपको बुरा-भला कहेंगे। जाति से बाहर कर देंगे। आप विचार कर लें। मीराबाई अधिकारी आत्मा थी। परमात्मा के लिए मर-मिटने के लिए सदा तत्पर रहती थी। बोली, संत जी! आप मेरे पिता, मैं आपकी बेटी। मुझे दीक्षा दो। भाड़ में पड़ो समाज। कल को कुतिया बनूंगी, तब यह ठाकुर समाज मेरा क्या बचाव करेगा? सत्संग में बड़े गुरू जी (कबीर जी) ने बताया है कि:-
कबीर, कुल करनी के कारणे, हंसा गया बिगोय।
तब कुल क्या कर लेगा, जब चार पाओं का होय।।
संत रविदास जी उठकर संत कबीर जी के पास गए और सब बात बताई। परमात्मा बोले कि देर ना कर, ले आत्मा को अपने पाले में। उसी समय संत रविदास जी ने बहन मीरा को प्रथम मंत्र केवल पाँच नाम दिए। मीराबाई को बताया कि यह इनकी पूजा नहीं है, इनकी साधना है। इनके लोक में रहने के लिए, खाने-पीने के लिए जो भक्ति धन चाहिए है, वह इन मंत्रों से ही मिलता है। यहाँ का ऋण उतर जाता है।

फिर मोक्ष के अधिकारी होते हैं। परमात्मा कबीर जी तथा संत रविदास जी वहाँ एक महीना रूके। मीराबाई पहले तो दिन में घर से बाहर जाती थी, फिर रात्रि में भी सत्संग में जाने लगी क्योंकि सत्संग दिन में कम तथा रात्रि में अधिक होता था। कोई दिन में समय निकाल लेता, कोई रात्रि में। मीरा के देवर राणा जी मीरा को रात्रि में घर से बाहर जाता देखकर जल-भुन गए, परंतु मीरा को रोकना तूफान को रोकने के समान था। इसलिए राणा जी ने अपनी मौसी जी यानि मीरा की माता जी को बुलाया और मीरा को समझाने के लिए कहा। कहा कि इसने हमारी इज्जत का नाश कर दिया। बेटी माता की बात मान लेती है। मीरा की माता ने मीरा को समझाया। मीरा ने उसका तुरंत उत्तर दिया:-
शब्द
सतसंग में जाना ऐ मीरां छोड़ दे, आए म्हारी लोग करैं तकरार।
सतसंग में जाना मेरा ना छूटै री, चाहे जलकै मरो संसार।।टेक।।
थारे सतसंग के राहे मैं ऐ, आहे वहाँ पै रहते हैं काले नाग,
कोए-कोए नाग तनै डस लेवै। जब गुरु म्हारे मेहर करै री,
आरी वै तो सर्प गंडेवे बन जावैं।।1।।
थारे सतसंग के राहे में ऐ, आहे वहाँ पै रहते हैं बबरी शेर,
कोए-कोए शेर तनै खा लेवै। जब गुरुआं की मेहर फिरै री,
आरी व तो शेरां के गीदड़ बन जावैं।।2।।
थारे सतसंग के बीच में ऐ, आहे वहां पै रहते हैं साधु संत,
कोए-कोए संत तनै ले रमै ए। तेरे री मन मैं माता पाप है री,
संत मेरे मां बाप हैं री, आ री ये तो कर देगें बेड़ा पार।।3।।
वो तो जात चमार है ए, इसमैं म्हारी हार है ए।
तेरे री लेखै माता चमार है री, मेरा सिरजनहार है री।
आरी वै तो मीरां के गुरु रविदास।।4।।
यह कथा सुनकर रामप्यारी (रामों) की आँखें-सी खुल गई। अगले दिन कस्तूरी के साथ सत्संग में गई और एक सत्संग सुनते ही दीक्षा ले ली। फिर एक दिन के भोजन की सेवा माँगी। सब परिवारों ने कहा कि बहन! हम अपनी सेवा नहीं छोड़ सकते। गुरू जी अगली बार आऐंगे, तब तेरी बारी लगवा देंगे। भक्तमति रामों को तो पल की भी चैन नहीं थी। रोने जैसा चेहरा कर लिया। उसी समय कस्तूरी बोली कि बहन! आगे जब मेरी बारी आएगी तो सुबह का भोजन मैं करा दूँगी, रात्रि का आप करा देना। रामों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। कहीं-कहीं पैर टिके। बारी आने पर रात्रि का भोजन तैयार किया। खीर-हलवा-सब्जी, मांडे (पतली रोटी-फुल्के) बनाए। परंतु लीला सतगुरू की, रामों को तेज बुखार हो गया। शरीर अंगार की तरह जलने लगा। एक कदम भी चलने की हिम्मत नहीं रही। उसी समय रामों का लड़का आ गया। बहन रामों ने कहा कि बेटा! आज मेरा एक काम कर दे, तेरा जिंदगी-भर एहसान नहीं भुलुँगी। बेटा मैंने गुरू बनाया है।

आज रात्रि का भण्डारा तेरी ताई भक्तमति कस्तूरी की बारी से माँगकर लिया है। बेटा देख मेरे को तेज बुखार हो गया है। बदन आग की तरह जल रहा है। चलने की हिम्मत नहीं है। लड़का बोला कि मुझे समय नहीं है। मैं ना देकर आऊँ भोजन आश्रम में। माता जी आप उस आश्रम में ना जाया करो। मुझे आपके बारे में बहुत कुछ सुनना पड़ता है। यह सुनकर भक्तमति रामों फूट-फूटकर रोने लगी। लड़के को दया आई। परंतु झुंझलाकर बोला, कहाँ है भोजन, दे आता हूँ। रामों बहन तुरंत उठी और सब भोजन दे दिया। लड़का उस भोजन को एक तसले में रखकर आश्रम में ले गया। रामों गुरू जी से बार-बार निवेदन करती थी कि गुरू जी लड़का नशा करता है। घर की ठौर बिटौड़ा कर रखा है। बात नहीं मानता। उसको भी शरण में ले लो महाराज! अगले दिन लड़के को आश्रम में देखकर अन्य भक्त तथा भक्तमति कहने लगे कि गुरू जी ने सुन ली रामों दुःखिया की। बेटा स्वयं भोजन लेकर आ गया। गुरू जी को पता चला तो हर्ष हुआ कि बेटी रामों बसगी। सुन ली भगवान ने। लड़का बोला, महाराज जी! मेरी माता जी को ज्वर हो गया है, मैं भेजा हँू। भोजन करो। संत जी भोजन के लिए बैठ गए और सोचा लड़का पहली बार आया है, कुछ ज्ञान सुना दूँ। संत जी ने कहना शुरू किया कि बेटा! माता-पिता की सेवा करनी चाहिए। उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। मोक्ष के लिए गुरू बनाकर सत्य भक्ति करनी चाहिए। नशे ने तो बड़े-बड़े घर उजाड़ दिये। लड़का तो जला-भुना बैठा था।

उसे तो पल-पल की देरी महसूस हो रही थी क्योंकि उस रात्रि में उसने अपने साथी चोरों के साथ राजा के घर में चोरी करने जाना था। रात्रि के बारह बजे नगर से बाहर मंदिर में इकट्ठा होकर चोरी करने जाना था। उनकी कल्पना थी कि रानियों के मँहगे-मँहगे हार होते हैं। वे चुराकर लाऐंगे, मालामाल हो जाएंगे। इसलिए लड़का संत जी से बोला कि बाबा जी! जल्दी भोजन खा ले, मुझे शिक्षा की आवश्यकता नहीं है। संत जी को अच्छा-सा नहीं लगा। मन में विचार किया कि रामों वास्तव में दुःखी है इस शैतान से। खाना खाते ही बिना बर्तन धोए बर्तन उठाकर चल पड़ा नगर की ओर। आधे रास्ते से अधिक तय करने के पश्चात् उसके पैर में मोटी शूल (कीकर का काँटा) लग गई। पैर में बहुत पीड़ा हुई। चलने में भी कठिनाई हुई। जैसे-तैसे घर आया। आँगन में बर्तन पटककर लगा अपनी माता को उलहाने देने। आज ही तेरे गुरू जी के दर्शन किए। आज ही मेरे भाग फूट गए। मेरे पैर में काँटा लग गया। मैं चलने लायक भी नहीं रहा। आज के पश्चात् आश्रम की ओर मुख करके भी ना सोऊँ। रामों का बुखार हल्का हो चुका था। शीघ्र उठी और काँटा लगे पैर को धोया। उसके ऊपर तेल की गाध (तेल के नीचे जमा मैल) को कपड़े से बाँध दिया और सुबह काँटा निकलवाने की योजना बनाई। लड़का अपनी माता से बहुत लड़ा, ओच्छी-मंदी बातें भी कही क्योंकि लड़के कर्मपाल को तो चोरी में शामिल न होने के कारण बहुत बड़ी हानि हुई लग रही थी। जैसे-तैसे सुबह हुई। लड़के का काँटा निकलवा दिया।

माता (रामों) घर के कार्य में लग गई। कुछ देर में एक बैंड-बाजा बजता हुआ आया। नगर निवासियों को पता होता था कि इस प्रकार का साज उस समय शहर में बजाया जाता है जब किसी को मौत की सजा दी जाती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने घरों के बाहर खड़े हो जाते थे और जाना करते थे कि किसको किस कारण सूली तोड़ा जा रहा है। राजा के सिपाही उन चारों व्यक्तियों से कहलवा रहे थे कि अपना दोष बताओ। वे कह रहे थे कि हम राजा के घर चोरी करने गए थे। हमने घोर अपराध किया है। आज शाम को हमें सूली पर चढ़ाया जाएगा। कोई सुनता हो तो कभी ऐसी गलती ना करना। कर्मपाल को अपने साथी चोरों को पहचानते देर नहीं लगी और माजरा भी समझ गया। रामों बोली कि ठीक हुआ और करना चोरी, तुम्हें यही सजा चाहिए थी, करके खाया नहीं जाता। रामों अपने घर में चली गई। कर्मपाल द्वार पर भयभीत स्थिति में डरा-डरा-सा खड़ा रहा। फिर घर में जाकर जोर-जोर-से रोने लगा।

रामों ने देखा कि कर्मपाल क्यों रो रहा है? पूछा कि बेटा क्या हो गया? काँटा भी निकल गया। अब क्या दर्द हो रहा है? कर्मपाल उठा और अपनी माता के सीने से लिपट गया। बोला, माँ! भला हो आपके गुरू जी का जिसने तेरे बेटे की सूली की सजा काँटे में टाल दी। माँ! आज तेरा बेटा सूली चढ़ना था। माँ आप कैसे जीवित रहती? रामों बोली कि मेरा बेटा क्या चोर है? क्यों टूटता सूली? चोरों को सजा मिलती है। कर्मपाल बोला, हाँ माँ! तेरा बेटा चोर था। आज के बाद कसम है माँ तेरी, कभी नशा नहीं करूंगा। आपके साथ सत्संग में चला करूंगा। आपके साथ घर के काम में हाथ बटाऊंगा। मैं अपनी जिंदगी में अपनी माँ को कभी दुःखी नहीं करूंगा। रामों बोली कि रे निकम्मे! चोरी भी करने लग गया था। लड़का बोला कि हाँ माँ! पक्का चोर हो गया था। धन्य हैं आपके सतगुरू, धन्य है मेरी माँ जिसे ऐसे महापुरूष की शरण मिली है। माँ आज ही चल, मुझे दीक्षा दिलाकर ला। रामों तुरंत लड़के को भक्तमति कस्तूरी के पास लेकर गई। सब वृत्तान्त बताया। कस्तूरी भी सब कार्य छोड़कर उनके साथ आश्रम में गई और गुरू जी का धन्यवाद किया। सब घटना को बताया, लड़के को नाम दिलाया। एक अन्य गाँव के सत्संगी परिवार की लड़की से कर्मपाल का विवाह हो गया। पूरा परिवार सत्संग में आने लगा तथा सेवा करके सुखी जीवन जीने लगा।
रामों तो सत्संग के रंग में ऐसी रंगी, जब-जब सतगुरू जी मंडली समेत आकर आश्रम में रूकते, वह तो सुबह चली जाती, देर शाम को आती और सेवा करती, बर्तन साफ करती, गुरू जी के वस्त्रा धोती। सत्संग का तो एक शब्द भी नहीं छोड़ती थी। एक समय सर्दी का मौसम था। सुबह 10 बजे सत्संग शुरू हुआ। गुरू जी ने रामों से बोला कि बेटी! वस्त्रा धो ला नदी पर। धूप थोड़ी देर रहती है, सत्संग के बाद जाएगी तो वस्त्रा सूख नहीं पाऐंगे। रामों बहन वस्त्रा बाल्टी में डालकर चल पड़ी। नदी थोड़ी दूरी पर थी। कपड़े पानी में बाल्टी में भिगोकर सोडा डाल दिया। सोचा कि जितनी देर वस्त्रा सोडा में भीगेंगे, तब तक सत्संग सुन आती हूँ। आश्रम के बाहर दीवार के साथ कान लगाकर सत्संग वचन सुनने लगी। सत्संग समापन पर ‘‘सत साहेब’’ की ध्वनि सुनी तो रामों को कपड़े याद आए। दौड़ी-दौड़ी नदी की ओर चली और डरी हुई थी कि आज तो गलती हो गई। गुरू जी के वचन की अवहेलना हो गई।

मेरे ऊपर डाँट पड़ेगी। गुरू जी नाराज हो गए तो मेरी तो सेवा पर पानी फिर जाएगा। हे भगवान! यह कौन बनी? इन्हीं विचारों में नदी पर पहुँची तो देखा कि बाल्टी खाली थी और वस्त्रा धोकर झाड़ियों पर सुखा रखे थे जो सूख चुके थे। रामों उन बहनों से बोली जो पहले से नदी पर अपने वस्त्रा धो रही थी कि हे बहनों! ये वस्त्रा आपने धोकर सुखाए हैं क्या? सब अन्य महिलाऐं रामों की ओर देखने लगी। एक बोली कि बहन! तेरा दिमाग चल गया है क्या या मजाक कर रही है? आप स्वयं तो कपड़े धो रही थी बेसब्री होकर। हमारे भी छींटे लग रहे थे। तेरे को टोका भी था कि धीरे-धीरे कपड़े धो। तू खुद झाड़ियों पर सुखाकर गई थी। अब क्या भाँग का नशा कर आई है? रामों रोने लगी और सब कपड़े उठाकर बाल्टी में डालकर आश्रम की ओर चली।

आश्रम में किसी सेवादार ने रामों को आश्रम के बाहर बैठे सत्संग सुनते देर तक देखा था। उसने गुरू जी को बताया कि आज आपके कपड़े गीले ही रहेंगें क्योंकि रामों तो सत्संग समापन तक बाहर दीवार के कान लगाकर सत्संग सुन रही थी। अभी गई है कपड़े धोने। इतने में रामों ने आश्रम में प्रवेश किया और कपड़े गुरू जी के पास रखकर फूट-फूटकर रोने लगी। संत जी ने कपड़े छूए तो पूर्ण रूप से सूखे थे। रामों से रोने का कारण पूछा तो बताया कि गुरू जी! आपने दुःखी होकर स्वयं कपड़े धोए हैं। मेरे से गलती हो गई। मैंने ऐसे-ऐसे सोचा था कि कुछ देर सत्संग सुनकर कपड़े धोऊँगी। परंतु ध्यान नहीं रहा। गुरू जी बोले कि बेटी! परमात्मा कबीर जी रामों बनकर कपड़े धो गए हैं।
ज्यों बच्छा गऊ की नजर में, यूं सांई कूं संत।
भक्तों के पीछे फिरे, भक्त वच्छल भगवन्त।।
परमात्मा ने अब्राहिम सुल्तान अधम को नरक से निकालने के लिए बांदी रूप स्त्राी बनकर शरीर पर कोरड़े खाए थे। बेटी दुःखी ना हो, तेरा उद्देश्य गलत नहीं था। परमात्मा तो सच्ची लगन व भाव के भूखे हैं। रामों शांत हुई। सत्संग से रामों बस गई। मोक्ष भी मिला।
कबीर, सतगुरू शरण में आने से, आई टलै बला।
जै भाग्य में सूली लिखी हो, कांटे में टल जाय।।

बिठल रूप में प्रकट होकर नामदेव जी की रोटी खाना

एक दिन नामदेव जी भेड़-बकरियाँ-गाय चरा रहा था। प्रतिदिन साथ में गाँव के अन्य पाली (चरवाहे) भी अपनी-अपनी भेड़-बकरियाँ-गाय चराते थे। वे पाली प्रतिदिन नामदेव पर व्यंग्य करते थे कि हे नामदेव! सुना है तुमने पत्थर की मूर्ति को दूध पिला दिया था। क्या सचमुच भगवान बिठल ने दूध पीया था? नामदेव के बोलने से पहले अन्य कहते थे कि पत्थर कभी दूध पीता है! एक ने कहा कि पंचायत में सबके सामने दूध पिलाया था। अन्य कहन लगे कि क्या तूने देखा था? तुम इसका पक्ष कर रहे हो। नामदेव ने कहा कि भाईयो! वास्तव में बिठल जी ने दूध पीया था। अपने हाथों में कटोरा पकड़ा था। हाँ! मैं झूठ नहीं कहता। सब पाली हँसते थे। कहते थे कि पत्थर कभी दूध पीते हैं! झूठ बोल रहा है। यह लगभग प्रतिदिन का झंझट नामदेव जी के साथ करते थे।

बिठल रूप में प्रकट होकर नामदेव जी की रोटी खाना



एक दिन प्रतिदिन की तरह सब चरवाहे (पाली) तथा नामदेव एक वृक्ष के नीचे बैठे खाना खाने के लिए अपनी-अपनी रोटियाँ अपने-अपने सामने रखे हुए थे। किसी ने कपड़े से निकाल ली थी, किसी ने अभी रूमाल नुमा कपड़े (छालने) में बँधी सामने रखी थी। उसी समय एक ने कहा कि नामदेव! आज ये रोटियाँ जो आपके छालने में बँधी रखी हैं। अभी तक ये झूठी नहीं हुई हैं। भगवान बिठल को खिला दे। हम सत्य मान लेंगे। सबने इस बात का समर्थन किया। नामदेव दुःखी होते थे। बोलते कुछ नहीं थे। ठीक से खाना भी नहीं खा पाते थे। प्रतिदिन का यही दुःख था।

उसी समय एक कुत्ता आया। सबके बीच में बैठे नामदेव की रूमाल (छालने) में बँधी सब रोटियाँ उठाकर ले गया। यह देखकर सब पाली हँसने लगे कि बिठल भगवान ने तो स्वीकारी नहीं, कुत्ते ने स्वीकार ली। अन्य कहने लगे कि अरे! उस दिन भी कुत्ता दूध पी गया होगा। नामदेव ने झूठ बोला होगा कि बिठल भगवान ने पीया है। नामदेव जी को बिठल रूप परमात्मा रोटियाँ लेकर जाते दिखाई दिए। सब्जी नामदेव के पास रखी रह गई थी।

नामदेव जी सब्जी लेकर पीछे-पीछे चल पड़े। कह रहे थे कि हे भगवान! सब्जी भी ले लो, अकेली रोटी कैसे खाओगे? कुछ दूरी पर एक वृक्ष के नीचे भगवान बिठल रूक गए। भगवान ने कहा कि आप मेरे साथ खाना खाओ। दोनों खाना खाने लगे। उन पालियों को आश्चर्य हुआ कि नामदेव कुत्ते के साथ खाना खा रहा है। सब पाली उठकर वह नजारा देखने गए।
निकट से देखा तो वास्तव में बिठल भगवान ही नामदेव के साथ खाना खा रहे थे। सब पाली भगवान के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगे। भगवान ने कहा कि नामदेव से क्षमा माँगो। सबने नामदेव जी से क्षमा याचना की। उसी समय बिठल रूप में प्रभु अंतर्ध्यान हो गए। उसके पश्चात् सब पालीगण नामदेव का सम्मान करने लगे और पूरे गाँव पुण्डरपुर में पालियों नें आँखों देखी लीला की गवाही दी।

संत गरीबदास जी ने वाणी नं. 108 में कहा कि जगत गुरू यानि परमेश्वर कबीर जी जो सर्व को सच्चा ज्ञान देने वाले हैं, उन्होंने यह सब लीलाऐं की थी। कलंदर रूप का अर्थ है कि संत रूप में गुरू बनकर पुण्डरपुर में आश्रम बनाकर रहे। उस अच्छी आत्मा नामदेव जी की महिमा बढ़ाई तथा उनका कल्याण किया।
बिठल होकर रोटी खाई, नामदेव की कला बढ़ाई। पुंण्डरपुर नामा प्रवान, देवल फेर छिवा दई छान।।
कुछ दिनों के पश्चात् परमेश्वर कबीर जी उस आश्रम को त्यागकर कहीं चले गए।

पुनः वहाँ नहीं आए। नामदेव जी की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर स्थानीय संत-ब्राह्मण उनका विरोध करने लगे।


द्रोपदी का चीर बढ़ाना

द्रोपदी पूर्व जन्म में परमात्मा की परम भक्त थी। फिर वर्तमान जन्म में एक अंधे साधु को साड़ी फाड़कर लंगोट (कोपीन) के लिए कपड़ा दिया था। (अंधे साधु के वेश में स्वयं कबीर परमेश्वर ही लीला कर रहे थे।) जिस कारण से जिस समय दुःशासन ने द्रोपदी को सभा में नंगा करने की कोशिश की तो द्रोपदी ने देखा कि न तो मेरे पाँचों पति (पाँचों पाण्डव) जो भीम जैसे महाबली थे, सहायता कर रहे हैं।

द्रोपदी का चीर बढ़ाना


न भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा दानी कर्ण ही सहायता कर रहे हैं। सब के सब किसी न किसी बँधन के कारण विवश हैं। तब निर्बन्ध परमात्मा को अपनी रक्षार्थ हृदय से हाथी की तरह तड़फकर पुकार की। उसी समय परमेश्वर जी ने द्रोपदी का चीर अनन्त कर दिया। दुःशासन जैसे योद्धा जिसमें दस हजार हाथियों की शक्ति थी, थककर चूर हो गया। चीर का ढ़ेर लग गया, परंतु द्रोपदी निःवस्त्र नहीं हुई। परमात्मा ने द्रोपदी की लाज रखी। पाण्डवों के गुरू श्री कृष्ण जी थे।

जिस कारण से उनका नाम चीर बढ़ाने की लीला में जुड़ा है। इसलिए वाणी में कहा है कि निज नाम की महिमा सुनो जो किसी जन्म में प्राप्त हुआ था, जब परमेश्वर सतगुरू रूप में उस द्रोपदी वाली आत्मा को मिले थे। उनको वास्तविक मंत्र जाप करने को दिया था। उसकी भक्ति की शक्ति शेष थी। उस कारण द्रोपदी की इज्जत रही थी।

कबीर कमाई आपनी, कबहु ना निष्फल जाय। सात समुद्र आडे पड़ो, मिले अगाऊ आय।।

भावार्थ :- कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि अपनी भक्ति की मजदूरी (कमाई) कभी व्यर्थ नहीं जाती, चाहे कितनी बाधाऐं आ जायें। वह अवश्य मिलती है। इसी के आधार से द्रोपदी का चीर बढ़ा, महिमा हुई। इसलिए कहा है कि निज नाम (यथार्थ भक्ति मंत्र) की महिमा सुन और उस पर अमल करो।

एक वैश्या (गणिका) थी। उसको जीवन में पहली बार सत्संग सुनने का अवसर मिला। उस दिन अपने कर्म से ग्लानि हो गई और सतगुरू से दीक्षा लेकर सच्ची लगन से भक्ति करके विमान में बैठकर स्वर्ग लोक में गई। सच्चा नाम जिस भी देव का है, वह खेवट (मलहा) का कार्य करता है। जैसे नौका चलाने वाला मलहा व्यक्तियों को दरिया से पार कर देता है।
ऐसे वास्तविक नाम भवसागर से भक्तों को पार कर देता है।

(28.29) वाणी नं. 30

गरीब, बारद ढारी कबीर जी, भगत हेत कै काज।
सेऊ कूं तो सिर दिया, बेचि बंदगी नाज।।30।।

सरलार्थ :- संत गरीबदास जी ने परमेश्वर कबीर जी का उदाहरण देकर हम भक्तों को समझाया है कि जैसे कबीर भक्त के साथ काशी के पंडितों तथा मुल्ला-काजियों ने ईर्ष्या के कारण झूठी चिट्ठियाँ डाली थी कि कबीर जी भोजन-भण्डारा करेंगे। प्रत्येक भोज के पश्चात् एक मोहर तथा एक दोहर दक्षिणा देंगे। इस कारण 18 लाख (अठारह लाख) साधु-संत-भक्त निश्चित दिन पहुँच गए थे।

कबीर जी जुलाहे का कार्य करते थे। जो मेहनताना मिलता था, उससे अपने परिवार के खर्च का रखकर शेष को भोजन-भण्डारा करके धर्म में लगा देते थे। जिस कारण से घर में दो व्यक्ति आ जाऐं तो उनका भी आटा नहीं रहता था। उस दिन अठारह लाख मेहमान उपस्थित थे तो परमेश्वर कबीर जी अन्य रूप केशव बणजारे का धारण करके नौ लाख बैलों की पीठ पर बोडी यानि गधों के बोरे जैसा थैला धरकर उनमें पका-पकाया भोजन भरकर सतलोक से लेकर आए और तीन दिन का भोजन-भण्डारा पत्रों में लिखा था तो तीन दिन ही 18 लाख व्यक्तियों को भोजन कराया तथा प्रत्येक खाने के पश्चात् एक स्वर्ण की मोहर तथा एक दोहर दी गई।

जो हरिद्वार से गरीबदास वाले पंथियों ने सत्ग्रन्थ छपाया है, उसमें वाणी इस प्रकार है :-

गरीब, बारद ढुरि कबीर कै, भक्ति हेत के काज।


तेरह गाड़ी कागजों की लिखना

एक समय की बात है। दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी कबीर साहेब जी से कहा कि यदि कबीर जी 13(तेरह) गाड़ी कागजों को ढ़ाई दिन में यानि 60 घण्टे में लिख कर दिखा दे तो मैं उनको परमात्मा मान जाऊँगा। तब परमेश्वर कबीर जी ने अपनी डण्डी उन तेरह गाड़ियों में रखे कागजों पर घुमा दी। उसी समय सर्व कागजों में अमृतवाणी सम्पूर्ण अध्यात्मिक ज्ञान लिख दिया। तब सिकंदर लोधी को विश्वास हो गया, परंतु अपने धर्म के व्यक्तियों (मुसलमानों) के दबाव में आकर उसने उन सर्व ग्रन्थों को दिल्ली में ज़मीन में गढ़वा दिया।

तेरह गाड़ी कागजों की लिखना



कबीर सागर के अध्याय कबीर चरित्र बोध ग्रन्थ में पृष्ठ 1834.1835 पर गलत लिखा है कि जब मुक्तामणि साहब का समय आवेगा और उनका झण्डा दिल्ली नगरी में गड़ेगा। तब वे समस्त पुस्तकें पृथ्वी से निकाली जाएंगी। सो मुक्तामणि अवतार (धर्मदास के) वंश की तेरहवीं पीढ़ी वाला होगा।

विवेचन:- ऊपर वाले लेख में मिलावट का प्रमाण इस प्रकार है कि वर्तमान में धर्मदास जी की वंश गद्दी दामाखेड़ा जिला-रायगढ़ प्रान्त-छत्तीसगढ़ में है। उस गद्दी पर 14वें (चैदहवें) वंश गुरू श्री प्रकाशमुनि नाम साहेब विराजमान हैं। तेरहवें वंश गुरू श्री उदित नाम साहेब थे जो वर्तमान सन् 2013 से 15 वर्ष पूर्व 1998 में शरीर त्याग गए थे। यदि तेरहवीं गद्दी वाले वंश गुरू के विषय में यह लिखा होता तो वे निकलवा लेते और दिल्ली झण्डा गाड़ते। ऐसा नहीं हुआ तो वह तेरहवां पंथ धर्मदास जी की वंश परंपरा से नहीं है।
फिर ‘‘कबीर चरित्र बोध‘‘ के पृष्ठ 1870 पर कबीर सागर में 12 (बारह) पंथों के नाम लिखे हैं जो काल (ज्योति निरंजन) ने कबीर जी के नाम से नकली पंथ चलाने को कहा था। उनमें सर्व प्रथम ‘‘नारायण दास‘‘ लिखा है। बारहवां पंथ गरीब दास का लिखा है। वास्तव में प्रथम चुड़ामणि जी हैं, जान-बूझकर काँट-छाँट की है।
उनको याद होगा कि परमेश्वर कबीर जी ने नारायण दास जी को तो शिष्य बनाया ही नहीं था। नारायण दास तो श्री कृष्ण जी के पुजारी थे। उसने तो अपने छोटे भाई चुड़ामणि जी का घोर विरोध किया था। जिस कारण से श्री चुड़ामणि जी कुदुर्माल चले गए थे। बाद में बाँधवगढ़ नगर नष्ट हो गया था। ‘‘कबीर चरित्र बोध‘‘ में पृष्ठ 1870 पर बारह पंथों के प्रवर्तकों के नाम लिखे हैं। उनमें प्रथम गलत नाम लिखा है। शेष सही हैं। लिखा है:-
1. नारायण दास जी का पंथ 2. यागौ दास (जागु दास) जी का पंथ 3. सूरत गोपाल पंथ 4. मूल निरंजन पंथ 5. टकसारी पंथ 6. भगवान दास जी का पंथ 7. सतनामी पंथ 8. कमालीये (कमाल जी का) पंथ 9. राम कबीर पंथ 10. प्रेम धाम (परम धाम) की वाणी पंथ 11. जीवा दास पंथ 12. गरीबदास पंथ।

‘‘वंश प्रकार‘‘

प्रथम वंश उत्तम (यह चुड़ामणि जी के विषय में कहा है।)
दूसरे वंश अहंकारी (यह यागौ यानि जागु दास जी का है।)
तीसरे वंश प्रचंड (यह सूरत गोपाल जी का है।)
चैथे वंश बीरहे (यह मूल निरंजन पंथ है।)
पाँचवें वंश निन्द्रा (यह टकसारी पंथ है।)
छटे वंश उदास (यह भगवान दास जी का पंथ है।)
सातवें वंश ज्ञान चतुराई (यह सतनामी पंथ है।)
आठवें वंश द्वादश पंथ विरोध (यह कमाल जी का कमालीय पंथ है।)
नौवें वंश पंथ पूजा (यह राम कबीर पंथ है।)
दसवें वंश प्रकाश (यह परम धाम की वाणी पंथ है।)
ग्यारहवें वंश प्रकट पसारा (यह जीवा पंथ है।)

बारहवें वंश प्रकट होय उजियारा (यह संत गरीबदास जी गाँव-छुड़ानी जिला-झज्जर, प्रान्त-हरियाणा वाला पंथ है जिन्होंने परमेश्वर कबीर जी के मिलने के पश्चात् उनकी महिमा को तथा यथार्थ ज्ञान को बोला जिससे परमेश्वर कबीर जी की महिमा का कुछ प्रकाश हुआ।)

तेरहवें वंश मिटे सकल अंधियारा {यह यथार्थ कबीर पंथ है जो सन् 1994 से प्रारम्भ हुआ है जो मुझ दास (रामपाल दास) द्वारा संचालित है।} 

दामोदर सेठ का जहाज बचाना

कबीर साहिब जी अपना तत्वज्ञान हम लोगो को समझाने के लिये बार बार पृथ्वी पर आते है। सत्संग के माध्यमो से वाणी बोलकर अपना भेद और तत्वज्ञान बताते है। आज से 623 साल पहले काशी नगर मे आये थे। काशी नगर मे स्थान स्थान पर अपने शिष्यों के घर सत्संग किया करते थे।
दामोदर नाम का एक बहुत बडा सेठ काशी शहर मे रहता था। उसके कई समुन्दर मे चलने वाले जहाज थे। काशी और आसपास के क्षेत्र के व्यापारी उसके जहाज से समान दुसरे देशो मे ले जाते और लाते थे। दामोदर सेठ बहार जहाज मे लम्बी यात्रा पर गया हुआ था।

दामोदर सेठ का जहाज बचाना


एक दिन कबीर साहिब जी ने दामोदर सेठ के मोहल्ले मे सतंसग रख दिया। जिस भक्त आत्मा के घर सत्संग था उसने अपने मोहल्ले के सभी लोगो को सतसंग मे आने का निमंत्रण दिया। इस कडी मे दामोदर सेठ के घर भी सन्देश गया। घर पर सेठ दामोदर की पत्नि धर्मवती थी। धर्मवती एक धार्मिक स्वभाव की औरत थी। पाठ पूजा व अपने इष्ट का सुमरण मे व्यस्त रहती थी। वो अक्सर बिमार भी रहती थी।
धर्मवती सत्संग मे गई। कबीर साहिब जी के चरणों मे अपना मस्तिष्क झुकाया। कबीर साहिब जी ने धर्मवती को खुश रहो का आशीर्वाद दिया। कबीर साहिब जी अन्तर्यामी थे, तो सब जानते थे। धर्मवती के आशीर्वाद से शरीर मे ठण्ड महूशुस हुई और बिमारी भी ठीक हो गई। धर्मवती ने पता लग गया कि ये कोई साधारण संत नही है। कोई अवतारी पुरूष है। सत्संग सुना। सत्संग के माध्यम से पता लगा की श्रृष्टि रचयिता कौन है। आजतक जो उपासना करती आई थी उसका तनिक भी लाभ नही है।
सत्संग समाप्त होने बाद कबीर साहिब जी के पास बैठ गई और कहा कि हे महाराज! मै नामदान तो लेना चाहती हू परन्तु मेरे पति कारोबार के सिलसिले मे बाहर गये है। कबीर साहिब जी ने कहा कि हे बेटी धर्मवती! पाप और पुन्य सभी आत्माओं का अपना अपना होता है। सब अकेले आते है और अकेले जाते है। सब अपने अपने कर्म से अगली गती पाते है। धर्मवती ने नामदान ले लिया। कुछ दिनो पश्चात दामोदर सेठ घर आ गये। धर्मवती ने कहा कि आपसे पुछे बिना मैने गुरू धारण कर लिया है आप मुझे माफ करे! दामोदर सेठ ने कहा कि धर्मवती जीवन मे गुरू तो जरूर बनाना चाहिये। तुमने बहुत अच्छा किया। अगले दिन धर्मवती ने कहा कि आज गुरू जी का सतसंग है।

आप भी चलना मेरे साथ सत्संग मे। वापसी आने मे लेट हो जाती है। दामोदर सेठ भी उसके साथ सतंसग मे चले गये।दामोदर सेठ सबसे पीछे सतंसग मे बैठे थे। परम पिता परमात्मा कबीर साहिब जी ने श्रृष्टि रचना का वृत्तांत सुनाना शुरू किया तो दामोदर सेठ के सतंसग सुनने की ललक हुई और आगे आकर बैठ गया। सारा सतंसग सुना। सतंसग सुनने के बाद दामोदर सेठ को आभास हुआ कि अब तक की साधना सब व्यर्थ है। दामोदर सेठ ने सतसंग खत्म होने के बाद नामदान दिक्षा ली व भक्ति करने के नियम और जाप करने की विधि प्राप्त की और घर चले आये।दामोदर सेठ जब जहाज से द्वारा यात्रा पर गये तो जहाज मे लगी सभी देवी देवताओं की फोटो आदि हटाकर कबीर साहिब जी की फोटो लगकर ज्योत लगाई। जहाज मे यात्री जो हर बार अपने व्यापार के सिलसिले मे बाहर जाते आते थे, उन्होंने कहा कि दामोदर सेठ ये सभी देवी देवताओं की फोटो हटाकर एक संत की लगा ली।
ये कौन है। दामोदर सेठ ने कहा कि ये काशी शहर मे एक जुलाहा कबीर साहिब जी के रूप मे स्वम परमात्मा अवतरित हुये है। इन्होंने मुझ पर बडी दया की। अपना नामदान मुझे बक्स दिया। दामोदर सेठ ने सभी यात्री जनो के आगे भूरी-भूरी प्रसंसा कबीर साहिब जी की कही।
सभी सेठ जो दामोदर को एक जुलाहे का भक्त बोलकर सभी यात्री सारे रास्ते दामोदर का मखोल उड़ा रहे थे। कोई कबीर कह रहा था। कोई भक्त कह कर कोमैन्ट कर रहे थे। तब एक चक्रवर्ती तुफान समुन्दर मे दुर से आता दिखाई दिया। सभी यात्री समझ गये की ये समुन्दरी तुफान भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
सभी यात्री अपनी मौत को देखकर अपने अपने इष्ट को याद कर रहे थे। तुफान लगातार आगे बढ रहा था। यात्रियों की आखों मे मौत का भय साफ नाच रहा था। सभी यात्रीगण भयभीत होकर कांप रहे थे। तुफान जब दस बीस फुट की दुरी पर रह गया तो सब को अपनी अपनी मौत दिखाई देने लगी। अब कोई चारा नही था। सबने मिलकर कहा कि दामोदर सेठ शांत बैठा है इसे भी अपने गुरूजी अरदास लगानी चाहिए। वही सभी यात्रीगण सेठ दामोदर से बोले भाई दामोदर सेठ! हमने अपने सभी देवता और भगवानो को मदद के लिए पुकार लिया लेकिन किसी से कोई मदद नही मिल रही है। मौत निकट आ गई है।

दामोदर सेठ जी! अब आप भी अपने परमात्मा को सहायता के लिए याद कर लो। तब दामोदर जी कहते है कि जब ब्रह्मा विष्णु महेश शेरावाली आदि आदि देवी देवताओं ही आप भक्तो की कोई सहायता नही कर पा रहे तो मेरा भगवान तो एक छोटा सा जुलाहा है वो मदद कैस करेगा। सभी सेठ बोले भाई एक बार तू भी दिल से अपने कबीर से प्राथना करके देख ले। दामोदर सेठ ने कहा कि बाद मे ये मत कहना कि हमारे देवी देवता ने हमारी मदद की है। तब दामोदर जी ने मुझ कबीर को आत्मा से पुकारा ओर कहा भगवान आज अपने इस दास की रक्षा करो परमात्मा अपने इस बच्चे की आज लाज रख लो। मैने इन सभी यात्रीयो के आगे आपकी घनी महिमा सुना दी। मालिक मै तो नीच हू परन्तु आप मेरे स्वामी हो। दया करो मालिक।

उसी समय की बात है परमात्मा कबीर साहिब जी काशी नगर मे सत्संग कर रहे थे। अचानक कबीर परमात्मा कपड़ो समेत पूरे पानी मे भीग जाते है। कुछ भक्त कहते है कि गुरूजी पसीने मे आपके कपडे भीग गये। आपकी तबीयत तो ठीक है न। सत्संग सुन रहे कुछ भक्त जब इस बारे में बार बार पूछते है।

परमात्मा कबीर साहिब जी बताते है कि मेरा एक भक्त सेठ दामोदर कुछ सेठो के साथ बिज़नेस करने विदेश गया था। आज वो समुंद्री जहाज से समुन्दर के रास्ते से वापिस लौट रहा था। तो जब जहाज समुन्दर के बीच मे था। तभी भयंकर तूफान आ गया। जहाज को डूबते देख सभी सेठो ने अपने अपने सभी देवता और भगवानो को अपनी रक्षा के लिए याद किया लेकिन किसी भी देवी देवता या भगवान ने उनकी नही सुनी। कबीर परमात्मा सत्संग में भक्तो को बताते है कि भाई में अपने भक्त दामोदर की आत्मा की पुकार सुनकर वहा गया और दामोदर के जहाज को डूबने से बचाया और किनारे लगाया इसलिये में पानी मे भीग गया।सत्संग सुनने वाले कुछ लोगो को कबीर परमात्मा की बातो पर एतबार नही हुआ। अगले दिन सभी यात्री सुरक्षित जहान से पार करके काशी मे आ गये। उनको पता था हमारा जहाज तो समुन्दर के बीचों बीच था किनारे पर आने मे अभी एक सप्ताह और लगता। समुन्दर मे तुफान शांत हुआ तब उनको जहाज समुन्दर के किनारे मिला था।

वह परम शक्ति ही जहाज को बचाकर समुन्दर के किनारे लगाया है। सभी कबीर साहिब जी के दर्शनाथ आ रहे थे। सबके हाथ मे ढोलक थाली पीपा थे और बजाते आ रहे थे। जोर जोर जयकारे की कबीर साहिब जी ने हमारा जहाज बचाया। कबीर साहिब जी भगवान है। कबीर साहिब जी की जय। जब आवाज सत्संग स्थल पर आने लगी तब कबीर साहिब जी ने कुछ शिष्य को भेजा कि देखकर आओ कैसा शोर है।

कुछ भक्त गण गये और वापिस आकर बताया कि दामोदर सेठ अपने यात्रीगण मित्रो के साथ आपके दर्शनाथ आ रहे है। जयकारे लगा रहे है। कह रहे है कि कबीर साहिब जी ने समुन्दरी तुफान मे हमारा डुबता जहाज को बचाया। अब कल जो भक्त सतंसग मे सोच रहे थे कि गुरूजी वैसे ही कह दिया। पानी मे भीग गया। उन्होंने क्षमा मांगी और दोवारा नाम उपदेश लिया। पर उसी समय दामोदर सेठ अपने यात्री मित्रो के साथ आते है। और अपना पुरा प्रकरण सुनाते है तो सतंसग स्थल से आवाज आती है।
धन धन सतगुरु सत् कबीर, भक्त की पीड़ मिटाने वाले।।
रहे नल नील जतन कर हार, तब सतगुरु से करी पुकार।
जा सत रेखा लिखी अपार, सिन्धु पर शिला तिराने वाले।
धन धन सतगुरु सत् कबीर, भक्त की पीड़ मिटाने वाले।।
डसी सर्प ने जब जाय पुकारी, इन्द्रमती अकुलाय।
आपने तुरंत करी सहाय, बहरोली मंत्र सुनाने वाले।
धन धन सतगुरु सत् कबीर, भक्त की पीड़ मिटाने वाले।।
दामोदर के होवें थे अकाज,अर्ज़ करी डूबता देख जहाज।
लाज मेरी रखियों गरीब निवाज, समुद्र से पार लंघाने वाले।
धन धन सतगुरु सत् कबीर, भक्त की पीड़ मिटाने वाले।।
कहैं कर जोड़ दीन धर्मदास, दर्श दे पूर्ण करियो आस।
मेटियो जन्म-मरण की तिरास,सत्यपद प्राप्त कराने वाले।
धन धन सतगुरु सत् कबीर, भक्त की पीड़ मिटाने वाले।।

सत्संग में आकर पूरा प्रकरण ज्यूँ का त्यु सुनाता है तो सभी दांतो तले उंगलियां दबाते है। आधे भक्त उस समय तक कबीर साहिब जी को एक संत मानते थे। इस घटना के बाद सभी परमात्मा मानने लग गये। अपने भक्तों के रक्षक है कबीर साहिब जी।
गरीब, नौ लख नानक नाद में, दस लख गोरख तीर।
लाख दत्त संगी सदा, चरणौं चरचि कबीर।।
गरीब, नौलख नानक नाद में, दस लख गोरख पास।
अनंत संत पद में मिले, कोटि तिरे रैदास।।
परमात्मा कबीर जी की शरण में आकर वचन के शिष्य बनकर श्री नानक देव जैसे भक्त नौ लाख पार हो गए तथा श्री गोरखनाथ जैसे सिद्ध पुरूष दस लाख पार हो गए। श्री दत्तात्रो जैसे ऋषि एक लाख उनकी शरण में सदा उनकी महिमा की चर्चा करते रहते हैं। संत रविदास जैसी करोड़ों भक्त आत्मा पार हो गई कबीर जी के ज्ञान व साधना को ग्रहण करे। और मोक्ष कराये।
आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। साधना चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8:30 बजे। संत रामपाल जी महाराज जी इस विश्व में एकमात्र पूर्ण संत हैं। आप सभी से विनम्र निवेदन है अविलंब संत रामपाल जी महाराज जी से नि:शुल्क नाम दीक्षा लें और अपना जीवन सफल बनाएं।

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